मंत्री केदार कश्यप के भ्रष्ट रवैये से वन एवं परिवहन विभाग के सुशासन पर लगा बट्टा
क्या दिव्यांग कर्मचारी को पीटने वाले को मंत्रिमंडल से किया जाना चाहिए बर्खास्त?
बघेल और कश्यप की मुलाकात से बढ़ी राजनीतिक सरगर्मी
विजया पाठक, एडिटर, जगत विजन
छत्तीसगढ के वन, पर्यावरण, परिवहन मंत्री के भ्रष्ट तरीक़ों ने सरकार के काम काज पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है, खासतौर पर कश्यप द्वारा अपने विभाग से सीधे आदिवासियों की उपेक्षा की जा रही है। सूत्रों के मुताबिक वो पूर्व मुख्यमंत्री से लगातार मुलाकातें कर रहे हैं। साथ ही चुपके से मुख्यमंत्री को अस्थिर कर स्वयं उस गद्दी पर आसीन होना चाहते है। कहीं ना कहीं मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सज्जनता का उठाने की कोशिश की जा रही है। सरकार भी अपने मंत्री के भ्रष्टाचारों के आगे आखिर चुप्पी साध रखी है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों वन और परिवहन विभाग को लेकर कई तरह की चर्चाएं और आरोप-प्रत्यारोप सामने आ रहे हैं। राज्य के वन एवं परिवहन मंत्री केदार कश्यप की कार्यशैली और विभागीय निर्णयों को लेकर राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं। ये सवाल केवल किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शासन-प्रशासन की पारदर्शिता और राजनीतिक स्थिरता से भी जुड़े हैं। वन विभाग जैसे संवेदनशील विभाग का दायित्व केवल वृक्षारोपण या संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आदिवासी आजीविका, पर्यावरणीय संतुलन और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन से भी जुड़ा है। यदि राज्य में अवैध कटाई, पौधों की बिक्री या विभागीय स्तर पर अनियमितताओं की चर्चा होती है, तो स्वाभाविक है कि जनता पारदर्शी जांच और स्पष्ट जवाब की अपेक्षा करेगी। ऐसी परिस्थितियों में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह तथ्यों को सार्वजनिक करे और यदि आवश्यक हो तो स्वतंत्र जांच की प्रक्रिया अपनाए। इसी प्रकार परिवहन विभाग राज्य के राजस्व का प्रमुख स्रोत है। इस विभाग में पारदर्शिता, ऑनलाइन परमिट प्रणाली, डिजिटल भुगतान और निगरानी तंत्र का मजबूत होना आवश्यक है। यदि विपक्ष या अन्य राजनीतिक दल यह आरोप लगाते हैं कि विभाग के माध्यम से अवैध वसूली हो रही है, तो इन आरोपों का समाधान केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि दस्तावेजी प्रमाण और प्रशासनिक कार्रवाई से संभव है।
भूपेश बघेल से नजदीकियों के क्या हैं मायने?
