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मोदी की डिग्री के प्रसंग पर गांधी की डिग्री पर सवाल

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पुष्पा गुप्ता

 _महात्मा गांधी और नेहरू का चरित्र हनन किया जाना कोई नया नहीं है। वह नए-नए रूपों में दिखता रहता है। कोई उन्हें पाकिस्तान परस्त कहता है, तो कोई उनके चरित्र को ही लांछित करता है। यह सब स्वतंत्रता के बाद से ही होता आया है।_
    राष्ट्रीय नायकों को लांछित करने को अभियान के तौर लेने के लिए एक विशेष विचार संप्रदाय हमेशा मुख्य भूमिका में रहा है। पर बावजूद इसके अटल जी के नेतृत्व तक उनकी पार्टी के अन्य अगुवाकारों में यह सामर्थ्य नहीं थी कि वे राष्ट्रीय नायकों के खिलाफ जहर उगल सकें।
  सरकार के मुखिया के रूप में अटल जी की सर्वसमावेशी विचारधारा को खुली चुनौती दे सकने के स्वर तब तक उनके दल में प्रभावी न हो पाए थे। कोशिशें जरूर हुई होंगी, लेकिन प्रतिकूल परिणाम के डर से आगे नहीं बढ़ पाई होंगी।

निःसन्देह अटल जी इस तरह की राजनीति को स्वीकार न करते।

नेहरू की वंशावली को लेकर दशकों से उनके खिलाफ खूब मुहिम चलाई गई। इनके निशाने पर यद्यपि गांधी और नेहरू दोनों रहें हैं, तथापि गांधी की दलीय सीमाओं से परे उनके विराट व्यक्तित्व के चलते उन पर आक्रमण करना सहज नहीं था।
पर नेहरू चूंकि कांग्रेस दल के मुखिया थे, तिस पर सांप्रदायिक राजनीति की जड़ खोदने वाले उनके प्रबल प्रतिद्वंद्वी, लिहाज़ा उनको गांधी जैसी कोई रियायत हासिल नहीं हुई। और फिर गांधी की दैहिक उपस्थिति को तो हटाया ही जा चुका था।
इसके अलावा बाद में गांधी के समाजवादी अनुयायियों का एक वर्ग नेहरू और इंदिरा के खिलाफ संघ का सहयोगी बन चुका था, सो गठजोड़ के लिहाज के चलते गांधी को कहने से बचा गया। अन्यथा यह गठजोड़ टूट भी सकता था। सो प्रकट में अब मुख्य निशाने पर नेहरू थे, गांधी नहीं।
हालांकि उनके अंतर्मन में गांधी और उनके शिष्य नेहरू को लेकर कोई भ्रम नहीं था, दोंनो के प्रति एक जैसी धारणा थी।

अन्यथा गोंडसे की पत्रिका ‘अग्रणी’ में गांधी दशानन के रूप में न दर्शाया जाते। साथ ही उनके दस सिरों में नेहरू, सुभाष, पटेल आदि भी शामिल थे।
इसके अलावा शहादत के तुरंत बाद तत्कालीन परिस्थितियों में गांधी पर कुछ भी अमर्यादित टिप्पणी करना खतरे से खाली नहीं था, क्योंकि गांधी के खिलाफ बोलने का मतलब सामाजिक स्वीकार्यता को खो देना था।
पर धीरे-धीरे लगातार कोशिशों के जरिये समाज के एक हिस्से में गांधी की नकारात्मक छवि को स्थापित करने में कुछ कामयाब हुए। दुष्प्रचार के चलते गांधी के बारे में वे सब बातें कहीं गईं जिनसे उनका कोई नाता न था सांप्रदायिकता के जहर ने गांधी की हिन्दू विरोधी छवि को गढ़ा। और अब तो गांधी के खिलाफ बोलने वाले संसद तक को सुशोभित करते हैं।
गांधी के प्रति स्थायी नफ़रत भरने का ही नतीजा है कि मौका पाते ही खास विचारधारा से दीक्षित कोई न कोई व्यक्ति गांधी को अपमानित कर ही जाता है। ऐसा करने के पीछे गांधी की लोकछवि को धूमिल करने की चाहत रहती है।
क्योंकि गांधी की वैचारिकी सांप्रदायिकता के विचार के उन्मूलन का मार्ग प्रशस्त करती है। उनका मानना है कि, लोकछवि के खंडित होते ही लोगों को आसानी से गांधी के विचारदर्शन से विस्थापित किया जा सकता है।

