कोलकाता : इशरत महल !*
आप हवा नहीं देखते तो क्या वह नहीं है? स्वास मत लें, आपको आपकी औकात पता चल जाएगी.
_अगर आप सत्य नहीं देख पाते तो यह आपका अंधापन है. अगर आप अपेक्षित को अर्जित नहीं कर पाते तो यह आपकी काहिलताजनित विकलांगता है. मानवश्री कहते हैं -- ", अपनी बिल से बाहर निकलकर समय दें : सब जानें, सब देखें, सब अर्जित करें. "_
लोग रहस्यमय दुनिया के चित्र-विचित्र पहलुओं की चर्चा करते हैं. पचास प्रतिशत लोग तो और जिज्ञासु भी हो जाते हैं। शेष ऐसे विषय को अविश्वसनीय मान लेते हैं
वजह तंत्र के नाम पर तथाकथित/पथभ्रष्ट तांत्रिकों की लूट और भोगवृत्ति रही है। इन दुष्टों द्वारा अज्ञानी, निर्दोष लोगों को सैकड़ों वर्षों से आज तक छला जाता रहा है। परिणामतः तंत्र विद्या से लोगों का विश्वास समाप्तप्राय हो गया है।
_तंत्र 'सत्कर्म'- 'योग' और 'ध्यान ' की ही तरह डायनामिक रिजल्ट देने वाली प्राच्य विद्या है. इस के प्रणेता शिव हैं और प्रथम साधिका उनकी पत्नी शिवा. *जो इंसान योग, ध्यान, तंत्र के नाम पऱ किसी से किसी भी रूप में कुछ भी लेता हो : वह अयोग्य और भ्रष्ट है. यही परख की कसौटी है*._
तंत्र के नियम और सिद्धान्त अपनी जगह अटल, अकाट्य और सत्य हैं। इन पर कोई विश्वास करे, न करे लेकिन इनके यथार्थ पर कोई अंतर पड़ने वाला नहीं है। सुक्ष्मलोक, प्रेतलोक, अदृश्य शक्तियां, मायावी शक्तियां आदि सभी होती हैं. प्रेतयोनि और देवयोनि को विज्ञान भी स्वीकार कर चुका है -- निगेटिव और पॉजिटिव एनर्ज़ी के रूप में.
*~ अमृता शर्मा (कोलकाता)*
_उन दिनों मैं कलकत्ता में रहता था. मैं मुख्य रूप से भूत-प्रेत और तन्त्र-मन्त्र पर व्यक्तिगत रूप से शोधकार्य में जुटा हुआ था। मेरे मित्र के पिता थे--अखिलेश राय चौधरी। परामनोविज्ञान के क्षेत्र में काफी प्रसिद्ध थे। उन दिनों वह कलकत्ता विश्वविद्यालय में उच्च पद पर थे।_
एक दिन सांझ के समय जब मैं कनिंग स्ट्रीट से गुजर रहा था, तभी एकाएक मिल गए राय चौधरी। काफी दिनों बाद मुलाकात हुई थी। मुझे देखते ही बोले--अरे ! बेटे कहाँ थे तुम ?
मैं कुछ कहने ही जा रहा था कि तभी बीच में फिर बोल पड़े : तुम तो जानते ही हो कि मुझे उस छोटे-से मकान में परेशानी हो रही थी औऱ पिछले महीने मैंने एक मकान देखा था अलीपुर में। मुझे पसंद भी आ गया था। कम-से-कम दो सौ वर्ष पुराना होगा वह मकान। मगर बराबर मरम्मत होते रहने के कारण देखने में उतना पुराना नहीं लगता।
पहले उसमें छावनी के अंग्रेज अफसर रहा करते थे, इसलिए मकान के कमरे बिलायती ढंग से सजे हुए हैं। मकान हवादार और आरामदेह तो है ही--,इसमें सन्देह नहीं। मैंने तुरन्त तीन महीने की पेशगी देकर उसे किराए पर ले लिया पर बन्धु ! चौथे दिन ही मुझे मकान छोड़ना पड़ा।
क्यों ? किसलिये छोड़ दिया आपने ऐसा आरामदेह मकान ? कलकत्ते में तो ऐसा मकान मिलना कठिन है ही--मैंने कहा।
सच बात तो यह है कि उस लम्बे-चौड़े हवेलीनुमा मकान में एक ऐसा कमरा है जो बिल्कुल खाली है। उस कमरे के पास से गुजरते समय मुझे प्रत्यक्ष रूप से कुछ दिखाई- सुनायी नहीं पड़ता था, लेकिन एक अजीब से भय के कारण मेरा सारा शरीर रोमांचित हो उठता था। चौथे दिन मैंने मकान की रखवाली करने वाली बुढ़िया को बुलवाया और मकान की चाभी उसे थमाते हुआ बोला--माई, मुझे यह मकान ठीक नहीं लगता, इसलिए छोड़ रहा हूँ इसे।
बुढ़िया रूखे स्वर में बोली--मैं उसकी वजह जानती हूँ साहब। फिर भी आप इस मकान में रहने वाले दूसरे सब किरायेदारों से ज्यादा टिके। ज्यादातर लोग तो दूसरे ही दिन मकान छोड़कर भाग खड़े होते हैं। आप से पहले इस मकान में तीन दिन तो कोई किराएदार टिका ही नहीं।
मेरा ख्याल है कि वे लोग आपके ऊपर काफी मेहरबान रहे।
वे कौन लोग ?--मैंने आश्चर्य से पूछा।
वही जो इस मकान में रहते हैं। वे चाहे भूत-प्रेत-जिन्न हों या और कोई--बतला नहीं सकती मैं। मगर वे है कई और काफी ताकत भी रखते हैं।
उस बुढ़िया ने विकास, इतनी भयानक गम्भीरता से ये शब्द कहे कि मैं उसके बाद उससे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।
राय चौधरी की ये बातें सुनकर बेहद उत्सुक हो उठा मैं। हँसकर बोला--आप भूत-प्रेत से डरते नहीं ? न जाने कितना विचित्र अनुभव हुआ है आपको। फिर क्यों इतने भयभीत हो गए आप ?
