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रजक का श्वान ईमानदार

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शशिकांत गुप्ते

मनुष्य के अंदर विभिन्न प्रकार की कला विद्यमान होती है। चित्रकला,लेखनकला,
नृत्यकला,जादुईकला,अभिनयकला आदि आदि।
अभिनयकला के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के अभिनय करने की कला होती है। हास्य अभिनय के साथ मिमिक्री करना भी कला है। मिमिक्री करने वाले कलाकार विभिन्न व्यक्तियों की आवाज हूबहू निकाल लेतें हैं। बहुत से कलाकार विभिन्न व्यक्तियों की सिर्फ आवाज ही नहीं निकालते हैं,बल्कि उनकी हूबहू नकल भी कर लेतें हैं।
बहुत से कलाकार विभिन्न पशु-पक्षियों की भी हूबहू आवाज निकाल लेतें हैं।
पशु-पक्षियों की आवाज निकालना बहुत कठिन कला है।जो मनुष्य विभिन्न पशु-पक्षियों आवाज निकालतें हैं,वे लोगों का मनोरंजन करतें हैं। मनुष्य के मुँह से पशु-पक्षियों की हूबहू आवाज सुनकर लोगों को मजा आता है।
मनुष्य द्वारा पशु-पक्षियों की आवाज निकालना निश्चित ही कला है,लेकिन बहुत सी बार मनुष्य पशु-पक्षियों की आवाज निकलाते स्वयं पशु-पक्षियों जैसा व्यवहार करने लगता है?
मनुष्य श्वान की आवाज निकलते हुए दूसरे मनुष्य को श्वान कहने लगता है। श्वान भी कोई साधारण नहीं रजक के श्वान की उपमा देने लगता है। कारण ऐसा कहा जाता है कि, रजक का श्वान ना तो घर का होता है,ना ही घाट का।
जब कोई मनुष्य दूसरें मनुष्य को श्वान की उपमा देता है, तो यह भूल जाता है कि, श्वान की आवाज तो वो स्वयं निकाल रहा है।
जो भी हो नकल भी एक कला है।
नकल करने वालों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि, नकल करते समय अकल का भी उपयोग करें।
सर्वांग सम्पन्न व्यक्ति अंधे, लूले, लंगड़े, की नकल करता है। यह गलत है। इस तरह की नकल करना मतलब विकलांग लोगों की मज़ाक उड़ाना ही तो है। यह घोर निंदनीय कार्य है। मज़ाक करना और मज़ाक उड़ाने में बहुत अंतर है।
मनुष्य में एक विशेष गुण होता है। मनुष्य अपने बिरादरी के ही दूसरें मनुष्य पर जब क्रोध करता है, तब उसे विभिन्न पशु-पक्षियों की उपमाओं से नवाज़ता है।
जब किसी मनुष्य को श्वान की उपमा दी जाती है। तब उपमा देने वाला यह भूल जाता है कि श्वान बहुत ही ईमानदार प्राणी है।
एक गम्भीरता सोचने वाली बात है। क्या कभी ईमानदार व्यक्ति को श्वान कहा जा सकता है?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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