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राष्ट्र चिंतन : स्वच्छता, पवित्रता और मोदीश्री का दर्शन

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पुष्पा गुप्ता

   _बहुत से लोग ट्रेन आदि में अपनी जाति और धर्म की रक्षार्थ रोटी, परांठे या पूरी बनाने के लिए आटे को दूध में मसलते हैं ताकि पास मे बैठा व्यक्ति अगर दलित या मुस्लिम समुदाय का भी हो तो उससे उसके खाने की पवित्रता नष्ट न हो।_
जहाँ ब्राह्मण की पवित्रता दलित की छाया पड़ने से भी अपवित्र हो जाती है, उनके मंदिर में प्रवेश से नष्ट हो जाती है, वहाँ ऐसी व्यवस्थाएँ स्वाभाविक हैं. ऐसी सामाजिक व्यवस्था में- जहाँ मोदीजी के स्वच्छता अभियान के नतीजे पूरी तरह हमारे सामने आ चुके हैं। स्थिति वही की वही है।

इस अभियान की असफलता के वैसे तो बहुत से कारण हैं मगर एक बड़ा कारण यह भी है कि खासकर हिंदुओं के लिए स्वच्छता और पवित्रता काफी हद तक दो भिन्न बातें हैं। इनमें परस्पर संबंध होना अनिवार्य नहीं है। कोई स्वच्छ होने से पवित्र नहीं हो जाता और कोई अस्वच्छ होने से अपवित्र भी नहीं हो जाता।
दलित-मुसलमान आदि हजार बार भी गंगा में नहा लें तो अपवित्र ही रहेंगे और ब्राह्मण देवता कई-कई दिनों से न नहाये हों, तो भी वे पवित्र रहेंगे क्योंकि पवित्रता जाति और धर्म में अंतर्भुक्त है, व्यक्ति विशेष में नहीं और पवित्रता ही सर्वोपरि हैं, स्वच्छता नहीं। स्वच्छता घऱ के अंदर हो तो ही काफी है।
हिंदू सुबह उठने के बाद सबसे पहले निवृत्त होगा, फिर नहाएगा, फिर पूजापाठ करेगा और तब जाकर नाश्ता करेगा। सामानों से अंटे पड़े घर को जितना साफ रखा जा सकता है, उतना हिंदू उसे सुबह से ही साफ रखने का यत्न करेगा यानी वहाँ पवित्रता और स्वच्छता पर्यायवाची हो सकते हैं लेकिन घर से बाहर आते ही यह रिश्ता लगभग पूरी तरह टूट जाता है।

मान लो कि घर के ठीक बाहर – वह सड़क हो या घर की सीढ़ियाँ हों- कुत्ता –बिल्ली अगर कुछ कर गया है तो हम पड़ोसी से इस आधार पर खूब बढ़िया ढँग से झगड़ा कर सकते हैं, माँबहन करना हो तो वह भी कर सकते हैं, जरूरत पड़े तो और भी ज्यादा आगे बढ़ सकते हैं मगर इसे खुद उठाकर फेंक नहीं सकते क्योंकि यह हिंदू सवर्ण और श्रेष्ठीवर्ग का काम नहीं है और जिसका है, उसे पटाकर, पैसे का लालच देकर इसे साफ करवा सकते हैं और यह किसी वजह से संभव नहीं है तो घर में आने- जानेवालों को बार-बार इससे सावधान कर सकते हैं। घर के ठीक बाहर जो भी है, वह हमारा अपना विषय नहीं है क्योंकि बाहर की गंदगी से न तो हमारी और हमारे घर की पवित्रता नष्ट नहीं होती है , न स्वच्छता।
बाहर जाने पर हमारे लिए मंदिर पवित्र हैं क्योंकि वहाँ हम दूध ,पानी, फूल, पत्ते, नारियल की ऊपरी खोल आदि यहाँ -वहाँ बिखेरने के लिए स्वतंत्र हैं। ऐसी गंदगी-कीचड़ आदि से मंदिर की पवित्रता नष्ट नहीं होती क्योंकि एक तो यह गंदगी हमने की है और दूसरे पवित्रता नदी की तरह मंदिर का भी स्वाभाविक गुणधर्म है,जिसे कोई चीज स्थायी रूप से नष्ट नहीं कर सकती।
गंगा -यमुना आदि नदियाँ भी स्वतः इतनी अधिक पवित्र हैं कि उन्हें नाले या कारखानों की गंदगी किसी भी हालत में नष्ट नहीं कर सकती, उस पवित्र जल में नहाने से रोग होते हों तो होते रहें, सब प्रभु का प्रसाद है। हमें इसमें गंदगी फैलानेवालों के विरुद्ध कुछ करने की जरूरत महसूस नहीं होती, उन पर कोई क्रोध नहीं आता, खुद गंदगी फैलानेवालों को भी कोई पापबोध नहीं होता।
हाँ सरकार अगर कुछ करना ही चाहे तो जरूर कर ले वरना पैसा ही खा ले, हम उसके भी साथ हैं वरना कोई अंतर भी नहीं पड़ता। हाँ पवित्रता हर हाल में जरूरी है।

ऐसी सामाजिक व्यवस्था में- जहाँ ये नियम टूटते-टूटते भी नहीं टूट रहे- वहाँ स्वच्छता एक बाहरी- आयातित चेतना का दर्जा ही पा सकेगी।अभी पढ़ रहा था कि एक यादव ने अपनी जाति की पवित्रता को नष्ट न होने देने के लिए अपनी बेटी को एक दलित से विवाह करने से भरसक रोका ही नहीं, बल्कि उसे सबक सिखाने के लिए उसके साथ बलात्कार करने की कोशिश भी की और उसकी हत्या होने की आशंका भी है।
कुछ साल पहले मध्य प्रदेश में एक पिछड़े परिवार की पवित्रता इससे नष्ट हो गई थी कि उसके पालतू कुत्ते ने एक दलित के घर की रोटी खा ली थी। जहाँ मंगल समझे जानेवाले कार्य एक विधवा औरत नहीं कर सकती, जहाँ मंदिर के पास मस्जिद होने से मंदिर की और हिंदू के घर के नजदीक मुसलमान का घर होने से हिंदू की पवित्रता नष्ट हो जाती हो, वहाँ स्वच्छता को जीवनमूल्यों में से एक बनाना आसान नहीं है।
(चेतना विकास मिशन)

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