दुख होता है जब इस तरह की कोशिशें गांधी के देश में होती हैं।
गांधी को चतुर बनिया कहने के पीछे कौन सा सम्मान छुपा हुआ है, बताने की जरूरत नहीं।
इसके अलावा तमाम ऐसी बातें कही जाती हैं, जिनसे मामले को दूसरी दिशा दी जा सके और यह सब बातें शीर्ष स्तर पर स्थापित उन महानुभावों के द्वारा कही जाती हैं, जिनका एक बड़ा अनुयायी वर्ग है।

आपको याद होगा कि कुछ दिनों पहले राजनाथसिंह ने कहा था कि सावरकर ने गांधी के कहने पर माफीनामा लिखा था। जबकि यह तथ्यात्मक रूप से बिलकुल गलत है।
अब इससे यह संदेश जाता है कि गांधी ने सावरकर को पत्र लिखा था कि आप माफी मांग लीजिये। यहाँ सावरकर को बचाने की कोशिश है। यद्यपि यहाँ यह बता देना जरूरी है कि सावरकर के जीवन का पहला चरण निःसंदेह क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ा हुआ था और जिसके प्रति श्रद्धा भी है, पर उनका दूसरा चरण बिलकुल प्रतिगामी है।
ब्रिटिश कैद से रिहाई के बाद स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी कोई भूमिका नहीं दिखती। उल्टे भारत छोड़ो आंदोलन में वे ब्रिटिश सरकार की मदद करते दिखे। वह बिलकुल बदल चुके थे।
1857 के विद्रोह पर लिखने वाले सावरकर अपने अगले चरण में वैचारिक रूप से बिलकुल विपरीत छोर पर खड़े थे।
खैर……

गांधी जी ने सावरकर की रिहाई के लिए पत्र जरूर लिखा था पर वह पत्र ब्रिटिश सरकार को संबोधित था। यह पत्र उन्होंने 26 मई 1920 को ब्रिटिश सरकार को उसकी उस रॉयल प्रोक्लेमेशन के संदर्भ में लिखा था, जिसमें सामूहिक रूप से उन लोगों को रिहा करने की घोषणा की गयी थी, जिन लोगों पर हिंसा के चार्जेज सिद्ध नहीं हुए थे।
गांधी जी ने लिखा कि जब सावरकर बंधुओं पर हिंसा के चार्जेज सिद्ध नहीं हुए हैं, तो उन्हें भी मुक्त किया जाय। और फिर उन्होंने तो सरकार से सहयोग करने की बात भी कही है। यह गांधी का बड़प्पन था कि वे अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रति संवेदना रखते थे।
ध्यान दिया जाय कि गांधी के 1920 में पत्र लिखने से पहले ही सावरकर द्वारा लगभग छः माफीनामे लिखे जा चुके थे। सावरकर जुलाई 1911 में जेल में आए और पहला माफीनामा उन्होंने 6 महीने के अंदर लिखा। पूरे कालापानी में उन्होंने 6 माफीनामे लिखे। बावजूद इसके, उनके पहले चरण के लिए श्रद्धा है।

पर यहाँ बात बड़े लोगों द्वारा तथ्यों के विपरीत बात किये जाने की है। वे अफवाहों को इतिहास सिद्ध करना चाहते हैं।
तथ्यों के विपरीत बात करने के संदर्भ में अभी हाल-फिलहाल इसी क्रम में मनोज सिन्हा जो कि जम्मूकश्मीर के उपराज्यपाल हैं और खूब पढ़े-लिखे भी हैं, ने हाल में ग्वालियर की एक यूनिवर्सिटी में यह कहा कि गांधी के पास कोई डिग्री नहीं थी। एक संवैधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति का इस तरह आधारहीन बात कहना क्या संकेत करता है?
आखिर इस दुष्प्रचार की क्या वजह हो सकती है? जब डिग्री को लेकर कहीं कोई विवाद नहीं है तो इस तरह की खोजी विद्वता के प्रदर्शन का औचित्य क्या?
जबकि दुनिया जानती है कि गांधी इंग्लैंड में बैरिस्टरी की पढ़ाई करने गए थे।