बेटे, ऐसी बात नहीं--झेंपते हुए बोले राय चौधरी--बात दरअसल यह है कि मुझे अपनी पत्नी के कारण मकान छोड़ना पड़ा। तुम तो जानते ही हो वह हद से ज्यादा डरपोक और कमजोर दिल की औरत है। उसी के बार-बार कहने पर छोड़ना पड़ा मकान।
यदि आप कहें तो मैं उस रहस्यमय मकान में कम-से-कम एक रात तो अवश्य रहना चाहता हूँ--मैंने सहज भाव से कहा.
कहने की आवश्यकता नहीं--दूसरे ही दिन मैं अलीपुर के उस रहस्यमय मकान में बोरिया-बिस्तर लेकर पहुँच गया।
उस जमाने में अलीपुर का इलाका आज की तरह गुलज़ार नहीं था। चारों तरफ खामोशी छायी हुई रहती थी। गिनती के पचास-साठ ही मकान थे जो काफी पुराने थे। वह रहस्यमय मकान अलीपुर में सुनसान जगह में था। पास ही एक-दो दुकान चाय की थीं और एक छोटा-सा होटल भी था किसी बंगाली का जिसमें चाय के अलावा दोनों वक्त का खाना भी मिलता था।
_मकान भीतर से बंद था। मैं जरा आगे बढ़ा। तभी उस होटल का छोकरा नौकर जो जूठी प्लेटें धो रहा था, मेरे करीब आया और बोला--साहब ! क्या आप किसी से मिलना चाहते हैं ?_
हाँ, मैंने सुना है--यह मकान किराए पर देने के लिए खाली है ?
हाँ, यह मकान तो साहब खाली है। एक मुसलमान औरत इसकी रखवाली करती थी। पिछले हफ्ते वह मकान में मरी हुई पाई गई। उसकी मौत बेहद दर्दनाक हादसे से भरी हुई थी।
वह बोला – मैंने खुद अपनी आंखों से उसकी लाश को देख था। उसका चेहरा काफी डरावना लग रहा था। मुंह खुला था। आंखें बाहर को उबल पड़ी थीं। मुंह से ढेर सारा खून निकल कर फर्श पर फैला पड़ा था.
थोड़ा रुककर वह छोकरा आगे बोला–साहब मकान भुतहा है। अब तो और भी लोग इसमें रहने के लिए राजी न होंगे।
इस मकान का मालिक कौन है ?–मैंने पूछा।
नवाब बहादुर अली खां।
खां साहब रहते कहाँ हैं ?
लेक रोड पर उनका बहुत बड़ा आलीशान मकान है। उसी में रहते हैं खां साहब। काफी जमीन-जायदाद और बेशुमार दौलत है उनके पास साहब !
इतना समाचार मेरे लिए काफी था। मैंने एक रुपया जेब से निकालकर उस छोकरे को इनाम दिया और उसी समय खां साहब के घर जा पहुँचा।
संयोग से वे घर पर थे। चेहरे से बुद्धिमत्ता टपक रही थी। बातचीत करने का ढंग भी उनका बड़ा ही शिष्ट और आकर्षक था। जब उनको यह मालूम हुआ कि मैं भूत-प्रेत के रहस्यमय विषयों पर खोज-कार्य कर रहा हूँ तो बेहद प्रसन्न हुए वे।
बड़ी विनम्रता से बोले–मकान आपकी खिदमत में हाज़िर है। आप जब तक चाहें उसमें रह सकते हैं। किराए की तो बात ही नहीं है। इस समय वह मकान बेहद बदनाम है। ऐसी हालत में अगर आप मकान के रहस्य का पता लगा लेंगे तो उल्टे मैं ही आपका शुक्रगुजार रहूंगा।
बातचीत के सिलसिले में मुझे पता चला कि साहब की बीवी अल्लाह को प्यारी हो चुकी है। औलाद के नाम पर एक लड़की है सिर्फ जिसका नाम है--मेहरुन्निसा।
_जब पहली बार मैंने मेहरुन्निसा को देखा तो देखता ही रह गया। उफ ! कितनी खूबसूरत थी वह--शब्दों में उसके सौंदर्य और उसकी रूपराशि का वर्णन मैं नहीं कर सकता। लगा--जैसे अजन्ता-एलोरा की गुफा की कोई अभिसारिका साकार हो गयी हो मेरे सामने। जाने कब तक मुग्धभाव से निहारता रहा मैं उसकी ओर।_
आपका यह मकान कब से मनहूस हो गया ?--मैंने पूछा।
यह ठीक-ठीक बतलाना मुश्किल है। पर मुझे इतना जरूर याद है कि बहुत सालों से इसका यही हाल है। थोड़ा रुककर ख़ाँ साहब आगे कहने लगे--सच तो यह है कि यह मकान मेरे चाचा का था।
आज से चालीस साल पहले उन्होंने मुर्शिदाबाद के किसी नवाब से खरीदा था मामूली दामों में। उस जमाने में यह मकान कलकत्ते में 'इशरत महल' के नाम से जाना जाता था। चाचा से ही सुना था कि नवाब साहब ऐयाश तबियत के थे।
_शराब और शबाब दोनों का बेहद शौक था उन्हें। रोजाना रात को नवाब साहब की महफ़िल लगती थी इशरत महल में। नवाब साहब कमसिन तवायफों के मखमल के पट्टे में पिरोये घुंघुरुओं की मधुर आवाज की कोमल लड़ियों पर तैरती थिरकती, शराब की महक और बेला, जूही, चमेली की मिली-जुली सांझ होते ही फैलने लग जाती थी इशरत महल के कोने-कोने में।_
बर्मा पर जापानियों के हमले का प्रभाव बंगाल पर भी पड़ा। नतीजा यह हुआ कि नवाब साहब को इशरत महल के अलाबा बंगाल में मौजूद अपनी तमाम जायदादों को एक-एक कर बेचना पड़ा। मेरे चाचा की कोई औलाद न थी। जब वे मरे तो उनकी जायदाद संभालने के लिए लाहौर से कलकत्ता आना पड़ा।
