जबसे जनसंपर्क में सुदाम खाड़े, प्रमुख सचिव शिवशेखर शुक्ल और जनसम्पर्क की कमान मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने सम्हाली है जनसंपर्क का बेड़ा गर्क कर रखा है ?नियमित सूची के विज्ञापन पिछले 9 माह से बजट का रोना रोकर रोके गये है ?छोटे अखबारों पत्रिकाओं पर संकट आने से कई पत्रकार बेरोजगार हो गए हैं किंतु अफसर बजट का रोना रोकर फाइल दबाये बैठे हैं ? इसके पूर्व जब तक जनसम्पर्क का प्रभार मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के पास नही था नरोत्तम मिश्रा ,भूपेंद्र सिंह के कार्यकाल में छोटे अखबारों से के भुगतान प्रतिमाह बिना कहे हो जाते थे किंतु जब से मुख्यमंत्री ने इस विभाग की कमान सम्हाली कोई सुनने वाला नही है ?नियमित सूची में भी बड़े पैमाने पर घोटाले थे ?मध्यप्रदेश के बाहर के राज्यो को लाखों रुपए के विज्ञापन दिये गये जिन पत्र पत्रिकाओं का कोई अस्तित्व ही नही था जिन्हें भारत सरकार डी ब्लाक घोषित कर चुका था उन्हें भी रेवड़ी बांटी गई कोई जिम्मेदार जांच करने को तैयार नही ?मार्च 19 में नियमित सूची के अंतिम विज्ञापन जारी किये जिसका भुगतान आज तक जारी नही किया गया !अपर संचालक आर एल चौधरी कहते हैं पैसा नही है नियमित सूची के बारे में चौधरी पिछले 6 माह से कह रहे हैं कि फाइल मुख्यमंत्री के यहाँ गयी हैं ? जब फंड की व्यवस्था नही है तो दैनिक अखबारों को एक दिन में तीन तीन विज्ञापन कैसे जारी किये जा रहे हैं ? कारण सिर्फ एक ही हैं कि सरकार के घोटाले उजागर न हो ? ज्ञातव्य है कि हनीट्रैप, ई टेंडर घोटाले मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के कार्यकाल में पनपे किन्तु कमलनाथ के मुख्यमंत्री रहते उजागर हुवे ? अब तो विज्ञापन नवीस अखबार की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या निष्पक्ष पत्रकारिता कर पाएंगे? जब भरपेट विज्ञापन मिलेंगे? हालांकि विज्ञापन उन्हें ही दिये जा रहे जो सरकार के खिलाफ न लिखे?
विज्ञापन की सरकार: जनसम्पर्क के अफसरों की भूमिका पर सवालिया निशान!

