मुसलमानों को शिकायती सियासत से ऊपर उठना होगा
: मक़बूल अहमद सिराज
हिंदुस्तान के तक़रीबन 60 फ़ीसद मुसलमान उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पश्चिमी बंगाल, असम और इनसे बनी नई रियासतों में रहते हैं। ये तमाम रियासतें आबादी के हिसाब से तो केंद्रीय हुकूमत में बड़ा हिस्सा रखती हैं, लेकिन तालीमी, सामाजिक और मआशी (आर्थिक) लिहाज़ से काफ़ी पसमांदा हाल में हैं।
तक़सीमे-हिंद के बाद इन्हीं सूबों के मुसलमान सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए। लिहाज़ा इन रियासतों की मुस्लिम ज़ेहनियत एक तरह की मज़लूमियत (Victimhood) का रंग लिए है और उनका बयानीया (Narrative) अक्सर शिकस्त और बेबसी का एहसास कराता है। दूसरी तरफ़ इन सूबों की क़यादत मुसलमानों के शिनाख़्त (Identity) वाले मसले उठाकर अपनी सियासी पकड़ मज़बूत करती नज़र आती है।
ज़रा पीछे झांककर देखें—1986 में शाह बानो केस के बाद जो जज़्बाती उबाल मुसलमानों में पैदा हुआ, उसकी बरक़रारी के लिए इस क़यादत ने सालों तक भावनात्मक मुद्दे उठाए—जैसे सलमान रुश्दी और तस्लीमा नसरीन की किताबों पर पाबंदी, अरबों की शादियाँ, बाबरी मस्जिद, तीन तलाक की हलालत-हरामत, ईद-मिलाद-उन-नबी की छुट्टी वगैरह।
सत्तर के दशक में उर्दू, मुस्लिम पर्सनल लॉ और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे पर बहस चलती रही। जबकि हक़ीक़त यह थी कि मुसलमानों की असली ज़रूरत आधुनिक तालीम, रोज़गार, मआश (livelihood), और हाउसिंग थी। मगर जज़्बाती मसलों को Rhetoric दिया जा सकता था, जबकि तालीम और रोज़गार इल्मी और अमली काम मांगते थे, जिनके लिए संसाधन और मुसलमानों की नई तन्ज़ीम की ज़रूरत थी।
आज़ादी को आठ दहाइयाँ होने को हैं, मगर यूपी और बिहार की क़ियादत आज भी इन्हीं भावनात्मक बहसों में उलझी हुई है। इनकी ताक़त हजारों मदरसों पर टिकी है, जहाँ दर्स-ए-निज़ामी ही पढ़ाया जाता है—जो मौजूदा दौर की ज़रूरतों से बहुत दूर है। आज यूपी में 23,000 और बिहार में 4,000 रजिस्टर्ड मदरसे हैं।
इन मदरसों से निकलने वाली क़यादत उर्दू ज़बान पर पकड़ रखती है और अ’इन, ग़ैन, फ़े, क़ाफ़, शीन और ज़े का सही तर्ज़ से लहजा अदा कर लेती है—इसलिए दूसरी रियासतों के सादा-दिल मुसलमान इन्हें मुअतबर क़ियादत मान लेते हैं।
मेरे (यानी लेखक के) पास 45–47 साल की सहाफ़त (Journalism) का तजुर्बा है। 1978 में मद्रास (मौजूदा Chennai) से इंडियन एक्सप्रेस में बतौर नामानिगार/रिपोर्टर काम शुरू किया। इन बरसों में मद्रास, दिल्ली और बंगलुरु से कई अख़बारों और न्यूज़ एजेंसियों के लिए रिपोर्टिंग, कॉलम-निगारी और वाक़ियानिगारी की; देश के 250 और बाहर के 75 शहरों का दौरा किया। तजुर्बे के आधार पर कह सकता हूँ कि अगर यूपी–बिहार के मुसलमान जिस माल-ओ-मुल्क को मदरसों में लगाते रहे, उसे आधुनिक स्कूलों, कॉलेजों, कॉलोनियों, रोज़गार के अवसरों, लाइब्रेरी और तकनीकी इदारों में लगाते—तो आज हिंदी पट्टी के मुसलमान इतनी बदहाली में न होते। यूपी–बिहार के शहर बहारुल उलूम, फ़ैज़ुल उलूम, ज़ियाउल उलूम जैसी तख्तियों से भरे पड़े हैं, और ज़्यादातर चंदा इन्हीं में जाता है, जबकि कुछ मौलवी साहब उसी पैसे से हर साल डीलक्स उमरा भी कर आते हैं।
ऐसे माहौल में सर सैयद की अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी रोशनी का एक बुलंद मीनार है। उसने उन्नीसवीं सदी के आखिर में वो रस्ता दिखाया जो मुसलमानों की नई जिंदगी का सबब बन सकता था। मगर यह तहरीक उलेमा के Reaction का शिकार हो गई और उत्तरी भारत में मदरसों की बाढ़ आ गई।