यहां आने पर मुझे यह मकान इसी तरह सूना नज़र आया और पता लगा कि उसमें रूहों का डेरा है। मुझे ये बातें काल्पनिक और मनगढ़ंत लगीं। मैंने मकान की मरम्मत करवाई, रंग-रोगन करवाया, नये ढंग से फर्नीचरों से सजाया और एक अंग्रेज अफसर को किराए पर दे दिया। मगर वह अधिक दिन टिक न सका। एक सप्ताह बाद ही भाग खड़ा हुआ।
पूछने पर उसने बतलाया कि मकान काफी भयानक है। रहने के काबिल नहीं है। उसके बाद से किरायेदारों के साथ यही सिलसिला चल पड़ा।
_कोई भी किरायेदार एक सप्ताह से ज्यादा ठहर न पाता। नतीजा यह हुआ कि मकान पूरी तरह बदनाम हो गया। आज उसकी जो यह हालत है आप खुद ही देख रहे हैं।_
अन्त में अपनत्वभरे स्वर में बोले--अगर आप मेरी सलाह मानें तो मैं आप से यही कहूंगा कि आप रात को मकान में हर्गिज न रहें। हो सकता है कि जान का कोई खतरा पैदा हो जाये।
यह सुनकर मैं हँस पड़ा। दृढ़ता के साथ कहा--
_मुझे इस मामले में बेहद दिलचस्पी है और अनजानी परिस्थितियों में हिम्मत का दम्भ भरना मैं कायरता समझता हूँ। फिर भी मैं आपको सिर्फ इतना बतलाना चाहता हूं कि मैं खतरों के बीच ही पला हूँ। भूत-प्रेत और खतरनाक-से-खतरनाक जिन्नों से मेरा सामना अब तक कई बार हो चुका है। आपके भुतहे मकान में रहने से भी मुझे अपने दिल की मजबूती का पूरा भरोसा रहेगा।_
खां साहब ने एक बार मेरी ओर गहरी नजरों से देखा और फिर मकान की चाभी मेरे हवाले कर दी।
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_कहने की आवश्यकता नहीं--उसी दिन मैंने उस भुतहे मकान में अपना डेरा-डंडा जमा दिया। जब मैं रात बिताने के लिए पहली बार मकान में पहुंचा तो मेरा नौकर देवी दरवाजे पर खड़ा मेरा इंतज़ार करता हुआ मिला। देवी उड़ीसा का रहने वाला था। काफी हिम्मती था वह। मुझे उस पर पूरा भरोसा था।_
मुझे देखते ही बोला--साहब ! मकान तो हवादार और काफी आरामदेह है। मगर बिजली न रहने से कुछ तकलीफ हो सकती है।
मैंने उसकी बात अनसुनी करते हुए पूछा--तुम सुबह से इस मकान में हो। तुमने अभी तक कोई अजीब बात देखी या सुनी तो नहीं ?
हाँ साहब ! मकान कुछ अजीब जरूर है--यह बात तो माननी ही पड़ेगी।
क्या..क्या ?--मेरी उत्सुकता का बांध टूटने लगा।
_मुझे कई बार मकान के निचले हिस्से में तो कभी ऊपर के हिस्से में किसी के पैरों की आहट सुनाई देती रही है। मुझे दो-तीन बार ऐसा भी लगा कि जैसे कोई मेरे कानों के पास ही फुसफुसा कर बातें कर रहा हो। इसके अलावा मैंने कुछ नहीं देखा-सुना।_
तुम डरे तो नहीं ?
नहीं साहब ! इसमें डरने की क्या बात है ?
यह सुनकर मुझे विश्वास हो गया कि चाहे जो हो यह उड़िया नौकर मेरा साथ छोड़ेगा नहीं।
नवम्बर का महीना था। ठंड पड़नी शुरू हो गयी थी। हवा में तरावट भी थी। रात की कालिमा गहरा गयी थी। हलके बादलों के सफेद-सफेद टुकड़े नीले आकाश में तैर रहे थे। शक्लपक्ष की एकादशी का चाँद बादलों की ओट से बाहर निकल आया था। चारों ओर रुपहली चांदनी बिखरी हुई थी।
मकान के ऊपरी हिस्से में मैंने एक कमरा अपने लिए ले लिया था। कमरा काफी लम्बा-चौड़ा था, काफी हवादार भी था। तीन-चार बड़ी-बड़ी खिड़कियां भी थीं जिनमें से होकर हवा का सैलाब कमरे में घुस रहा था। कुछ देर तक खड़ा रहा मैं खिड़की के पास बाहर छिटकी हुई चाँदनी का आनंद लेता रहा। देवी मेज पर खाना लगा चुका था तब तक।
खाना खाने के बाद मैं आराम से पैर फैलाकर पलंग पर लेट गया। मेरे कमरे के बगल में एक और कमरा था जिसका एक दरवाजा मेरे कमरे में भी खुलता था। देवी ने अपने सोने के लिए उसी कमरे में इंतज़ाम किया था। वह भी खाना खाकर अपने कमरे में चला गया।
धीरे-धीरे रात गुजर रही थी। मुझे नींद आने का प्रश्न ही नहीं था। मैं जागता रहा। कभी-कभी पलकें झपक जाती थीं।
_एकाएक मुझे ऐसा लगा कि कोई कमरे में विचित्र ढंग से गहरी सांसें ले रहा है। निश्चय ही वे किसी इंसान की सांसें नहीं थीं। और तभी मुझे कमरे के पास एक बड़ा-सा पीला प्रकाश दिखाई दिया जो मनुष्य के आकार के बराबर था। वह कुछ देर तक तो स्थिर रहा अपनी जगह पर फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। क्षणभर में वह प्रकाश छोटी-सी गोली के रूप में बदल गया। प्रकाश की वह रहस्यमयी गोली बहुत देर तक कमरे में चारों तरफ़ उछलती-कूदती रही, फिर अचानक गायब हो गयी।_
