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राजमाता से लोकमाता…

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देवी
अहिल्याबाई होल्कर

भारतीय दर्शनशास्त्र में सद् विचार और सदाचरण को भी धर्म माना गया
है और जिसमें ये दो गुण है वही राजा या शासक जनमानस को सुख
पहुंचा सकता है। 18वीं सदी में ऐसे ही गुणों की धनी थी देवी
अहिल्याबाई होल्कर। वो न सिर्फ वीर योद्धा, कुशल निशानेबाज थीं
बल्कि कुशल प्रशासक भी थी। जिन्होंने जन कल्याण के बहुत से कदम
उठाए और धर्म के मार्ग पर चलते हुए न सिर्फ राज्य में बल्कि राज्य
की सीमा के बाहर भी मंदिर और पवित्र घाटों का निर्माण कराया। यही
कारण है कि उन्हें लोक माता कहा गया।

जन्म: 31 मई 1725 मृत्यु: 13 अगस्त 1795

देवी अहिल्याबाई होल्कर का जन्म साधारण से किसान के घर में 31
मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर के छौंड़ी ग्राम में हुआ था। उनके
पिता मन्कोजी राव शिंदे, अपने गांव के पाटिल थे। उस समय महिलाएं

स्कूल नही जाती थीं, लेकिन अहिल्याबाई के पिता ने उन्हें लिखने -पढ़ने
लायक बनाया। मालवा के राजा मल्हार राव होल्कर एक बार छौंड़ी में
रुके हुए थे वहां उन्होंने छोटी सी अहिल्या को देखा तो उनकी बुद्धिमता
से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अहिल्या को अपनी पुत्रवधु बनाने का
निश्चय कर लिया। 1733 में अहिल्याबाई होल्कर का विवाह खांडेराव
होल्कर से हुआ। जिसके बाद पुत्र मालेराव और पुत्री मुक्ताबाई का जन्म
हुआ। अल्पायु में ही अहिल्याबाई के पति खांडेराव होल्कर का 1754 के
कुम्भेर युद्ध में देहांत हो गया और 12 साल बाद उनके श्वसुर मल्हार
राव होल्कर की भी मृत्यु हो गयी। इसके एक साल बाद ही उन्हें मालवा
साम्राज्य की महारानी का ताज पहनाया गया।
शिव के प्रति उनके समर्पण भाव का पता इस बात से चलता है कि
अहिल्याबाई राजाज्ञा पर हस्ताक्षर करते समय अपना नाम नहीं लिखती
थी, बल्कि पत्र के नीचे केवल श्री शंकर लिख देती थी। उनके रुपयों पर
शिवलिंग और बिल्व पत्र का चित्र और पैसों पर नंदी का चित्र अंकित है।
ऐसा कहा जाता है कि तब से आजादी मिलने तक इंदौर के सिंहासन पर
जितने भी नरेश बैठे, सबकी राजाज्ञा बिना श्रीशंकर का नाम अंकित किए
जारी नहीं की गई। बिना श्रीशंकर वाली राजाज्ञा को कोई राजाज्ञा नहीं
मानता था और उस पर अमल भी नहीं होता था।
देवी अहिल्याबाई एक कुशल राजनीतिज्ञ भी थी। एक बार मराठा
पेशवाओं ने उनके शासन को कमजोर समझ कर कब्जा करने के लिए

मालवा को घेर लिया। तब उन्होंने राजनीतिक कुशलता वाला एक पत्र
मराठा पेशवाओं को भेजा जिसमें लिखा था- यदि वह स्त्री सेना से जीत
हासिल भी कर लेंगे, तो उनकी कीर्ति और यश में कोई बढ़ोत्तरी नहीं
होगी, दुनिया यही कहेगी कि स्त्रियों की सेना से ही तो जीते हैं और
अगर आप स्त्रियों की सेना से हार गये, तो कितनी जग हंसाई होगी आप
इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते। अहिल्याबाई की यह बुद्धिमानी
काम कर गई और पेशवा ने आक्रमण करने का विचार त्याग दिया।
आधुनिक भारत के गिनेचुने नेता हुए हैं जिन्होंने देवी अहिल्याबाई
होल्कर के सनातन धर्म के सिद्धांत और उनके दर्शन के साथ कदम
मिलाकर चलने का प्रयास किया है। उनमें प्रधानमंत्री मोदी का नाम
सर्वोपरि है। इतिहासकार जॉन केय ने जिस प्रकार अहिल्याबाई होल्कर
को फिलॉसफर क्वीन कहा था, उसी प्रकार कई लोगों ने मोदी के शासन
की तुलना उनके प्रभावशाली, मजबूत व जनकल्याणकारी शासन के साथ
की है। परंतु सच्चाई यह है कि दोनों के शासन में उससे भी कहीं
अधिक समानताएं दिखाई देती हैं। देवी अहिल्याबाई ने अपने जीवनकाल
में कई मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया, जो आक्रांताओं और अंग्रेजी शासकों
के अत्याचारों के शिकार हुए थे। उन्होंने काशी विश्वनाथ मंदिर का
पुननिर्माण कराया। ध्वस्त हो चुके सोमनाथ मंदिर के समीप दो मंजिला
मंदिर बनवाया। मंदिरों के पुनरोद्धार को लेकर ठीक वैसी ही समानताएं
मौजूदा समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों में देखी जा सकती हैं।

अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर का भूमि पूजन हो या काशी
विश्वनाथ कॉरिडोर अथवा चार धाम परियोजना के साथ- साथ केदारनाथ
और बद्रीनाथ मंदिर परिसरों का कायाकल्प, हर जगह प्रधानमत्री नरेंद्र
मोदी की अगुवाई में इन पौराणिक और धार्मिक स्थलों को उनका दिव्य
एवं भव्य रूप वापस मिल रहा है।

अहिल्याबाई ने भूमि राजस्व प्रबंधन की प्रक्रियाएं सरल बनाई थीं, मोदी
सरकार भी भू-प्रबंधन के सरलीकरण में जुटी है। स्वामित्व योजना के
जरिए जमीन के रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण
कार्य हो रहे हैं। अहिल्याबाई ने महेश्वर में स्थानीय हथकरघा उद्योग का
विकास कर दुनिया को महेश्वर साड़ी की सौगात दी। मोदी भी ‘वोकल
फॉर लोकल’ के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। n

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