सुधा सिंह
मैं और मेरे जैसे बहुत से लोग हैं , जो हिन्दुत्व-विमर्श को लेकर अपने को दो पाटों के बीच में चिड़िया के दाने की तरह फ़ँसा हुआ पाते हैं और कोई बढ़ई चिडिया की पुकार नहीं सुनने-वाला है कि मेरा दाना निकाल दो ! पाटों को फिर से अलग कर दो !
साहित्य में जीते हुए फ़ँसे हुए दाने का दर्द और दाने के लिए गुहार लगाने वाली अधिसंख्य भारतीय जनता के दर्द को समझती हूँ और इसीलिए अकेलेपन के हाशिये में पड़ने का जोखिम उठाते हुए मैं लिखती हूँ , चिड़िया को दाना न दे सकूँ , पीने का पानी तो दे सकती हूँ !
एक पाट , जिसे हिन्दू शब्द से ही परहेज है ! दूसरा पाट , हिन्दू को मजहबी तअस्सुब का वैसा ही शिकार बनाना चाहता है , विभाजितमन हम और वे ! दूसरा पाट हिन्दू की निरन्तरता और समग्रता को नहीं देख पाता !
गाय , गगा ,तुलसी , पीपल तक सीमित रहने वाला यह मन उपनिषद के कुछ वाक्य स्वीकार कर लेता है, किन्तु वै्दिक-वाङ्मय तथा पुराण के समग्र विस्तार का उसके लिए कोई महत्त्व नहीं , निरन्तर नये नये जुड़ने वाले निर्वचन उसने नहीं जाने , नहीं समझे !
यह गहरी बात समझने की है कि अतीत की खूँटी पर टँगे हुए हिन्दू -धर्म की गौरवगाथा गाने की प्रेरणा उसे किसने दी , कहाँ से मिली ?
जिसने वर्तमान को हीन बतलाया ?
जिसने परमहंस रामकृष्ण को रामकृष्णमठ तक सीमित कर दिया , योगी अरविन्द को अरविन्दाश्रम में केन्द्रित मान लिया !
रमण महर्षि को छोटी सी पहाड़ी में सीमित कर दिया ! उसके बाहर के विस्तार को वह समझना ही नहीं चाहता ! उसने तिलक , मालवीय और महात्मा गांधी को भी नहीं जाना , जिनमें सनातन का सातत्त्य है !
राजनीति के आगे उसने उस धर्म को छोटा मान लिया , जिससे स्वयं राजनीति परिलक्षित हुई थी ! वह हिन्दू धर्म की वैचारिक स्वतन्त्रता से घबड़ाता है। वह उदार भाव से घबड़ाता है।
सामूहिक अनुशासन के नाम पर वह हिन्दू शब्द में निहित उदारता के भाव को अनदेखा कर देता है। हिन्दू संकीर्ण नहीं है ,किन्तु भय के कारण वह मजहबी कट्टरता को अपने ऊपर लाद लेता है ! हिन्दू शब्द क्यों वर्जित हुआ ? इसकी मीमांसा होनी चाहिये। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में जो नवजागरण हुआ , वह हिन्दू-जागरण था !
उस समय हिन्दू शब्द साहित्य का वर्जित शब्द नहीं था और देश की बात करना फासीवाद नहीं था ! क्यों यह शब्द वर्जित हुआ ? इसकी मीमांसा होनी चाहिए ! क्या यह इसलिए वर्जित हुआ कि हिन्दू सब का मंगल चाहता है ? क्या यह इसलिए वर्जित हुआ कि हिन्दू सभी जीवों [चेतन और अर्द्धचेतन ] में अव्यय-भाव की संभावना देखता है ?
सनातन दर्शन की वह बात जो तिलक मालवीय और गांधी में परिलक्षित हुई थी , वह राजनीति के आगे छोटी कैसे पड़ गयी ? हिन्दू शब्द में निहित उदारता का भाव कैसे संकीर्ण बन गया ? हिन्दू की वैचारिक-स्वतन्त्रता से घबड़ाहट क्यों होने लगी ?