केदार कश्यप की पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकातों से राजनीतिक सरगर्मियां तेज हैं। यहां सवाल उठता है कि आखिर केदार कश्यप के बघेल से मिलने के क्या मायने हो सकते हैं। क्या कश्यप के दिमाग में कुछ अलग ही चल रहा है। क्या सत्तारूढ़ दल के भीतर मतभेद या अंतर्विरोध हैं। हालांकि भारतीय लोकतंत्र में विभिन्न नेताओं के बीच मुलाकातें असामान्य नहीं हैं, परंतु यदि इन मुलाकातों को लेकर समर्थन या दल-बदल की चर्चाएँ उठती हैं, तो इससे राजनीतिक स्थिरता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। सरकार के लिए यह समय प्रशासनिक मजबूती और आंतरिक अनुशासन का है। यदि सरकार के किसी मंत्री को लेकर लगातार आरोप सामने आते हैं, तो मुख्यमंत्री कार्यालय की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। चुप्पी या विलंबित प्रतिक्रिया राजनीतिक विपक्ष को और अधिक मुखर बना सकती है।
केदार कश्यप ने चुनाव आयोग को भी रखा था अंधेरे में
नारायणपुर से विधायक और लंबे समय तक मंत्री रहे केदार कश्यप द्वारा चुनावी हलफनामों में घोषित संपत्ति के आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी कुल संपत्ति लगभग 1.91 करोड़ रुपये घोषित की थी। हालिया चुनावी हलफनामे में यह आंकड़ा घटकर लगभग 1.60 करोड़ रुपये दर्ज किया गया है। यानी पाँच वर्षों में करीब 29 लाख रुपये की कमी दिखाई गई है। यह तथ्य अपने आप में असामान्य प्रतीत हो सकता है, क्योंकि सामान्य धारणा यह रहती है कि लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने वाले जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में वृद्धि होती है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उठे सवाल
इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि संपत्ति में वृद्धि के बजाय कमी का दावा किया गया है। ऐसे मामलों में आवश्यक है कि विश्लेषण केवल कुल राशि पर आधारित न हो, बल्कि देनदारियों, बाजार मूल्य और संपत्ति के प्रकार में बदलाव को भी ध्यान में रखा जाए। चुनावी हलफनामे पारदर्शिता का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं, परंतु उनकी सत्यता का स्वतंत्र सत्यापन भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए आवश्यक है। छत्तीसगढ़ जैसे वन-समृद्ध राज्य में वन विभाग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। राज्य के बड़े भूभाग में वन क्षेत्र फैला है, जो पर्यावरणीय संतुलन, वनवासियों की आजीविका और जैव विविधता से सीधे जुड़ा है। यदि वन प्रबंधन, पौधरोपण, नर्सरी क्रय या वन उत्पादों की बिक्री में अनियमितताओं की आशंका व्यक्त की जाती है, तो यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि पर्यावरणीय और सामाजिक चिंता का विषय बन जाता है।
परिवहन विभाग में चरम पर पहुंचा भ्रष्टाचार
मंत्री केदार कश्यप ने परिवहन विभाग जैसे राजस्व के प्रमुख स्रोत में भी भ्रष्टाचार का खूंटा लगा दिया है। ओवरलोडिंग, परमिट व्यवस्था, चेकपोस्ट संचालन और आरटीओ प्रक्रियाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। आज के डिजिटल युग में ई-गवर्नेंस, ऑनलाइन परमिट प्रणाली और डिजिटल भुगतान जैसे उपाय भ्रष्टाचार की संभावनाओं को कम कर सकते हैं। यदि इन व्यवस्थाओं को सख्ती से लागू किया जाए तो विभागीय पारदर्शिता में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
मंदिर निर्माण में भी भ्रष्टाचार कर गये कश्यप
दंतेवाड़ा जिले में प्रस्तावित “वन मंदिर” परियोजना भी चर्चा का विषय रही है। इसे प्रकृति संरक्षण और सांस्कृतिक आस्था के समन्वय के रूप में प्रस्तुत किया गया। नक्सल-प्रभावित क्षेत्र में पर्यटन और विकास की संभावनाओं को बढ़ाने के दृष्टिकोण से ऐसी परियोजनाएँ महत्वपूर्ण हो सकती हैं। परंतु किसी भी सार्वजनिक परियोजना की तरह इसकी लागत, टेंडर प्रक्रिया, सामग्री क्रय और गुणवत्ता नियंत्रण को लेकर पारदर्शिता अपेक्षित है।
जगदलपुर सर्किट हाउस के कर्मचारी खितेंद्र पांडेय को पीटा
मामला जगदलपुर सर्किट हाउस का है। जहां कश्यप ने वहां के कर्मचारी के उपर जूता उठाया, मां-बहन की गालियां दी और कॉलर पकड़कर 2-3 थप्पड़ मारे पीड़ित खितेंद्र पांडेय ने कोतवाली थाने में शिकायत दर्ज कराई है। मंत्री के सुरक्षाकर्मी बुलाकर कमरे में ले गए। मंत्री ने कमरे का ताला समय पर नहीं खोलने की बात पर नाराज होकर मारपीट की।

