अग्नि आलोक

मनुस्मृति में स्त्रियों की वास्तविक स्थित 

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      डॉ. नीलम ज्योति 

विशिल कामवृत्तो वा गुणैर्वा परिवर्तितः।
उपचयेः स्त्रियां साधव्या सततं देवत्पतिः।। 154।।

यदि पति अनाचारी हो (परस्त्री में अनुरक्त ) बलात्कारी हो तथा विद्यादि गुणों से रहीत अवगुणी हो तो भी ऐसे पती की पुजा सदैव देवता मानकर करे वहीं साध्वी है।

एकोअलुबधस्तु साक्षी स्वाद बह्वयः शुच्योयपि न स्त्रियः।
स्त्रीबुद्धेरस्थिरत्वात्तु दोषैश्चान्येअपि ये वृता।।77।।

एक भी लोभी पुरुष साक्षी हो सकता है (जिसकी बात का यकीन किया जाए) लेकिन बहुत सी पवित्र स्त्रियाँ भी गवाही देने के विश्वास योग्य नहीं हो सकती क्योंकि स्त्रियों की बुद्धि चंचल होती है.

पुजनायं महाभागाः पूजाहां गृहदिप्तयः।
स्त्रियः श्रीयश्च गेहेषु न विशेषोअस्ति कश्चन।। 26।।

स्त्रियाँ सन्तान उत्पन्न करने का उपकार करने के कारण पूजनीय और घर की शोभा है अन्यथा घर में लक्ष्मी और स्त्रियों में कोई विशेषता नहीं है।

पौश्चल्याच्चलचित्ताच्च नैस्नेह्याच्च  स्वभावतः।
 रक्षिता  यत्नतो    अपीह    भर्तृष्वेता विकुर्वते।। 15।।
 पराए पुरुष से भोग कि इच्छा, दोष से चंचलता से और स्वभाव से ही स्नेह नहीं होने के कारण घर में यत्न पुर्वक रखने पर भी स्त्रियां पती के विरुद्ध काम करती है।

स्वप्नोंअन्यगेहोवाश्च ना रीसंदुस्णानि षट।
स्वनदोष मदीरा पिना, दुष्टों कि संगती करना, पती के वियोग में इधर-उधर घूमना, अकाल में सूतना, दुसरे के घर में रहना, ये छः दोष स्त्रियों में है।

नैता रुपम परिक्षंते नासां वयसि संस्थितिः।
सुरूप वा विरूप वा पुमानित्येव भुश्चते।। 14।

स्त्रियाँ रुप कि परिक्षा नहीं करती और न ही उम्र का ध्यान करती है। रुपवान हो या कुरूप स्त्रियों को संभोग के लिए बस पुरुष होना।

त्रिशद्वर्षोवर्द्वहेत्कन्या ह्वंद्दां द्वादशवार्षिकिम्।
त्रयष्टवर्षोष्टवर्षो वा धर्मो सीदति सत्वर :।। 94 ।

30 साल का पुरुष हो और 12 वर्ष कि सुंदर कन्या हो या 24 वर्ष का युवक हो और 8 साल कि बच्ची हो ऐसा विवाह करना धर्म अनुरूप है।

अलंकारं नाददीत पिंयं कन्या स्वयंवरा।
मातृकं भातृदत्तं वा स्तेना स्याद्यदि तं हरेतः।। 92।।

पति को स्वयं पसंद करने वाली कन्या को अपने माता-पिता भाई बंधुओं से कोई आभुषण दान सामान लेने का हक नहीं है क्योंकि वह चोर समझी जाए।

न मांस भक्षणे दोषों न मद्ये न च मैथुने।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महा फला।।56।।

मांस खाने में शराब पीने में और स्त्री के साथ संभोग करने में कोई दोष नहीं है, क्योंकि प्राणियों की प्रवृत्ति ही ऐसी है। उनसे निवृत हो तो भी फलदायी है!

एवं यद्यप्यनिष्टेषु वर्तन्ते सर्वकर्मसु।
सर्वथा ब्राह्मणा: पूज्याः परम दैवतं हि तत्।। 319

सभी प्रकार के अपवित्र कार्यों ( वेश्यागमन, दुराचार, व्यभिचार,) में लगे रहने पर भी ब्राह्मण सब प्रकार से पूजनीय हैं, क्योंकि वह परम देवता हैं। परम का अर्थ है सबसे बड़ा!

ब्राह्मणः सम्भवेनैव देवानामपि दैवतम्।
प्रमाण चैव लोकस्य बृह्मा तैव हि कारणम्।।

ब्राह्मण जन्म से ही देवताओं का भी देवता हैं यानि परम देवता हैं लोक में उसका प्रमाण वेद है।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।
(अ० 3 श्- 56)

देवता” वही रमते है जहाँ स्त्री पूजी जाए. स्त्री को रोकना टोकना धमकाना : ये होगा तो देवता
वहां नहीं रमेंगे.

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