इसके बरअक्स—दक्षिणी भारत के मुसलमानों ने सही सबक लिया। केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में मुसलमानों ने आधुनिक तालीमी इदारों की बुनियाद रखी जो आज उनकी तरक्की की रीढ़ हैं। 1905 में मद्रास के दिल में पहला “मोहमेडन कॉलेज” बना—आज वही क़ाइदे-मिल्लत कॉलेज फ़ॉर वूमन है।1951 में “न्यू कॉलेज”, फिर SIET महिला कॉलेज खड़ा हुआ। वानियंबाड़ी का 1919 का “इस्लामिया कॉलेज” आज 106 साल पूरा कर चुका है। आज तमिलनाडु में मुसलमान सिर्फ 5.6% हैं, मगर उनके 35 Degree और PG कॉलेज, दो University, 20 Engineering कॉलेज, कई Polytechnic और MBA के इदारे मौजूद हैं। यह बात कम ही लोगों को मालूम है कि तमिलनाडु की Noorul Islam University ने 23 जून 2017 को ISRO की मदद से अपना Satellite NIUSAT अंतरिक्ष में भेजा—जो कृषि और ऊंची तालीम के काम आता है।
कर्नाटक में मुसलमानों ने पिछले 60 सालों में दिलचस्प तरक्की की है। बंगलुरु का Al-Ameen ग्रुप आज दो Engineering कॉलेज, सौ हाई स्कूल, कई Polytechnic और MBA–Pharmacy इंस्टीट्यूट चला रहा है। शहर में कुल 550 मुस्लिम स्कूल हैं—50 ऐसे जिनमें 60% बच्चे और असात्ज़ा (Teachers) गैर-मुस्लिम हैं। कई बड़ी तामीरी कंपनियाँ मुस्लिम ताजिरों की हैं—UB City जैसी विशाल इमारतें इन्हीं की मिल्कियत हैं। Currency Museum और Art Museum भी मुस्लिम उद्योगपतियों की कोशिशों से बने हैं। 1990 के Liberalization के बाद बंगलुरु की आबादी 45 लाख से डेढ़ करोड़ हो गई, और नई कॉलोनियों में मुस्लिम बिल्डरों का हिस्सा अहम रहा—इसलिए यहाँ मुसलमानों के खिलाफ़ मकान न देने का भेदभाव लगभग न के बराबर है।
दक्षिण के मुसलमान Banking में भी दूसरों से अलग हैं—कई पुराने Muslim Cooperative Banks आज भी चल रहे हैं। Corporation Bank—जो 2020 तक भारत के टॉप 14 Scheduled Banks में था—एक मुसलमान ताजिर हाजी अब्दुल्ला हाजी कासिम ने 1906 में उडुपी में क़ायम किया था। बंगलुरु के 625 सुपरमार्केट्स में से 500 मलयाली मुसलमानों के हैं। 1991 के दंगे में एक मुस्लिम सुपरमार्केट लुटा, तो गैर-मुस्लिम पड़ोसियों ने चंदा जमा कर उसे दोबारा खड़ा करवाया। Covid-19 में Muslim NGO Mercy Mission ने 20 Community Kitchen चलाए, 14 करोड़ के राशन बैग बांटे। उत्तर भारत के मज़दूरों को लौटाने के लिए चलाई गई 330 Shramik Express ट्रेनों के लिए Food Bags का कॉन्ट्रैक्ट भी इन्हीं को दिया गया—जबकि उस वक़्त सरकार BJP के हाथ में थी।
शॉपिंग मॉलों में पाँच वक़्त की नमाज़ अदा करने के लिए अलग-अलग मुसल्ले बनाए गए हैं, जिनमें से कुछ air-conditioned भी हैं। कई tech parks में भी मुस्लिम तामीरी (construction) कंपनियों ने ऐसे ही मुसल्ले तैयार किए हैं।
रियासत के एक साबिक़ वज़ीर, अज़ीज़ सेठ, ने राज्य के दक्षिणी हिस्से के कई शहरों में बीड़ी मज़दूरों के लिए housing colonies बनवाईं। इनमें शहर मैसूर की हज़ार मकानों वाली और शहर मांड्या की दस हज़ार मकानों वाली कॉलोनियाँ क़ाबिले-ज़िक्र हैं। इन कॉलोनियों में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई बाशिंदे बिला तमीज़-ए-मज़हब-ओ-मिल्लत एक साथ रह रहे हैं।
