शशिकांत गुप्ते
सिय राम मय सब जग जानी* करहु प्रणाम जोरी जुग पानी ।।
पूरे संसार में श्री राम का निवास है,हम भगवान को हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं।
संत तुलसीबाबा ने कहा है,संपूर्ण विश्व में राम निवास करतें हैं। तुलसीबाबा के इस कथन में भगवान का व्यापक सोच प्रकट होता है।
तुलसीबाबा ने भगवान राम को सर्वशक्तिमान,सर्वव्यापी विशाल में स्वरूप में वर्णित किया है।
संतों ने कहा है Infinite is god मतलब भगवान अनंत है।
भगवान के अवतरित होने पर मतमतांतर हो सकतें हैं?
रामचरितमानस में तुलसीबाबा कहतें हैं।
जब जब होई धरम की हानि, बारहि असुर अधम अभिमानी।
तब तक धर प्रभू विविध शरीरा
हरहि दयानिधि सच्जन पीड़ा।
अर्थात् -जब -जब धर्म की हानि होती है और अधर्म सीमा पार करने लगता है, तब-तब धर्म के उत्थान के लिए मैं (ईश्वर) अनुकूल आत्मा की रचना करता हूँ अर्थात् अपने स्वरूप को धरती पर अवतरित करता हूँ।
उपर्युक्त संदर्भ पर गम्भीरता से विचार करने पर मानसिकता में ऊहापोह की स्थिति निर्मित होती है, मतलब असमजंस्यता की बनती है। कोई निश्चित सोच बन ही नहीं पाता है।
क्या जब अधर्मं असीमित होगा तब ही ईश्वर अवतरित होतें हैं?
दुर्जनों के उत्पात की इंतहा होने पर ही प्रभु अवतरित होतें हैं?
वर्तमान युग में अवतरित होंगे या नहीं? कारण वर्तमान में तो सारी राजनैतिक व्यवस्था ही राममय ही गई है।
राम भगवान पर आस्था रखने वाले रामभक्तों द्वारा दावा किया जा रहा है कि, वे राम भगवान को ला रहें हैं। मतलब राम को रामभक्त ही अवतरित करेंगे?
भक्त भगवान से बड़ा होता है,सुवाक्य सिर्फ सुना था। अब यह वाक्य चरितार्थ होने जा रहा है।
उक्त विचारों के कारण मानसिक द्वंद चल रहा था।
संयोग से इसी समय सीतारामजी का आगमन हुआ।
सीतारामजी के समक्ष उपर्युक्त विचार रखकर संतोषजनक समाधान के लिए निवेदन किया?
सीतारामजी ने कहा किसी भी विषय पर गहराई से सोचने के लिए उस विषय के पृष्टभूमि में जाना पड़ता है।
हरयुग में दानवों ने भगवान से ही वरदान प्राप्त किया है। वरदान मिलने पर दानवों ने भगवान के विरुद्ध ही बगावत की है।
दानव एक प्रवृत्ति है। दानवी प्रवृत्ति मतलब मानव के अंदर सारे अवगुणों का विद्यमान होना।
दानवों की शारिरिक रचना मानवों जैसी ही होती है। मानव शरीर में दिमाग़ भी होता ही है। दिमाग़ का उपयोग और दुरुपयोग मानवीय और दानवीय प्रवृत्ति पर निर्भर है।
प्राणी मात्र में मानव जैसा स्वार्थी प्राणी अन्य कोई भी नहीं है। यह शाश्वत सत्य है।
मानव अपने स्वार्थपूर्ति के लिए ही भगवान की भक्ति करता है। श्रद्धा से भक्ति करने वाले मानव को लोकेषणा की आवश्यकता ही नहीं होती है। लोकेषणा मतलब
सांसारिक अभ्युदय की कामना,या समाज में प्रतिष्ठा और यश की कामना।
यह तो हुई व्यवहारिक बात।
मानव को भगवान पर श्रद्धा रखनी चाहिए। अवलंबित नहीं रहना चाहिए।
हिम्मत ए मर्दा मदद ए खुदा
मानव के स्वार्थपूर्ति का प्रत्यक्ष व्यवहारिक उदाहरण हमें प्रतिदिन दिखाई देता है। यातायात के नियमों का पालन करवाने के लिए प्रत्येक चौहराए पर पुलिसकर्मियों को खड़ा होना पड़ता है। यह दृश्य हमारे अमानवीय गुण को प्रत्यक्ष दर्शाता है।
ऐसे ही बहुत से साधारण उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकतें हैं।
यह कहतें हुए सीतारामजी अपनी व्यंग्यात्मक मानसिकता में आ गए और कहने लगे,भक्तों में इतना सामर्थ्य है कि वे भगवान रामजी को ला रहें हैं। इसमें असमजंस्यता की कोई बात ही नहीं है।
रामजी का मंदिर बन ही रहा है। भगवान रामजी की मूर्ति स्थापित होगी। मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा होगी।
भारतवासियों के सारे दुःख दूर हो जाएंगे।
सारा संसार भलेही राममय होगा या नहीं लेकिन भारत निश्चित ही राममय होगा।
सीतारामजी ने बहुत ही सख़्त होकर ताक़ीद दी। अब आप बेरोजगारी, भुखमरी, महंगाई,किसानों की समक्षा,महिल उत्पीड़न,शिक्षा पद्घति में आमूलचूल परिवर्तन आदि प्रश्नों को भूल जाओ।
यह सारे प्रश्न अब गौण हो गएं हैं।
अब हम वरिष्ठ नागरिकों की सूची हैं। सांसारिक बंधनो को छोड़ भक्तिभाव में लीन हो जातें हैं।
रामभक्तों द्वारा प्रदत्त मुफ्त तीर्थयात्रा की सुविधा और दिल्ली के सूबेदार द्वारा मुहैया होने वाली मुफ्त अयोध्या यात्रा का लुफ्त उठाने के लिए तैयार रहतें हैं।
रामजी सब का भला करेंगे।
राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट
अंत काल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट
रामभक्तों द्वारा प्रदत्त सुविधाओं को लूट कहकर सुविधाओं का अपमान नहीं करना चाहिए।
बोलो जय जय सियाराम।
रामजी की जय हो।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

