अग्नि आलोक

मोदी सरकार के लिए चुनौती है राहुल और लालू प्रसाद यादव

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अमिता नीरव

फिलहाल मोदी सरकार के सामने राजनीतिक तौर पर राहुल गांधी और लालू प्रसाद यादव दो लोग चुनौती हैं। सरकार दोनों को अलग-अलग तरह से प्रताड़ित कर रही है। विपक्ष के बाकी सारे नेताओं को सरकार अपनी तरह से सेट कर चुकी है। मायावती के मुरीदों को यह बात चुभ सकती है, लेकिन किसी वक्त में ‘तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’ का नारा देने वाली बहनजी ने इन दिनों मोदी की सरपरस्ती स्वीकार कर ली है। (आपके सर्टिफिकेट्स सादर स्वीकार्य है)

उन दिनों नईदुनिया के बिकने की खबरें हवाओं में चल रही थी। हालाँकि इस तरह की खबरें तबसे सुन रहे थे, जबसे अखबार ज्वॉइन किया था, इसलिए उसे भी हमने अफवाह ही माना था। मगर इसकी तस्दीक तब होने लगी जब मार्च के महीने में पुराने और वरिष्ठ संपादकों से इस्तीफे लिए जाने लगे। धीरे-धीरे अखबार का माहौल बदलने लगा। अब हर खबर पर यकीन होने लगा था। अखबार में नए संपादक आ गए थे।

अखबार का दफ्तर अब भी बाबू लाभचंद छजलानी मार्ग वाले नईदुनिया के कंपाउंड में लगता था। दीपावली-दशहरे के बीच के दिन थे, काम का दबाव था इसलिए देर शाम तक दफ्तर में ही थी। खबर आने लगी कि अखबार के दफ्तर के पीछे बने छजलानी परिवार के घर पर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट का छापा पड़ा है। अचंभा हुआ, अभी ऐसा क्या हुआ है जो नईदुनिया के पूर्व मालिकों के घर पर छापा पड़ा।

समझ आया कि अब अखबार की ताकत नहीं बची है। सरसरी तौर पर तो यह बड़ी रूटीन-सी कार्रवाई थी, लेकिन इससे उस पुरानी बात को समझने में मदद मिली कि सिर्फ कानून बनाना ही काफी नहीं होता है, कानून का इम्प्लीमेंट ज्यादा महत्वपूर्ण चुनौती है। तभी यह भी समझ आया कि दुनिया में कितना ही फुलप्रूफ कानून बना लिया जाए, सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि कानून लागू करने वाले की नीयत क्या है?

जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी तो ‘जीजाजी’ और ‘दामादजी’ पर खुद हमारे माननीय से लेकर उनका अदना समर्थक तक व्यंग्य करते थे। सोनिया गांधी और प्रियंका के लिए क्या-क्या अभद्रता इस सरकार और सरकार के समर्थकों ने की है, उसका तो कोई हिसाब ही नहीं है। राहुल को ‘पप्पू’ साबित करने के लिए इस सरकार ने कितना पैसा, ऊर्जा, संसाधन और लोग खर्च किए गए है उसे कौन नहीं जानता है!

आखिर राहुल यदि पप्पू है तो फिर सरकार को उससे इतनी असुरक्षा क्यों है? क्योंकि सरकार दोहरा खेल खेल रही है, एक तरफ वह आम आदमी में राहुल की पप्पू वाली छवि को लगातार बनाए रखने को कटिबद्ध है और दूसरी तरफ वह राहुल को सवाल करने से रोकने के सारे हथकंडे अपना लेना चाहती है। राहुल को कितना कम मीडिया कवरेज मिलता है इसे भारत जोड़ो यात्रा के दौरान देख लिया।

चीन के कब्जे से लेकर, पुलवामा हमले, अडानी कनेक्शन और अब हिंडेनबर्ग रिपोर्ट पर सवाल करते राहुल लगातार सरकार के लिए असुविधा पैदा कर रहे थे। इस बीच बीजेपी कैंब्रिज के उनके भाषण को मुद्दा बनाकर लगातार संसद में गतिरोध पैदा कर रही है, जबकि इससे पहले खुद माननीय कई मौकों पर भारत को बदनाम करते आए हैं और यदि आप थोड़े भी जागरूक हैं तो विदेशी मीडिया में भारत की छवि को आसानी से बूझ पाएँगे।

मोदी सरकार विदेश में लगातार देश और देश के लोगों की छवि खराब कर रही है, मगर हम मुदित मगन होकर देख ही नहीं पा रहे हैं। इस वक्त में देश में राहुल अकेले विपक्षी है जो लगातार सवाल कर रहे हैं। अखिलेश यादव, मायावती, ममता बैनर्जी, नीतिश कुमार सहित पूरा विपक्ष चुप है। खुद कांग्रेस के नेता भी राहुल के साथ उस तरह से खड़े नजर नहीं आते हैं, जिस तरह से उनकी पार्टी को उनके साथ खड़ा होना चाहिए था।

क्यों है ऐसा कि अघोषित इमरजेंसी के दौर में विपक्ष के सारे बड़े नेता चुप हैं? किस डर औऱ असुरक्षा की वजह से वे सरकार की मनमानी और लगातार संविधान और संवैधानिक संस्थाओं के सरकारी अतिक्रमण को लेकर चुप हैं? जाहिर-सी बात है कि ईडी, पुलिस और कानून का सहारा लेकर सरकार विपक्ष को डरा रही है, मगर विपक्ष डर क्यों रहा है? क्या चीज है जो उससे छिन जानी है, थोड़ा सोच लीजिए।