उसी के साथ एक और विचित्र घटना घटी जिसकी सपने में भी मुझे आशा नहीं थी। एकाएक अपने कमरे का दरवाजा धड़ाक से खोलकर देवी बाहर निकला। उस समय उसके चेहरे पर डर का भयानक भाव था--ऐसा भाव जैसा मैंने आज तक कहीं नहीं देखा था। वह मेरे बगल से तेजी से निकल गया फुसफुसाते हुए।
भागिए साहब.. भागिए.. वह मेरे पीछे-पीछे आ रहा है।
लगा--जैसे वह आवाज़ देवी की न हो। वह तेजी से सीढियां उतर कर मकान के मुख्य फाटक के पास पहुंचा। फिर उसने उस बन्द फाटक को झटके से खोला और बेतहासा बाहर भागा। मैंने उसे कई बार आवाज़ दी लेकिन उसने मेरी आवाज पर कोई ध्यान नहीं दिया।
_अब में उस भुतहे मकान में अकेला रह गया। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि देवी किस बात से इतना भयभीत हो गया था ? कौन उसका पीछा कर रहा था ? एक टॉर्च लेकर पूरे मकान का चक्कर लगाया मैंने मगर मुझे कोई संदेहास्पद वस्तु दिखलायी नहीं पड़ी कहीं। मैं अपने कमरे में वापस आया। बिस्तर पर लेट गया।_
रात काफी गुजर चुकी थी। चाँद पश्चिम की ओर झुक गया था। आकाश बिल्कुल साफ हो चुका था। मुझे बिस्तर पर लेटे अभी दस मिनट भी नहीं हुए थे कि सहसा मेरे सामने एक काली--सी छाया प्रकट हुई।
_वह धीरे-धीरे अजीब रूप धारण करती जा रही थी। उसका आकार और डील-डॉल किसी दैत्य की तरह था। उसका सिर मानो छत को छू रहा था। मैं विस्फारित नेत्रों से देख रहा था। मेरा खून पानी होने लगा और सारा शरीर रोमांचित हो उठा।_
उस समय मुझे ऐसा लगा कि जैसे उस दानव रूप छाया के सिर में दो आंखें मुझे घूर रही हैं। मैं दम साधे पड़ा रहा बिस्तर पर चुपचाप।
_अब उस छाया के ऊपरी भाग से नीले और पीले रंग के प्रकाश की दो तेज किरणें निकल कर मुझ पर पड़ रही थीं--ठीक उसी ऊंचाई से जहाँ मैंने दो आंखें देखी थीं।_
मैंने बोलने की चेष्टा की पर गला जैसे बन्द हो गया था।
मैंने उठने की भी कोशिश की मगर बेकार। मुझे लगा–जैसे कोई अदम्य शक्ति मुझ पर अपना प्रभाव डाल रही है, जैसे कोई अत्यंत गतिमान महान शक्ति मेरी इच्छा और मेरे संकल्प का विरोध कर रही है और मुझे उस समय ऐसा लगा कि उस महान शक्ति का विरोध करना मनुष्य के सामर्थ्य के बाहर है।
मुझे उस समय अपनी तुच्छता और असमर्थता का ऐसा अनुभव हो रहा था कि बतला नहीं सकता। ज्यों-ज्यों मेरी यह भावना बढ़ती गयी, वैसे-ही-वैसे मेरे मन में भय का संचार गहरा होता गया।
काफी प्रयास के बाद मैंने अपनी इच्छा-शक्ति को दृढ़ किया और काफी ताकत लगाकर बिस्तर से उठा। पर तभी मुझे धक्का-सा लगा और मेरा जिस्म बेजान-सा होकर फिर बिस्तर पर गिर पड़ा और उसी के साथ मेज पर जलती मोमबत्ती की रोशनी भी धीमी पड़ने लगी।
मेरा आतंक और बढ़ गया। मोमबत्ती बुझी तो नहीं, लेकिन लगा कि कोई अदृश्य शक्ति उसकी लौ को धीरे-धीरे बुझाने की कोशिश कर रही है। फिर सहसा बुझ गयी रोशनी और धुप्प अंधेरा छा गया कमरे में।
आतंक के भयावह भाव ने मुझे घेर लिया। अन्धकार के समुद्र में डूबे हुए उस कमरे में मैं था और थी वह भयावह विकराल दैत्याकार काली छाया। उसकी शक्ति का मुझे इतना विकट और भयानक एहसास हो रहा था कि मेरा रोम-रोम काँप रहा था।
सचमुच उस समय आतंक अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया था। बस, अब दो ही बातों की आशंका और संभावना थी कि या तो मैं चेतनाशून्य हो जाऊंगा या फिर किसी तरह उस मायाजाल को तोड़ ही दूंगा। और सच मानिए मैंने उस मायाजाल को आखिरकार तोड़ ही डाला अन्त में।
चीख उठा मैं एकबारगी और उसी क्षण मुझे अपने आत्मबल का अनुभव हुआ और मुझमें उठने की न जाने कहाँ से अदम्य शक्ति आ गयी। उठकर खिड़की की ओर दौड़ पड़ा और उसका पल्ला खोल दिया।
उस समय मुझे एक चीज की सख्त जरूरत थी और वह थी रोशनी। खिड़की खुलते ही पश्चिम में ढलता हुआ चाँद नज़र आया साफ, स्वच्छ और शान्त।
चाँद की हल्की पीली रोशनी कमरे में आ रही थी और वह काली विकराल छाया अब कमरे से गायब हो चुकी थी। मैं पलंग की ओर मुड़ा ही था कि मुझे ऐसा लगा कि सारा कमरा जोर से कांप उठा हो।
फिर कमरे से चारों ओर से चिंगारियां जैसी गोलियां निकलने लगीं–हरी-पीली-लाल-नीली। वे विभिन्न रंगों की प्रकाश-गोलियां कमरे में द्रुत गति से चक्कर काटने लगीं। उसी स्थिति में दालान में पड़ी एक पुरानी कुर्सी अपने-आप खिसक कर मेरी मेज के सामने आकर रुक गयी। फिर कुर्सी पर एक युवती का आकार प्रकट हो गया।
