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पाठकीय प्रतिक्रिया…*समय के साखी में प्रकाशित रसूल हमजातोव की पुस्तक “मेरा दागिस्तान”

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हरनाम सिंह

तुम अतीत पर गोली चलाओगे तो भविष्य तुम पर गोले बरसाएगा*

      प्रगतिशील साहित्य पत्रिका "समय के साखी" द्वारा सोवियत संघ के विख्यात लेखक रसूल हमजातोव की पुस्तक मेरा दागिस्तान का प्रकाशन हिंदी साहित्य के क्षेत्र में बेहद महत्वपूर्ण कार्य है। मेरे जैसा सामान्य पाठक जो अब तक मेरा दागिस्तान की उक्तियों से चमत्कृत होता रहा है, उसके लिए यह पुस्तक किसी खजाने से कम नहीं है। इस पुस्तक प्रकाशन हेतु पत्रिका की संपादक विदुषी कवियत्री आरती और उनके विद्वान परामर्शदाताओं को बधाई और धन्यवाद।
        समय के साखी का हर अंक अमूल्य और संग्रहणीय होता ही है। विश्व विख्यात लेखक रसूल हमजातोव की पुस्तक मेरा दागिस्तान पर केंद्रित यह अंक अदब के क्षेत्र में चर्चित रहा है। पुस्तक पढ़ते-पढ़ते पाठक सहज ही रसूल हमजातोव के सफर का साथी बन जाता है। उसके किस्सों, मित्रों, परिवार से जुड़ जाता है। पुस्तक के कई संवाद नई उपमाओं के साथ पाठक को गुदगुदाते हैं, चिंतन मनन करने के लिए सामग्री प्रदान करते हैं।साहित्य के क्षेत्र की कई परिभाषाएं मौलिक और निर्णायक जैसी दिखाई देती है।

     सम्पादक आरती ने " मेरे शब्द " में ठीक ही लिखा है कि मेरा दागिस्तान कुनकुने दूध से भरा गिलास है। जिसे धीरे-धीरे घूंट- घूंट पीना होगा। तभी इसका स्वाद आएगा। यह किताब दोस्तों के साथ अड्डे बाजी का सुख देती है। लेखकों के लिए प्रकाश स्तंभ सी पुस्तक सिखाती है कि उन्हें अपने इतिहास और समकालीन वातावरण को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है। संपूर्ण पुस्तक में महिलाओं का नामात्र सा उल्लेख  होना विचित्र सा लगता है। पुस्तक में रसूल जहां सोवियत व्यवस्था की सांस्कृतिक नीतियों की खामियों पर लिखते हैं, वहीं सोवियत संघ में लेखकों का किस स्तर तक ध्यान रखा जाता है उसकी भी जानकारी देते हैं।

      मेरा दागिस्तान पुस्तक उक्तियों का खजाना है जो लेखक  के अनुभवों की उपज है। रसूल के अनुसार प्रत्येक लेखक की प्रतिबद्धता मानवता के लिए होना चाहिए। उसके संपूर्ण लेखन में अपनी मातृभाषा अवार और मातृभूमि दागिस्तान है। लेखक दुनिया में कहीं भी विचरण कर ले लौटकर अपने ही गांव में सुकून पाता है। उसे अपनी मातृभाषा से बेहद प्रेम है। रसूल कहते हैं की भाषा की मातृभूमि की तरह रक्षा करना चाहिए। सहज ही हम सोचने पर विवश होते हैं कि हमने अपनी भाषा, बोलियों को किस तरह बर्बाद किया है। कई स्थानों पर रसूल लेखकों के प्रशिक्षक के रूप में भी सामने आते हैं जब वे बताते हैं कि क्या लिखना चाहिए, कैसे लिखना चाहिए, क्यों लिखना चाहिए ? रसूल हमजातोव भारत में भी आए थे और रविंद्र नाथ टैगोर से भी मिले थे। 80 वर्ष की आयु में वर्ष 2003 में उनका निधन हो गया। उनकी इस पुस्तक में से कुछ उक्तियों को वर्गीकृत करने का प्रयास किया है।

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