रियासत की इस तस्वीर से यह गुमान नहीं करना चाहिए कि यहाँ फ़िरक़ावारियत, इम्तियाज़ (discrimination) और तअस्सुब (prejudice) बिल्कुल ख़त्म हो चुके हैं। बस, इतना कहना दुरुस्त होगा कि मुस्लिम आबादी तालीमी, समाजी और मआशी तरक़्क़ी में किसी हद तक अपना हिस्सा ले पाती है और यहाँ तअस्सुब व इम्तियाज़ का अनुपात कुछ हल्का है।
लेकिन इस तालीमी और मआशी तरक़्क़ी के बावजूद मुसलमान सियासी तौर पर अपने जनसंख्या-अनुपात से कम नुमाइंदगी हासिल कर पाते हैं। उनके मुक़ाबले Vokkaligas जिनका अनुपात 11% है और Lingayats जिनका अनुपात 14% है—राज्य विधानसभा में अपने अनुपात से तक़रीबन दोगुनी नुमाइंदगी रखते हैं। इसकी अहम वजह यह है कि ये दोनों जमाअतें रियासत की सरकारी ज़बान कन्नड़ को दूसरी क़ौमों के साथ share करती हैं, जबकि राज्य के मुसलमान (12% आबादी) उर्दू, मलयाली, बैरी वग़ैरह बोलते हैं और कन्नड़-अक़ल्लियत के साथ भरपूर तौर पर interact नहीं कर पाते।
केरल में मुसलमानों की सूरत-ए-हाल, तमिलनाडु और कर्नाटक के मुक़ाबले काफ़ी बेहतर है। इस रियासत का पहला मुस्लिम कॉलेज 1949 में फ़ारूक़ नामी क़स्बे में क़ायम हुआ था। इस कॉलेज का नाम भी Farook College ही है। मुस्लिम एजुकेशनल सोसायटी (MES) ने 1950 से 1980 के दरमियान यहाँ स्कूलों और कॉलेजों का जाल बिछा दिया। अब इस रियासत में मुस्लिम डिग्री कॉलेजों की तादाद 150 से ज़्यादा है। पिछले 30 बरसों में इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों की संख्या कई दर्जनों तक पहुँच चुकी है। 1956 में थंगल कुंझू मुसल्यार ने पहला Engineering College बनवाया—जिन्हें Cashew King भी कहा जाता था।
आज केरल के बड़े अखबार और TV Channels भी मुसलमानों के हैं—जैसे Madhyamam One।
लुलु मॉल के Yusuff Ali, Gulfar Mohammed Ali और Malabar Gold जैसे बड़े नाम दुनिया भर में मशहूर हैं। केरल की 140 सीटों वाली विधानसभा में मुसलमान अपनी आबादी (27%) से भी ज्यादा नुमाइंदगी रखते हैं।
निचोड़:
इस पूरी बातचीत का खुलासा यह है कि। ک मुसलमानों को Victimhood (मज़लूमियत का एहसास) और शिकायती सियासत से ऊपर उठना होगा, ताकि वे क़ौमी ज़िंदगी में बराबर की हिस्सेदारी हासिल कर सकें। इस सिलसिले में दक्षिण की इन चार–पाँच रियासतों में मुसलमानों की तालीमी (शैक्षणिक) और मआशी (आर्थिक) तरक़्क़ी पर ग़ौर करना, और कुछ मामलों में उनकी तक़लीद (अनुकरण) करना फ़ायदेमंद होगा।
उधर, उत्तरी हिन्द के मदरसों से उभरने वाली क़यादत मुसलमानों को और ज़्यादा पिछड़ा बना देगी। उसके पास इस मुल्क की सियासी, समाजी, क़ानूनी, जुग़राफ़ियाई और तारीखी Context की कोई ठोस knowledge नहीं है। वह सिर्फ़ गुम्बद के भीतर क़ैद “अल्लाहु अकबर” का नारा लगाने की पोज़िशन में है।
मदरसों के निसाब (सिलेबस) की तजदीद (अपडेट) की बात से उसे डर लगता है कि कहीं मुसलमानों की क़ियादत उसके हाथ से न निकल जाए। मौलाना ग़ुलाम वसतानवी साहब को दारुलउलूम देवबंद की इंतेज़ामी कमेटी से सिर्फ़ इसलिए हटना पड़ा क्योंकि वे पुराने निसाब में तब्दीली के ख़्वाहिशमंद थे। (उसका और एक प्रमुख कारण यह भी था कि वे मूलतः गुजराती थे और उन्होंने पंतप्रधान नरेंद्र मोदी की खुलकर तारीफ़ भी की थी)
इसीलिए हिंदुस्तानी मुसलमानों को अपने ज़हन को Modernise करना पड़ेगा—ताकि 21वीं सदी में सांस ले सकें। उलेमा की पारंपरिक क़यादत 21वीं सदी के तकाज़ों को पूरा नहीं कर सकती।
—मक़बूल अहमद सिराज
Associate Editor, News Trail