वह जिन्दा थी मगर मौत की तरह भयानक। युवती काफी सुन्दर थी, पर उस समय उस चेहरे पर शोक, चिन्ता, व्यथा और पीड़ा की मिली-जुली छाया तैर रही थी। दूसरे ही क्षण मेज पर औरतों के प्रसाधन की अनेक वस्तुएं प्रकट हो गयीं और वह रहस्यमयी युवती अपना श्रृंगार करने लगी।
बीच-बीच में वह दरवाजे की ओर देख भी लेती थी। शायद वह किसी का इंतज़ार कर रही थी। कमरे में अभी भी रंग-विरंगी गोलियां चारों ओर तैर रही थीं। कमरे का दरवाजा खुला तो नहीं पर दरवाजे के पास एक दूसरी आकृति प्रकट हुई।
वह आकृति किसी पुरुष की थी या किसी युवक की थी। वह पुराने जमाने की अंग्रेजों की-सी पोशाक पहने था। उसके चेहरे पर भी शोक का भाव था। लगा–जैसे वह किसी गहरी चिन्ता में डूबा हुआ हो। वह धीरे-धीरे चलकर युवती के पास आया और हौले-से पुकारा–मेहरुन्निसा…।
उस युवक के मुंह से मेहरुन्निसा का नाम सुनकर चौंक पड़ा मैं।
युवक को देखते ही मेहरुन्निसा खड़ी हो गयी और उससे जा मिली। काफी देर तक दोनों आलिंगनबद्ध खड़े रहे, फिर गायब हो गए और कमरे का वातावरण भी स्वच्छ और सामान्य हो गया।
उस समय इशरत महल में जो कुछ देखा-सुना और अनुभव किया था, उससे यह बात मेरे मस्तिष्क में स्पष्ट हो गयी कि उसमें प्यासी आत्माओं की प्रबल इच्छा-शक्ति का गहरा माया-जाल फैला हुआ है--इसमें सन्देह नहीं। मगर उसके मूल में कारण क्या है--यही मेरी समझ में नहीं आ रहा था।
_इशरत महल 200 वर्ष पुराना था। नवाब साहब का वह खानदानी महल था। सम्भव है--वह कारण उन्हीं के खानदान के इतिहास के किसी अंधेरे पन्ने में दबा-,छिपा हो। लेकिन उनके खानदानी इतिहास का पता लगेगा कहाँ ?_
उस दिन मैं स्टूडियो नहीं गया। देवी (नौकर) को खोजता रहा पूरा दिन। मगर वह मुझे नहीं मिला। सोचा--शायद वह अपने गांव भाग गया हो। अब मुझे इशरत महल में अकेले ही रहना था।
पूरे दस दिनों तक न कोई उल्लेखनीय घटना घटी और न तो कोई विशेष अनुभव ही हुआ मुझे। मैं आराम से बना रहा।
_मगर ग्यारहवें दिन जब मैं वापस लौटा, उस समय रात के बारह बज रहे थे। कृष्णपक्ष की रात थी। सारी धरती, सारा आकाश अंधेरे के आगोश में समाया हुआ था। एक गहरी खामोशी छायी हुई थी चारों तरफ। उस रात स्ट्रीट लाइट भी बुझी हुई थी।_
फाटक का ताला खोलकर मकान के भीतर जैसे ही घुसा कि एकबारगी स्तब्ध रह गया मैं। भय और आतंक से रोमांचित हो उठा मेरा सारा शरीर।
_न जाने कहाँ से महल के भीतर खूब रोशनी हो रही थी और उसके लम्बे-चौड़े आंगन में चारों ओर खून-ही-खून फैला हुआ था। बिल्कुल ताजा खून था वहां और उस ताजे और गर्म खून से सनी, लिपटी आधी दर्जन लाशें पड़ी हुई थीं जिनमें एक जवान और खूबसूरत औरत की भी लाश थी। सभी लाशों की गर्दनें कटी थीं।_
जरा आप ही सोचिए--
उस अंधेरी और खामोश रात के समय खून में डूबी हुई आधी दर्जन लाशों को देखकर मेरी मानसिक स्थिति क्या हुई होगी ? मैं पागल नहीं हुआ–बस यही गनीमत समझिए।
मैं अभी आंख फाडे और मुंह बाए वह वीभत्स और भयावह दृश्य देख ही रहा था कि तभी अचानक सामने वाली दीवार के पास से एक लम्बी-चौड़ी काठी का व्यक्ति प्रकट हुआ। उसकी आंखें लाल हो रही थीं। चेहरे पर क्रोध और घृणा का भाव था। क्रूरता उसके चेहरे से स्पष्ट टपक रही थी। उसके हाथ में नंगी तलवार थी.
मैं पत्थर का बुत बना खड़ा था वहां पर। लगा कि किसी भी पल बेहोश होकर गिर पडूंगा। सचमुच बेहोश हो ही गया मैं और जब चेतना लौटी तो मैंने अपने आप को कमरे में पलंग पर पड़ा पाया।
मेहरुन्निसा मुझ पर झुकी हुई थी। खां साहब की बेटी मेहरुन्निसा बड़े प्यार से मेरे सिर को आहिस्ते-आहिस्ते सहला रही थी। मैं उसे देखकर आश्चर्य से भर उठा। वह कैसे और कब आयी यहां ? मुझे होश में आया देखकर वह बोली–कहिए, कैसी तबियत है अब आपकी ?
ठीक है–मैंने उत्तर दिया और फिर पूछा–आप कैसे आयी यहां ?
मैं आऊंगी कहाँ से ? मैं तो यहीं इसी मकान में ही रहती हूँ–सहज भाव से बोली मेहरुन्निसा।
यह सुनकर आश्चर्य हुआ मुझे। विस्मय के स्वर में बोला–क्या कहती हैं आप ? आप इस भुतहे मकान में रहती हैं ? मैंने तो इसके पहले आपको कभी देखा नहीं यहां इस मकान में। कैसी बात करती हैं आप ?
