– तेजपाल सिंह ‘तेज’
हमारे समय की राजनीति ने राम राज्य को एक ऐसे पोस्टर में बदल दिया है, जिसे हर चुनाव के मौसम में दीवारों पर चिपका दिया जाता है और मतदान के बाद धीरे-धीरे उखड़ने दिया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या राम राज्य आदर्श के रूप में कभी पोस्टर था? या वह एक ऐसी कल्पना थी जहाँ न्याय राजा की घोषणा से नहीं, उसकी नीयत से निकलता था? आज जब हम आधुनिक लोकतंत्र में साँस ले रहे हैं, तो राम राज्य की ओर लौटने का वादा करने वाले नेता यह बताना भूल जाते हैं कि लोकतंत्र किसी राजा की नीयत नहीं, जनता की निगरानी पर चलता है।राजा कितना भी अच्छा हो, लोकतंत्र कहता है—"माफ कीजिए, भरोसा नहीं, व्यवस्था चाहिए।" राम राज्य एक ऐसी कहानी है जिसमें राजा खुद नैतिकता का मॉडल होता है। उसके व्यक्तिगत चरित्र से शासन का चरित्र तय होता है। लेकिन लोकतंत्र कहता है कि किसी एक व्यक्ति की नैतिकता पर पूरा देश टिका नहीं रह सकता। लोकतंत्र को मजबूत संस्थाएँ चाहिए—न्यायपालिका, मीडिया, संसद, स्थानीय निकाय—ताकि किसी भी शासक का मन अगर कभी डगमगा जाए, तो व्यवस्था उसे रास्ते पर रख सके। राम राज्य में राजा की नज़र में सब बराबर थे; लोकतंत्र में यह बराबरी कानून की नज़र से आती है, न कि किसी शासक की करुणा से। राम राज्य आदर्श था कि राजा दया करेगा।लोकतंत्र आदर्श है कि अधिकार तय होंगे, जिन्हें किसी राजा की दया पर छोड़ना नहीं पड़ेगा। राम राज्य में प्रजा परिवार थी—राजा उसका अभिभावक। लेकिन आधुनिक लोकतंत्र में नागरिक अभिभावक नहीं, बराबरी के दावेदार हैं। उन्हें प्रश्न पूछने हैं, असहमति जतानी है, और अगर शासन गलत दिशा में जा रहा हो तो उसे सुधारने का अधिकार भी है। राम राज्य में प्रश्न एक तरह से अनावश्यक माने जाते थे—अगर राम जैसे राजा हों तो क्या प्रश्न और क्या शिकायत? लेकिन लोकतंत्र इस विचार को खतरनाक मानता है।वह कहता है कि यदि जनता प्रश्न पूछना छोड़ दे, तो लोकतंत्र बचता ही नहीं। वह सिर्फ एक रूपक बनकर रह जाता है, जैसा कि आज कई जगहों पर होता दिख रहा है। धर्म की भूमिका पर भी दोनों के रास्ते अलग हैं। राम राज्य में धर्म शासन का नैतिक फ्रेम है—लेकिन यह धर्म शास्त्रों का नहीं, एक नैतिक अनुशासन का धर्म है। आधुनिक लोकतंत्र कहता है कि राज्य धर्म से दूरी रखेगा, क्योंकि इस देश में राम, रहीम, गुरु नानक, यीशु और बुद्ध—सबके मानने वाले रहते हैं। धर्म शासन का प्रेरक हो सकता है, लेकिन शासन का आधार नहीं। लोकतंत्र पूछता है कि किस राम राज्य की बात आप कर रहे हैं? उस राम राज्य की जिसमें शूद्र को दंड मिलता है? या उस राम राज्य की जिसमें एक राजा अपने व्यक्तिगत नैतिक द्वंद्व के कारण अपनी पत्नी को त्याग देता है? क्या इन हिस्सों को भी आधुनिक राज्य अपना ले? या राम राज्य का उपयोग राजनीतिक पोस्टर भर है, जिनमें सिर्फ मनचाहे हिस्से दिखाए जाते हैं?और जब आदर्श इतना जटिल हो, तो तुलना भी सीधी नहीं होती। राम राज्य एक नैतिक प्रतिमा है, लोकतंत्र एक संस्थागत ढाँचा। एक दिल से चलता है, दूसरा दिमाग से। एक भावुक है, दूसरा प्रक्रियात्मक। एक में राजा बदलता है तो पूरा शासन बदल जाता है; दूसरे में राजा बदल जाए तो भी संविधान वही रहता है। यही लोकतंत्र की ताकत है—वह आदर्श व्यक्ति नहीं, आदर्श व्यवस्था गढ़ता है। आज भारत को राम राज्य की जरूरत नहीं, उसके मूल्यों की जरूरत है—न्याय, समानता, करुणा, ईमानदारी। लेकिन हमें आधुनिक लोकतंत्र की प्रक्रिया भी चाहिए—स्वतंत्र न्यायपालिका, डर से मुक्त मीडिया, सच बोलने वाली नागरिकता और जवाबदेह राजनीति। राम राज्य का उपयोग प्रेरणा के रूप में किया जाए तो वह समाज को मानवीय बना सकता है; लेकिन उसे राजनीति के नारे में बदल दें, तो वह समाज को विभाजित भी कर सकता है।
आखिर में सवाल यही है: क्या हमें राम जैसा राजा चाहिए या राम जैसे नैतिक मूल्य? लोकतंत्र कहता है कि राजा चाहे कोई भी आए, मूल्य कायम रहने चाहिए। राम राज्य कहता है कि मूल्य राम में थे। लोकतंत्र कहता है कि मूल्य संविधान में होने चाहिए। और शायद इसी के बीच आज का भारत खड़ा है—राम की मर्यादा और संविधान की सर्वोच्चता, दोनों को साथ लेकर। लेकिन दिशा वही सही होगी जहाँ राम राज्य का सपना नारा न बने, बल्कि न्याय और संवेदनशीलता की निरंतर जिम्मेदारी बन जाए। यही लोकतंत्र को आदर्श बनाएगा—राजा नहीं, जनता की भागीदारी से।
(https://youtu.be/3kjCOseRGps?si=OH3aelpP3TvkC4ZR)

