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रहिमन या संसार में भांति भांति के लोग

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सुसंस्कृति परिहार

            रहिमन बहुत पहले यह कह गए थे कि इस संसार में भांति भांति के लोग हैं कोई पूजन जोग हैं कोई जूता जोग । हालांकि यह दोहा उनका नहीं है लेकिन बुंदेलखंड में रहीम और तुलसी का नाम जोड़कर इसका उपयोग होता है ।आज कोरोना महामारी के समय देश में दोनों तरह के लोग नज़र आ रहे हैं ।एक ओर लूटमार और नकली दवाओं की जो गदर पूरे हिन्दुस्तान में मची हुई है तो उस वक्त में भी कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इंसानियत के नाते इस विभीषिका से जूझ रहे लोगों के लिए जी भर सहयोग कर रहे हैं ।वहीं कुछ ऐसे महामानव भी है जिनके मुंह से  मौत के मुंह में समाते जा रहे लाखों लाख लोगों के लिए श्रद्धांजलि हेतु दो शब्द कहने की फुरसत नहीं है।ये ऐसे लोग हैं जिन्हें लोगों ने बड़े विश्वास से अच्छे दिनों के लिए सत्ता में बिठाया था। 

      जिसने भी इस दोहे का निर्माण किया उसकी गहरी सोच का खुलासा कोरोना काल में साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा है।समाज ने ऐसे लोगों का इलाज भी खोज लिया गया था  कोई पूजन जोग हैं कोई जूतन जोग। बहरहाल आज के हालात में यह सजा बहुत कम प्रतीत होती है लेकिन फिर भी यदि जिस शख्स के पास शर्म होगी वह पानी पानी हो जाएगा।       

 हाल ही में जीवन रक्षक रेमडिसिवर इंजेक्शन में नमक और ग्लूकोज़ भरकर ना केवल पैसों की लूट हुई बल्कि मरीजों के जीवन से खिलवाड़ का जबलपुर, इंदौर और अहमदाबाद में जो मंज़र सामने आया है वह बहुत भयावह है इसके तार तार कहां कहां जुड़े हुए हैं इसकी ईमानदारी से तफ़्तीश होनी चाहिए।पहले इस इंजेक्शन की कमी की गई ,फिर कालाबाजारी हुई और फिर नकली इंजेक्शन बिका। आॅक्सीजन की किल्लत ने भी किस कदर‌ कहर बरपाया कि वह भी ब्लेक मार्केटिंग का हिस्सा बन गई उसे 15 से 5० हज़ार में  चोर दरवाजे से बेचा गया।  कई बड़े  नेताओं ने,सम्पन्न लोगों ने इन्हे अपने लिए सुरक्षित कर लिया वहीं बिचौलियों ने मनमाने दामों में बेचकर आपदा में अवसर का लाभ लिया।ज़रूरत मंद तड़फ तड़फ कर मरते रहे ।सी टी स्केन के ज़रिए भी बारे न्यारे हुए।प्लाज्मा के सौदागर भी इस बीच सोशल मीडिया पर सक्रिय रहे।इस सबका जो परिणाम होना था हुआ।अनगिनत लोग अस्पताल में ना तो बेड पाए,ना दवाएं, ना ही ऑक्सीजन उन्हें मिल पाई । ऐसे मरीज भगवान भरोसे घरों को भेज दिये गये यह बताने की ज़रूरत नहीं कि उनका क्या हुआ और उनके परिजनों के हाल कैसे बेहाल रहे। जहां खाना नसीब नहीं वहां इम्युनिटी की बात अफ़सोसनाक। कितने कोरोना पीड़ित हैं, कितनों का इलाज हो रहा,कितने होम कोरोन्टीन है,कितने दम तोड़ चुके ? इनके आंकड़े हैं कहां?जो जानकारी मिलती है सिर्फ सरकारी अस्पतालों की।कुल मिलाकर बहुत बुरा हाल है तभी तो, श्मशान, कब्रिस्तान की धधकती चिताओं को सच माना जा रहा है अब तो पावन नदियां भी लाशें उगल रही हैं दूर दराज अंचलों की कौन ख़बर देगा चारों तरफ़ मौत का सन्नाटा है और कोरोना कर्फ्यु है।शर्मनाक तो अहमदाबाद से आई यह ख़बर भी है कि एक जत्था हिंदू कौम का मुर्दों के कफ़न और कपड़े उतारने के बाद बेचने का काम करते पकड़ा गया

ऐसे जुल्मी दौर में भी तबलीगी जमात के लोग हों या सिख धर्मावलंबी अपनी सेवा भावना की अलख जगाए हुए हैं जिन्हें पाकिस्तानी और खालिस्तानी जैसे शब्दों से लांछित किया गया।वे ना केवल बीमारों की सेवा कर रहे हैं बल्कि उन लाशों का भी उनके धर्मानुसार संस्कार कर रहे हैं जिन्हें उनके परिजन छोड़कर मुखमोड़ लिए।सिख भाइयों ने सड़क पर ज़रुरत मंदों को जिस तरह सड़कों पर ऑक्सीजन देकर प्राणदान दिए वह जीवनपर्यंत लोग याद रखेंगे ।अब समाज सेवी संस्थाएं भी आगे बढ़कर मरीज और उनके परिजनों के खाने पीने के इंतजामात में सहभागिता निभा रही हैं कई रिटायर्ड चिकित्सक भी सेवाएं दे रहे हैं । मुझे पुणे के एक बुजुर्ग याद आ रहे हैं जिन्होंने एक युवा मरीज के लिए स्वेच्छा से बेड छोड़ दिया यह कहकर कि उसका जीवन महत्वपूर्ण है मैंने बहुत जी लिया ।बेड छोड़ने के बाद चंद घंटों में उन्होंने दुनिया छोड़ दी।उनका ये बलिदान मिसाल है ।ऐसे लोगों की जो पूजनीय हैं।आज समाज को ऐसे भलमनसाहत से लैस लोगों की ज़रूरत है। सरकार के भरोसे बैठना निरी मूर्खता होगी । आइए हाथ बढ़ाएं अपने सकल समाज की रक्षा से मानवता कलंकित होने से बचेगी ।हम सबके प्रयास इस उदास और सन्नाटे भरे माहौल को बदलने की सामर्थ्य रखते हैं।बुरे वक्त को हम ही विदा करेंगे । बुराईयों पर अच्छाई ने सर्वदा विजय पाई है।उन मृतात्माओं को भी यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी यदि हम अधिक से अधिक लोगों के लिए मददगार बन सकें।

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