मेरे प्रश्न का कोई जवाब नहीं दिया मेहरुन्निसा ने। सिर्फ मुस्कराती रही। बड़ी रहस्यमयी लगी उसकी मुस्कराहट उस समय मुझे। मैं उसके चेहरे की तरफ देखता ही रह गया।
दिन का उजाला फैल चुका था। मेहरुन्निसा की उपस्थिति सचमुच मेरे लिए रहस्यमयी थी। जब मैं बाथरूम से वापस लौटा तो देखा कि वह मेरे कमरे में नहीं थी। मैं सोच में पड़ गया कि वह बिना बताए कहाँ चली गयी ? पूरा मकान छान मारा। मगर वह नहीं मिली मुझे। आंगन में भी गया। वहां भी न खून फैला था और न लाशें थी वहां।
_एकाएक मेरा मस्तिष्क झनझना उठा। उस रात का सारा दृश्य घूम गया मेरे मानस-पटल पर। निस्संदेह भयानक प्रेतलीला थी वह। मेहरुन्निसा भी मेरे संदेह की परिधि में थी। उसका अस्तित्व मुझे रहस्यमय लगा। मैं उसी हालत में दौडा-दौड़ा खां साहब के बंगले पर पहुंचा। वे सुबह का नाश्ता कर रहे थे। मेहरुन्निसा भी उनके करीब बैठी हुई थी।_
मुझे देखते ही खां साहब बोले--आइए..आइए। आपकी खोज का नतीजा क्या हुआ ? कुछ समझ में आया आपके ?
_सारी कथा संक्षेप में सुना दी मैंने और अन्त में मेहरुन्निसा के आने की भी बात बतला दी मैंने जिसे सुनकर बाप-बेटी दोनों चौंक पड़े।_
यह क्या कह रहे हो विकास बेटे आप ?–खां साहब अपने स्वर को जरा कठोर करके बोले–मेरी बेटी तो बिल्कुल सुबह से मेरे पास है। फिर वह क्यों जाएगी उस भुतहे मकान में ?
अब मेरे चौंकने की बारी थी। मुझसे कुछ बोला न गया, कुछ कहा भी न गया। बस, मुँह बाये उन दोनों की ओर देखता भर रह गया मैं।
दिन-पर-दिन उस भुतहे मकान की रहस्यमयी गुत्थी उलझती जा रही थी। मेहरुन्निसा का अस्तित्व मेरे लिए और अधिक जटिल और रहस्यमय होता जा रहा था। मेरे कमरे में मेरा सिर सहलाने वाली और मुझसे बातें करने वाली आखिर थी कौन ? अगर मेहरुन्निसा नहीं थी तो फिर कौन थी ?
_उस रात फिर वही लम्बी-चौड़ी काठी वाला व्यक्ति मकान में दिखलायी दिया। सिर झुकाए गमगीन-सा आँगन में खड़ा रहा था वह। मगर जैसे ही मेरी नजर उस पर पड़ी, वह एकाएक आँगन की दीवार में समा गया। यह देखकर मेरे मस्तिष्क में एकबारगी कुछ कौंध-सा गया।_
दूसरे दिन मैंने उस दीवार को तुड़वाना शुरू किया क्योंकि मेरे ख्याल में उसी दीवार के पीछे उस भुतहे मकान का सारा रहस्य छिपा हुआ था।
मेरा अनुमान सही निकला। दीवार के गिरते मुझे सामने लगभग चार फीट लम्बी लोहे की चादर दिखलायी दी। वह चादर दीवार में पेचों के जरिये कसी हुई थी। मैंने उसे भी खुलवाया। काफी मेहनत से खुली वह मोटी चादर।
_उसके हटते ही मुझे नीचे जाने के लिए सीढियां दिखलायी दीं। भीतर अंधेरा था और सीलन भरी बदबू भी थी। मैं टॉर्च की रोशनी की सहायता से सीढ़ियां उतर कर नीचे पहुँचा। नीचे मुझे एक लम्बा-चौड़ा कमरा मिला। वह कमरा मुझे काफी रहस्यमय लगा।_
कमरे में एक बड़ी-सी लकड़ी की अलमारी थी जो काफी पुरानी लग रही थी। मैंने उसे भी तुड़वा दिया। अलमारी में मुझे ईस्ट इंडिया कम्पनी के जमाने के चाँदी के कुछ सिक्के और जड़ाऊ तलवार मिली, कमरे के एक कोने में एक बड़ा भारी लोहे का संदूक भी था। उसका ताला बड़ा भारी और मजबूत था।
_उसे तोड़ने में काफी परेशानी हुई। उस लम्बे-चौड़े संदूक के खुलने पर मुझे उर्दू में लिखी हुई अरबी तन्त्र-मन्त्र की काफी पुरानी किताबें और सुनहरे फ्रेम में जड़ी हुई दो तस्वीरें मिली। उन्हीं के साथ चमड़े में लिपटा हुआ एक दस्तावेज भी मिला।_
इन सब पुरानी वस्तुओं के अलावा सबसे आश्चर्यजनक और कौतूहलपूर्ण जो वस्तु मुझे उस संदूक में मिली, वह थी स्फटिक की एक तश्तरी। लगभग एक फुट व्यास की वह तश्तरी गहरी भी थी जिसमें पीले रंग का कोई द्रव भरा हुआ था और जिसमें कम्पास की तरह कई सुइयां तैर रही थीं। उनके चारों ओर ग्रह-नक्षत्रों के चित्र खुदे हुए थे।
_सुइयां उन पर तेजी से घूम रही थीं। मैंने उस तश्तरी को छूना चाहा। मगर जैसे ही उसका स्पर्श किया, उसी क्षण मेरा सारा शरीर रोमांचित हो उठा और सिर सनसनाने लगा और उसी के साथ मुझे बिजली जैसा झटका लगा। सहसा स्फटिक की वह तश्तरी टूट गयी और उसमें भरा द्रव और कम्पास की सुइयां भी चारों ओर बिखर गयीं और उनके बिखरते ही कमरे में भूचाल-सा आ गया। दीवारें काँप उठीं।_
मैं उन पुस्तकों, दस्तावेज और सिक्कों को लेकर उस गुप्त कमरे से बाहर निकल आया। साथ में उन तैल चित्रों को भी लाना नहीं भूला। उर्दू और अरबी का ज्ञान मुझे था।
