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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिष्ठा खतरे में

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ऋषिकेश राजोरिया
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक इस समय बहुत ही विकट स्थिति में हैं। हिंदुत्व का डंका बजाते हुए नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद पर आसीन करने के बाद पिछले सात वर्षों में देश की जो हालत हो गई है, उससे पूरे देश में हाहाकार की स्थिति है। आगे क्या होगा, किसी को पता नहीं। स्वयंसेवक पहले निस्वार्थ सेवा करते हुए हिंदुत्व को बढ़ावा देने की बात करते थे। लेकिन मोदी सरकार बनने के बाद एजेंडा बदल गया है। अब जहां-तहां जमीनें लेने और निर्माण कार्य करने का सिलसिला जारी है। 
स्वयंसेवकों को भय है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा हार गई तो क्या होगा? अगर भाजपा हार गई तो इसका सीधा असर 2024 के लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा और 2025 में संघ का शताब्दी समारोह बहुत फीका पड़ जाएगा। स्वयंसेवक भले ही निस्वार्थ भाव से हिंदुत्व के प्रति समर्पित रहे हों, लेकिन सत्ता का रक्त उनकी दाढ़ में लगने के बाद अब स्थिति बहुत बदल गई है। सरकार के हर विभाग में संघ के स्वयंसेवकों का दखल कायम हो गया है। 
दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग के दर्जनों प्लाट संघ से जुड़ी संस्थाओं ने कब्जा लिए हैं। विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति संघ की सहमति से होती है। संघ भारत के इतिहास को फिर से लिखवा रहा है। कोरोना महामारी के कारण 2 साल ठप रही शिक्षा व्यवस्था के दौरान पाठ्यक्रमों में बहुत बदलाव कर दिए गए हैं। संघ और क्या-क्या करने वाला है, पता नहीं, लेकिन उसके इरादे खतरनाक हैं और वे कम से कम हिंदुत्व को सम्मानजनक तरीके से प्रतिष्ठित करने वाले नहीं हैं। 
अगर हिंदुत्व के नाम पर भारत को बुरी तरह बदनाम करना है तो संघ उस कार्य में लगा हुआ है। देशवासियों को सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि यह देश के लोकतंत्र पर फासीवादी ताकतों के वर्चस्व का संकेत है। अपना देश वसुधैव कुटुंबकम की भावना से चलता है। विश्व के हर धर्मावलंबी भारत में आश्रय प्राप्त करते हैं और यहां किसी के साथ धार्मिक भेदभाव की परंपरा नहीं रही है। रही बात हिंदुत्व की तो उसके खतरे में पड़ने की संभावना बिलकुल नहीं है, क्योंकि बाकी सभी धर्म सनातन धर्म की शाखा के रूप में ही प्रतीत होते हैं। 
इस समय देश जिस स्थिति में पहुंच गया है, उसका जिम्मेदार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। वह हिंदुत्व के नाम पर अनेक ऐसे कार्य कर रहा है, जिनका किसी भी तरह धर्म से संबंध साबित नहीं किया जा सकता। वह समाज में अंध विश्वास का ऐसा मायाजाल रचने में लगा हुआ है, जिसमें भारत के सनातन धर्म की प्रतिष्ठा चकनाचूर हो जाए और वह दुनिया में हंसी का पात्र बने। क्या हम ऐसा देश चाहते हैं?

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