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राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी

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सत्य वीर सिंह

इन्सान द्वारा इन्सान के शोषण का ख़ात्मा’ के नारे के साथ, 1917 की बोल्शेविक क्रांति से प्रेरणा लेते हुए शहीद-ए-आज़म भगतसिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और साथी क्रांतिकारियों ने 1924 में ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी’ की स्थापना की थी. राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी उसके एक प्रमुख सदस्य थे जो संगठन में होने वाली सैधांतिक बहसों में प्रमुखता से हिस्सा लेते थे. उनका जन्म बंगाल प्रेसीडेंसी के पबना ज़िले के एक धनी जमीदार घराने में 29 जून 1901 को हुआ था.

उन्हें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दाखला दिलाया गया था जहाँ वे प्रमुख क्रांतिकारी और HRA के संस्थापक सदस्यों में से एक शचीन्द्रनाथ सान्याल के संपर्क में आए. राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी BHU में स्टूडेंट्स यूनियन के सेक्रेटरी थे. उन्होंने सान्याल द्वारा सम्पादित बंगला पत्रिकाओं, ‘बंगबानी’ और ‘शंका’ में लिखना शुरू किया. उसके बाद उन्होंने हस्तलिखित पत्रिका ‘अग्रदूत’ में भी लिखना शुरू किया. उन्हें बनारस जिले का HSRA जिला सचिव चुना गया था. पुलिस जब उनके पीछे पड़ी तब उन्होंने छद्म नाम चारू, जवाहर और जुगलकिशोर से क्रांतिकारी कार्यवाहियां ज़ारी रखीं. 9 अगस्त 1925 को काकोरी स्टेशन पर गाड़ी को चेन खींचकर रोकने की ज़िम्मेदारी राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने ही संभाली थी. उसके पहले भी लाहिड़ी यू पी में पार्टी के लिए चन्दा इकठ्ठा करने की कई कार्यवाहियों में हिस्सा ले चुके थे. ‘नास्तिकता’ और मार्क्सवाद- समाजवाद विषयों पर स्टडी क्लास राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और मन्मथनाथ गुप्ता ही लिया करते थे. रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्लाह खान और चंद्रशेखर आज़ाद नास्तिक नहीं थे, ख़ुदा-भगवान को मानते थे और लाहिड़ी उनके साथ खूब बहस किया करते थे. चंद्रशेखर आज़ाद ये कहकर बहस को हल्का बना देते थे कि ठीक है, भैया, हम ठहरे पुराने क्रांतिकारी और तू नया क्रांतिकारी!!   

राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी की गिरफ़्तारी 10 नवम्बर 1925 को कलकत्ता में हुई, वे उस वक़्त HSRA में भरती के लिए युवाओं को तैयार कर रहे थे. ग़ैर कानूनी क्रांतिकारी राजनीतिक काम करने के जुर्म में उन्हें पहले 10 साल की कालापानी की सज़ा हुई थी. बाद में जब उन्हें काकोरी कांड में संलिप्त पाया गया तब उन्हें गोंडा जेल लाया गया. उन्हें फांसी की सज़ा हुई और रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्लाह खान और और रोशनसिंह की तरह उनकी फांसी की तारीख भी 19 दिसम्बर ही तय हुई थी. मन्मथनाथ गुप्त और कई दूसरे क्रांतिकारियों ने उन्हें गोंडा जेल से छुड़ाने की योजना बना ली थी लेकिन अंग्रेजों को पता चल गया और 26 वर्षीय राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को दो दिन पहले आज ही के दिन 17 दिसम्बर 1927 को गोंडा जेल में फांसी पर लटका दिया गया. वे दुनिया के पहले क्रांतिकारी थे जिन्हें फांसी के तय दिन से दो दिन पहले ही फांसी दे दी गई. 
हमारी गौरवशाली क्रांतिकारी विरासत जिंदाबाद- – इंक़लाब जिंदाबाद
*सत्य वीर सिंह*

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