_इसलिए उन प्राचीन तंत्र की पुस्तकों और चमड़े की खोल में लिपटे उस दस्तावेज को पढ़ने और समझने में मुझे दिक्कत नहीं हुई।_
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वे पुस्तकें अरबी और फारसी तन्त्र-मन्त्र और ताबीजों के अलावा काला जादू, मैली विद्याओं, टोना-टोटका आदि की हस्तलिखित प्राचीन व दुर्लभ पुस्तकें थीं–इसमें सन्देह नहीं।
उन तांत्रिक पुस्तकों का लेखक कोई औलिया फ़क़ीर था जो कभी अरब होता हुआ हिन्दुस्तान आया था और हमेशा के लिए मुल्तान में ठहर गया था। कहने की आवश्यकता नहीं–आज से करीब दो सौ वर्ष पहले मुल्तान अरबी और फ़ारसी तांत्रिकों का गढ़ था।
वह औलिया प्रायः खामोश रहता था। उसने कुछ दिनों बाद अपना एक शागिर्द (शिष्य) बनाया जिसका नाम था–शाकिर। शाकिर पक्का शागिर्द साबित हुआ। वह खूब सेवा-टहल करता अपने उस्ताद (गुरु) की।
गुरु भी अपने लड़के की तरह मानता था अपने शिष्य को। ऐसी स्थिति में जो परिणाम सामने आना चाहिए, वही आया। शाकिर एक अच्छा साधक बन गया। औलिया की सारी तांत्रिक विद्या उसने धीरे-धीरे सीख ली। मगर तांत्रिक साधना और तांत्रिक विद्याओं ने शाकिर में विनम्रता, सहिष्णुता और विवेक के बजाय अहंकार भर दिया।
अपने-आपको महान शक्तिमान समझने लगा वह। अपनी शक्ति और अपने सामर्थ्य के सामने वह किसी को कुछ न समझता। दस्तावेज के अनुसार उसे एक परी सिद्ध थी जो काफी शक्तिशालिनी थी। वह शाकिर के इशारे पर कोई भी अच्छा या बुरा कार्य कर सकती थी। उसी का बेहद घमण्ड था शाकिर को।
औलिया के इंतकाल के बाद तो शाकिर का घमण्ड और अहंकार और बढ़ गया। तभी उस पर नज़र पड़ी मुल्तान के एक जमींदार की जिसका नाम था–कुरबान अहमद। शाकिर की रूहानी ताकत से वह अच्छी तरह परिचित था।
एक दिन उसने शाकिर को अपने पास बुलाया। अपनी कोई बहुत बड़ी समस्या उसने उसके सामने रखी। शाकिर ने परी की मदद से उस जटिल समस्या को हल कर दिया जिसके बदले जमींदार ने उसे बहुत सारे सोने-चांदी के सिक्के और जड़ाऊ गहने दिए और याददाश्त के तौर पर एक जड़ाऊ तलवार भी भेंट की। उस जमाने में वह लाखों की सम्पत्ति थी मगर शाकिर उससे खुश नहीं हुआ।
वह तो मेहरुन्निसा को चाहता था–कुरबान अहमद की इकलौती बेटी मेहरुन्निसा को। उसके हुस्न और उसकी खूबसूरती ने शक्रिर के मन की शान्ति छीन ली थी। वह हर हालत में मेहरुन्निसा को हासिल करना चाहता था। मगर वह जमींदार अपनी इकलौती बेटी को उसे किसी भी कीमत पर देना नहीं चाहता था।
जब किसी भी प्रकार वह तैयार नहीं हुआ तो शाकिर ने अपने इल्म से काम लिया।
एक दिन जब रात के अंधेरे में सारा मुल्तान शहर डूबा हुआ था और लोग गहरी नींद में बेखबर सो रहे थे तो उसी वक्त दौड़ती-हांफती मेहरुन्निसा आयी और शाकिर की चौड़ी छाती से लिपट गयी। इतना ही नहीं, उसने फिर अपने-आपको शाकिर के हवाले कर दिया।
शाकिर तो यही चाहता था। उसकी मुराद पूरी हो गयी थी। वह रुका नहीं, उसी रात मेहरुन्निसा को लेकर सीधा कलकत्ता के लिए रवाना हो गया। वह मेहरुन्निसा को इस शहर से बहुत दूर ले जाना चाहता था ताकि उसके बाप का साया भी उस पर न पड़े।
उस वक्त शाकिर की उम्र चालीस के लगभग थी जबकि मेहरुन्निसा ने सोलह वसन्त ही पार किये थे। निश्चय ही उसकी उस वक्त पवित्र आत्मा रूहानी दुनियाँ की किसी नापाक ताकत के गिरफ्त में थी। वर्ना वह कभी उस अधबूढ़े और बदसूरत तांत्रिक को अपना तन-मन अर्पित न करती।
खैर, शाकिर कलकत्ते में पूरी तरह जम गया। उसकी चमत्कारी तंत्र विद्या ने उसे शौहरत भी दी और बेशुमार दौलत भी। उसने मेहरुन्निसा से शादी की और उसके लिए हवेलीनुमा महल बनवाया जिसका नाम रखा– इशरत महल।
मगर कहते हैं कि जो होना होता है, वही होकर रहता है। शाकिर के साथ भी वही हुआ। एक दिन शाकिर का इल्म छन्न से टूटकर बिखर गया और जब मेहरुन्निसा को सच्चाई का एहसास हुआ तो मन मसोस कर रह गयी वह। इसके अलावा और चारा भी क्या था उसके पास।
उन्हीं दिनों एक अंग्रेज युवक शाकिर के यहां आने-जाने लगा था। उसका नाम था–डफ। डफ काफी सुन्दर, स्मार्ट और सजीला नौजवान था। सबसे अधिक दिलकश थीं उसकी भूरी आंखें जिनमें एक अजीब-सा सम्मोहन भरा था।