उन्होंने बाकायदा वहां वकालत की पढ़ाई की और उसे सफलतापूर्वक उत्तीर्ण भी किया। इसके बाद उन्होंने भारत की कोर्ट में बतौर वकील की हैसियत से अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। और यही नहीं देश के बाहर अफ्रीका में भी अब्दुल्ला के केस के संदर्भ में पैरवी करने के लिए गए, जहाँ उन्होंने भारतीयों की समस्याओं को लेकर संघर्ष किया।
कहने की जरूरत नहीं भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भावी भूमिका के सूत्र उन्होंने यहीं गढ़े। खैर, प्रश्न यह है कि क्या गांधी फ़र्जी वकील बनकर सच की लड़ाई लड़ रहे थे? क्या बरतानिया सरकार में यह संभव हो सकता था?
गांधी खुद अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि सन “1887 में मैट्रिकुलेशन परीक्षा पास की।”
इसके बाद गांधी उच्च शिक्षा के लिए 4 सितंबर 1888 को वे बम्बई बंदरगाह से रवाना हुए। वहां उन्होंने लंदन का भी मैट्रिकुलेशन पास किया।

वे आगे लिखते हैं- “कानून की पढ़ाई आसान थी। बैरिस्टरों को मजाक में डिनर’ (दावत के) बैरिस्टर’ ही कहा जाता था। सबको पता था कि परीक्षा का मूल्य नहीं के बराबर है। मेरे समय में दो परीक्षाएँ थीं- रोमन ला और इंग्लैंड का कानून। दो भागों में दी जाने वाली इन परीक्षाओं की पुस्तकें नियत थीं।”
वे आगे फिर लिखते हैं कि- “परीक्षाएं पास करके 1891 की 10वीं जून को मैं बैरिस्टर बन गया, 11 को इंग्लैंड के हाईकोर्ट में ढाई शिलिंग देकर अपना नाम दर्ज कराया, 12 जून को हिंदुस्तान की ओर वापस लौटा।”
गांधी जी की यह आत्मकथा सर्वसुलभ है। फिर इस तरह की अनावश्यक टिप्पणी करने का क्या प्रयोजन था?
इसी आत्मकथा में गांधी जी द्वारा अपने प्रति कठोर ईमानदारी दिखाते हुए अपनी गलतियों को भी बेबाकी से उद्घाटित किया है, जिसका उनके विरोधी बार-बार उद्धृत कर गांधी को चरित्रहीन साबित करने की कोशिश की जाती है। यह गांधी का नैतिक बल था कि वे अपनी कमजोरियों को छुपाते नहीं।

पर जिनकी राजनीति ही चरित्र हनन पर टिकी हो वे क्यों कर आईना देखेंगे?
निश्चित ही यह राष्ट्रपिता की प्रतिष्ठा को धूलधूसरित करने का एक और तुच्छ प्रयास था।
एक शिक्षण संस्थान में इस तरह के बयान देने से क्या यह संदेश नहीं जाएगा कि गांधी जी ने कोई औपचारिक शिक्षा ही ग्रहण नहीं की थी।
अध्ययनरत छात्र तो भ्रम के शिकार हो गांधी को झूठा मान लेंगे।
क्या बच्चे यह न मान लेंगे कि इतिहास में उनके बैरिस्टर होने का झूठ फैलाया गया।
कहने की जरूरत नहीं कि इस तरह की सोच के पीछे नेहरू और गांधी के प्रति भरी घृणा है, जो तमाम रूपों में निकल के आती है।
राष्ट्रनायकों के चरित्रहनन की हर कोशिश का तुरंत प्रतिवाद जरूरी है, अन्यथा नफ़रत अपना काम कर जाती है.

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