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राम भरोसे भारत?

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शशिकांत गुप्ते

मौजूद सियासी हालात पर प्रख्यात शायर बशीर बद्रजी की एक रचना के शेर एकदम मौजु हैं।
रहनुमाओं को नसीहत देने के लिए यह शेर प्रासंगिक है।
ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे

इतिहास में सब लिखा जाता है।यदि स्तुतिगान लिखने वालों से इतिहास लिखवाया भी जाएगा तब भी शोधकर्ताओं की कलम को कोई रोक नहीं सकता है।शोधकर्ताओं की कलम यहीँ बयां करेगी
ख़तावार समझेगी दुनिया तुझे
अब इतनी भी ज़्यादा सफ़ाई न दे

तपस्या में कमी रह गई यह सफाई नहीं है। एक तो यह अपनी कमजोरी छिपाने की कोशिश है।दूसरा पहलवान चित भी हो जाए तो कहता है,टांग तो मेरी ऊपर थी।
बहरहाल लोकतंत्र में जो देश की मालिक जनता है। लेकिन
जनता में भी उन लोगों के लिए हैं यह शेर मौजु है, जो अंधभक्ति लीन है उनके लिए है।ये लोग तमाम बुनियादी समस्याओं से जूझते हुए आपस में एक दुसरें से कहतें हैं।
हँसो आज इतना कि इस शोर में
सदा सिसकियों की सुनाई न दे

लोकतंत्र में भी हुक्मरानों के जुल्म की इंतेहा पर शायर कहता है।
अभी तो बदन में लहू बहुत
कलम छीन ले रोशनाई न दे

तमाम समस्याओं के हल करने के लिए वादों को जुमलों की बदलने की साजिश को कामयाब करने के लिए ऊलजुलूल मुद्दों से भटकाने के प्रयास पर यह शेर कहा है।
मुझे अपनी चादर से यूँ ढाँप लो
ज़मी आसमाँ कुछ दिखाई न दे

जुल्म से लड़ने वाले हमेशा कुछ ही होतें हैं।जो लोग जुल्म सहने के आदी हैं,उनके यह शेर है।
गुलामी को बरक़त समझने लगें
आसीरो (जीरो,शून्य) को ऐसी रिहाई न दे

जो जागरूक हैं।सजग हैं।किसी भ्रांति में नहीं आतें हैं हर जुल्म के ख़िलाफ़ क्रांति करने का जुनून रखतें हैं,उनके लिए शायर कहता है।
मुझे ऐसी जन्नत नहीं चाहिए
जहाँ से मदीना(पवित्र शहर) दिखाई न दे

भगवान,खुदा, गॉड जिस नाम से पुकारो सब एक ही ईश्वर के नाम है।
भगवान के अस्तित्व को लेकर शायर कहता है।
खुदा ऐसे इरफ़ान का नाम है
रहे सामने और दिखाई न दे

इरफ़ान का हिंदी अनुवाद होता है।बुद्धि,विवेक, ब्रह्मज्ञान, तमीज आदि।
भगवान के अस्तित्व बारें प्रख्यात गीतकार इंदीवरजी ने सन 1970 में प्रदर्शित फ़िल्म यादगार में लिखे गीत में स्पष्ट किया है।
आये जहाँ भगवान से पहले किसी धनवान का नाम
उस मंदिर के द्वार खड़े खुद, रोये कृष्ण को राम
धनवान को पहले मिले भगवान के दर्शन
दर्शन को तरसता रहे जो भक्त हो निर्धन
ये दक्षिणा की रीत, ये पंडो को छ्लावे
दुकान में बिकते हुए मंदिर के चढ़ावे
ऐसे ही अगर धरम का व्यापार चलेगा
भगवान का दुनिया में कोई नाम न लेगा
ऐसी जगह पे जा के तू कुछ भी न पाएगा
भगवान ऐसा मंदिर खुद छोड़ जाएगा
वो खेत में मिलेगा, खलिहान में मिलेगा
भगवान तो ऐ बन्दे, इन्सान में मिलेगा
गंगा से भी है पावन, मजदूर का पसीना
पानी न कोई समझे, अनमोल ये नगीना

भारत के निर्माण में योगदान को लेकर यह नारा सदा प्रासंगिक है।
कौन बनाता हिंदुस्तान?
भारत का मजदुर किसान

आज दुर्भाग्य से मजदूर और किसान ही बदहाली में है।
लेखक का स्पष्टीकरण है कि, लेख में लिखें शेर शायर बशीर बद्रज के हैं।गीत इंदीवर जी ने लिखा है।
लेखक ने सिर्फ संदर्भ के लिए शेर और गीत की पंक्तियों का उपयोग किया है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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