पहली ही मुलाकात में दोनों एक-दूसरे को अपना दिल दे बैठे। मेहरुन्निसा को अपनत्व और प्यारभरे दिल की और साथ ही किसी मर्द के मजबूत सहारे की जरूरत थी उस समय। दोनों ही उसे एक साथ मिल गए। डफ ने उसके सारे सपने पूरे कर दिए।
मगर शाकिर से उन दोनों का प्यार ज्यादा दिन छिपा न रह सका। वह हर समय शराब के नशे में डूबा रहता और एक दिन जब वह रोज की तरह शराब के नशे में गले तक डूबा हुआ था, दोनों को प्यार करते देख लिया उसने। ऐसी नाजुक स्थिति में जो घटना घटनी चाहिए थी, वह दूसरे ही क्षण घट गई।
शाकिर की आंखों में खून उतर आया। वह लपक कर मेहरुन्निसा के बाप की दी हुई जड़ाऊ तलवार उठा लाया और उसने एक ही साथ दोनों का कत्ल कर दिया। दोनों प्रेमियों का खून में डूबा हुआ जिस्म जमीन पर गिर कर एक साथ छटपटाया और एक ही साथ हमेशा-हमेशा के लिए शान्त भी हो गया।
डफ का बाप ब्रिटिश सरकार में किसी उच्च पद पर था। जब उसे मालूम हुआ कि उसके बेटे का प्यार के मामले में कत्ल हो गया और कत्ल करने वाला शाकिर है तो एकबारगी बौखला गया वह।
वह चाहता तो शाकिर को तबाह कर देता मगर वह उसकी रूहानी ताकत से भलीभांति परिचित था, इसलिए वह खामोश रह गया। पर डफ के दोस्तों ने शाकिर से बदला लेने की ठान ली। डफ के दोस्तों में कुछ हिन्दू भी थे, जिनके लिये डफ ने बहुत कुछ किया था, इसलिए वे अधिक उतावले हो रहे थे।
आखिर वे हिन्दू दोस्त एक साथ निहत्थे ही शाकिर के मकान में घुस गए और मारपीट करने लगे। शाकिर था तो अकेला मगर उसके हाथ में तलवार थी। तलवार के वार के सामने निहत्थे युवक भला कब तक ठहर पाते। शाकिर के हाथों सभी मारे गए। इशरत महल का आँगन लाशों से पट गया।
शाकिर इतने से ही शान्त नहीं हुआ। दस्तावेज के अन्त में लिखा था कि उसने अपने इल्म के जोर से मेहरुन्निसा और डफ के अलावा उन सभी युवकों की आत्माओं को इशरत महल में कैद कर दिया ताकि वे जिंदगी भर प्यासी रहें और हमेशा भटकती रहें वहीं इशरत महल में।
यह भी लिखा था कि जब तक स्फटिक की तश्तरी के कम्पास की सुइयां घूमती रहेंगी, तब तक वे आत्माएं इशरत महल में कैद रहेंगी। उनकी मुक्ति न हो सकेगी।
मगर यह काम शाकिर को बहुत महंगा पड़ा। कुछ दिनों बाद एक रात वे सभी प्यासी आत्माएं एक साथ शाकिर पर टूट पड़ीं और उसका गला घोंट दिया। सवेरे उसकी लाश आँगन में पड़ी पाई गई। उसकी आंखें और जीभ बाहर को निकल आयी थी और चेहरे पर भय और आतंक का भाव था। खैर, कहने की आवश्यकता नहीं–तभी से इशरत महल भुतहा हो गया था।
उन दो तस्वीरों में पहली शाकिर की तस्वीर थी। उसका चेहरा बड़ा भयानक और प्रभावशाली था। यदि किसी सांप को इंसान की शक्ल से बदल दिया जाय तो बहुत कुछ शाकिर जैसा लगेगा। उसका जबड़ा चौड़ा था और नीचे की ओर लटका हुआ था। उसकी आंखें लम्बी और गहरी थीं और नीलम जैसी चमक थी।
उसकी आँखों के भाव को देखकर लगता था कि अपनी तांत्रिक शक्ति पर उसे बहुत विश्वास हो।
दूसरी तस्वीर देखते ही एकबारगी चौक पड़ा मैं। पहले तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। काफी देर तक गौर से देखता रहा मैं।
वह मेहरुन्निसा की तस्वीर थी, मगर उसमें जो शक्ल थी, वह बिल्कुल खां साहब की बेटी मेहरुन्निसा से मिलती-जुलती थी। वही रूप-रंग और वही नाक-नक्श। कहीं कोई रंचमात्र फर्क नहीं। लगा–कि जैसे खां साहब की बेटी मेहरुन्निसा के सामने ही बैठकर चित्रकार ने चित्र का निर्माण किया हो।
उस चित्र को देखकर मेरी एक शंका का समाधान हो गया। वह यह कि उस दिन अपने कमरे में जिस मेहरुन्निसा को देखा था और जिससे बातें की थीं, वह खां साहब की बेटी मेहरुन्निसा नहीं, बल्कि शाकिर की बीवी मेहरुन्निसा थी।
खां साहब को सारी कहानी सुनाने के बाद जब अन्त में इस रहस्य को खां साहब को बतलाया तो वे एकबारगी स्तब्ध रह गए।
मुझे इस बात की भारी प्रसन्नता थी कि मेरे हाथ अनायास अरबी-फारसी तन्त्र-मन्त्र की हस्त-लिखित प्राचीन पुस्तकें लग गयीं थी। वास्तव में तन्त्र-मन्त्र की वे अद्भुत पुस्तकें थीं–इसमें सन्देह नहीं।
इन तमाम घटनाओं के घटे एक लम्बा अर्सा गुजर चुका है। इशरत महल की वे तमाम प्यासी आत्माएं मुक्त हुई या नहीं–यह तो मैं नहीं बतला सकता।
लेकिन तब से फिर कभी कोई भयानक घटना नहीं घटी। खाँ साहब ने इशरत महल तुड़वा कर नए सिरे से उसका निर्माण कराया और उसका नाम रखा–‘मेहरुन्निसा महल’.
(चेतना विकास मिशन)