जो लोग 1975 की इमरजेंसी पर अब तक रो रहे हैं, उन लोगों को इस वक्त की अघोषित इमरजेंसी दिखाई नहीं दे रही है, ये बात मुझे चमत्कृत करने से ज्यादा वितृष्णा से भर रही है। सरकार लगातार संविधान का अतिक्रमण औऱ संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग कर रही है। आज सुबह अखबार में देखा अनुराग ठाकुर ज्ञान दे रहे हैं। ये वही अनुराग ठाकुर है जिन्होंने शाहीन बाग आंदोलन के दौरान ‘देश के गद्दारों को गोली मारो सालो को’, नारा दिया था।

मोदी जी कपड़ों से पहचान लेते हैं तो हमारे गृहमंत्री चुनाव से पहले 2002 के गुजरात दंगों में सरकार की भूमिका की तस्दीक करते हुए फिर से धमकी देते हैं औऱ किसी के कान पर जूँ नहीं रेंगती है। बिल्किस बानो के अपराधियों को सरकार बरी कर देती है और किसी को नहीं लगता है कि देश में मनमानी चल रही है। सुधा भारद्वाज, वरवर राव, आनंद तेलतुंबडे, स्टेन स्वामी आदि की गिरफ्तारी भी आपकी आँखें नहीं खोल रही है।

आप क्रोनोलाजी समझिए, हिंडेनबर्ग रिपोर्ट आने से पहले राहुल चीन पर औऱ अडानी कनेक्शन पर भी सवाल उठा रहे थे। रिपोर्ट आने के बाद राहुल ज्यादा आक्रामक हो गए थे, इससे पहले तमाम षडयंत्र के बावजूद राहुल की #भारत_जोड़ो_यात्रा ने राहुल का कद बढ़ाया था। अब राहुल लगातार हर मंच से सवाल उठा रहे थे। उन पर दबाव डालने के लिए तरह तरह के मामले जिंदा हुए।

कुछ नहीं तो यात्रा के दौरान बलात्कार पीड़ितों से राहुल की बातचीत को लेकर ही पुलिस राहुल के घर पूछताछ के लिए पहुँच गई। कैंब्रिज के भाषण पर सरकार औऱ उनकी भेड़ें राहुल पर आक्रामक हुई हैं, इसी के चलते सरकार खुद अपनी ही संसद को नहीं चलने दे रही थी। न याद हो तो याद कर लीजिए, विपक्ष में रहते हुए यही लोग संसद चलाना सरकार की जिम्मेदारी कहा करते थे।

ये आपको इत्तफाक लगता होगा, मगर है नहीं कि इसी वक्त गुजरात की एक कोर्ट एक पुराने मामले में पहले राहुल को सजा सुनाती है और अगले ही दिन लोकसभा अध्यक्ष, जिन्हें संवैधानिक रूप से तटस्थ होना चाहिए था, द्वारा राहुल की सदस्यता निरस्त कर दी जाती है। यदि ये सब आपको इत्तफाक और विधि सम्मत लगता है तो आपको खुद को सुपर-सुपरलेटिव डिग्री वाला क्यूट समझ लेना चाहिए।

इसी बीच कन्नड़ अभिनेता और जाति विरोधी कार्यकर्ता चेतन कुमार को हिंदुत्व विरोधी ट्वीट करने का आरोप लगाकर गिरफ्तार किया गया औऱ न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया, यदि आपको अब भी इमरजेंसी की विधिवत घोषणा का इंतजार है तो असल में आप मासूम नहीं शातिर हैं। यहाँ मसला राहुल की सदस्यता नहीं है। यहाँ मसला ‘राइट टू स्पीच’ के मेरे संवैधानिक अधिकार का है। यदि राहुल गांधी को सवाल पूछने से रोका जा सकता है तो आप-हम क्या चीज हैं?

कल उद्वेलित थी, इसलिए कुछ नहीं लिखा। आज लगता है कि हमारी पीढ़ी तक आते-आते आजादी अपना अर्थ खो चुकी थी। 1947 से पहले की पीढ़ी ने आजादी के लिए संघर्ष किया, 1975 में फिर से इसी आजादी और संवैधानिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया गया। हमारी पीढ़ी को आजादी उपहार में मिली है और जब तक हम खुद नहीं कमाए, हमें चीजों की कीमत नहीं होती है।

फिर से आजादी के लिए लड़ने का वक्त आ खड़ा हुआ है। 1947 से पहले यही लोग अंग्रेजों के सहयोगी थे, मगर देश ने संघर्ष किया औऱ आजादी पाई। 1975 में जिन लोगों ने आजादी की लड़ाई लड़ी आज वे ही आजादी को कुचल रहे हैं। आज हमारी बारी है, अपने अधिकारों के लिए लड़ने की। क्योंकि राहुल गांधी तो एक प्रतीक है, सरकार, राहुल या ऐसे ही पोलिटिकल या सोशल इलिट को दबाकर संदेश जनता को दे रही है।

इस वक्त भी बहुसंख्यक लोग सरकार के साथ खड़े होकर अपने अधिकारों को खुद ही सरेंडर कर रहे हैं। ऐसे लोग 1947 में भी थे, 1975 में भी और आज भी होंगे ही। मगर फिर भी लड़ाई रूकी नहीं, हमें भी लड़ना पड़ेगा, अपने अधिकारों के लिए, अपनी स्वतंत्रता के लिए। आप जो इस निर्णय को कानून सम्मत बताकर आनंदित हैं, इतिहास में आप भी देश की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कहे जाएँगे।

यदि आप किसी पार्टी के अनुयायी नहीं, नागरिक हैं तो राहुल के साथ खड़ा होना पड़ेगा।

अमिता नीरव

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