अग्नि आलोक

*पढ़ो आई ए एस/आई पी.एस वालो…कहां हो महेशदत्त जी?*

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कनक तिवारी 

जिंदगी में कई ऐसे अनुभव होते हैं जो अपनी बनावट में बहुत सामान्य लगते रहे हैं। कभी नहीं सोचा जाता है कि उनमें बताने लायक क्या है। लेकिन आगे चलकर कभी उनकी याद आती है, तो लगता है अरे बदले हुए वक्त में कि क्या कभी ऐसा भी घटित हुआ? अब तो उसके दुबारा होने की सभ्भावना भी नहीं हो सकती। जिंदगी ऐसी छोटी छोटी घटनाओं से ही लकदक होती है। 

आजकल देश में आई0ए0एस0 और आई0पी0एस0 की नौकरशाही गुलामी की वृत्ति सत्ता की मलाई खाने मंत्रीनुमा अस्थायी बादशाहों के चारण के रूप में डोल रही है। उनके लिए अपने पूर्वजों की इस सत्यकथा का महत्व होना चाहिए।  

                          बात 1974 के आसपास की है। जांबाज़ मजदूर नेता जाॅर्ज फर्नांडीस ने दमदार लम्बी रेलवे स्ट्राइक की थी। मैं उस वक्त मध्यप्रदेश के सरकारी उद्यम मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम की ट्रेन यूनियन का प्रादेशिक उपाध्यक्ष था और अपने गृहनगर दुर्ग जिले की इकाई राज्य परिवहन कर्मचारी संघ का अध्यक्ष। रेलवे स्ट्राइक के अनुसरण में मध्यप्रदेश राज्य परिवहन कर्मचारी फेडरेशन ने भी हड़ताल की और दुर्ग डिपो में भी ताला लगाकर बसों का आवागमन ठप्प कर दिया। सरकार को भारी असुविधा होने लगी। सारी कोशिशें फेल हो गईं लेकिन हड़ताल नहीं टूटी। तब सड़क परिवहन का पूरा निजीकरण नहीं हुआ था। इसलिए तकलीफ जनता को ज़्यादा महसूस होने लगी थी। 

मैं दुर्ग में ही पिछले तीन वर्षों से वकालत भी करता था। तत्कालीन कलेक्टर वीं एन कौल और जिला पुलिस अधीक्षक महेशदत्त शर्मा से निजी संबंध भी विकसित हो गए थे क्योंकि वे लगभग हमउम्र थे।    

                  शायद इतवार का दिन होगा। मुझे कलेक्टर के बंगले से फोन आया और मैं उनके घर मिलने गया। सावधानी के लिए मैंने यूनियन के सेक्रेटरी शिवकुमार पाली को साथ ले लिया कि कहीं कोई अनहोनी हो तो वे गवाह बतौर हाजिर रहें। कलेक्टर के साथ एस0पी0 भी बैठे थे। दोनों ने कहा कि अपने साथ किसी को मत रखिए। उनकी ज़रूरत नहीं है। वे दोनों खुशनुमा मौसम की हो रही शाम में पेय के साथ चुहल भी कर रहे थे। मुझे कुछ देर अपने साथ बिठाया और हडताल के बारे में जानकारी ली। फिर कहा आपके कारण राजधानी भोपाल से फोन आएगा। इसीलिए आपको बुलाया है। फोन आया। तब मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी थे। दुर्ग जिले के प्रतिनिधि राजस्व मंत्री रहे किशोरीलाल शुक्ल और मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम के उपाध्यक्ष स्थानीय विधायक मोतीलाल वोरा को भी हड़ताल तुड़वाने की पड़ी थी। पता नहीं किसका फोन था? कौल ने उलटकर जवाब दिया। ‘‘नहीं सर, हम कनक तिवारी को गिरफ्तार नहीं कर सकते। नहीं तो दुर्ग की सभी सरकारी बसें जला दिए जाने का भी खतरा है।‘‘                         

    आदेशकर्ता  ने कुछ कड़ा कहा होगा। कौल ने कहा ‘‘मैं फोन एस0पी0 को दे रहा हूं। जो कुछ करना है इन्हें ही करना है।‘‘ एस0पी0 महेशदत्त शर्मा ने फोन पर छूटते ही कहा ‘‘नहीं सर गिरफ्तारी तो संभव नहीं होगी। कनक तिवारी के बाहर रहने से ही प्रशासन को लाॅ एण्ड आर्डर मेंटेन करने में सहूलियत होगी। फिर झल्लाकर फोन रख दिया और कहा कि ये लोग कहते रहें लेकिन मैं गिरफ्तार नहीं कर पाऊंगा। 

फिर अचानक दुर्ग कोतवाली के टाउन इंस्पेक्टर एस0 के0 वर्मा को उन्होंने बुलाया और कहा देखो तुम्हें खानापूरी करनी है। तुम रोज कचहरी जाओगे और अपनी डायरी में लगातार लिखोगे कि पता करने पर भी एडवोकेट कनक तिवारी वहां मिल नहीं रहे हैं। कोई ठीक से बता भी नहीं रहा है। उन्हें देखोगे तो भी उनकी ओर से मुंह फेर लेना। इस तरह ड्रामा पूरा करना है। 

जब मैं चलने लगा तब उन्होंने कहा ‘मिस्टर तिवारी आपके कारण बहुत तकलीफ हुई है हमें। चाहे जो हो जाए लेकिन हमको लल्लूपंजू क्यों समझा जाता है?‘‘ 

आज दोनों की याद आ रही है। शर्मा संभवतः भगवान को प्यारे हो गए हैं। कौल दिल्ली में हैं। कलेक्टरी के बाद कई प्रतिष्ठित पदों पर सम्मान और सफलता के साथ काम करके चले गए।                                    खुदा को हाजि़र नाजि़र करके मैंने एक एक शब्द सही लिखा है।

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