राजनारायण उस समय (वर्ष 1939-44) काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र थे और छात्रसंघ अध्यक्ष भी। उन्होंने अपने विद्रोही तेवरों से स्वतंत्रता आंदोलन को कुछ ऐसी तीखी धार दी कि ब्रिटिश सरकार हिल उठी। उस दौर में पांच हजार के इनाम के साथ उनकी जिंदा या मुर्दा गिरफ्तारी का परवाना जारी हुआ। इसी बीच वह गिरफ्तार हुए और उन्हें जेल भेज दिया गया।
लोकबंधु के नाम से चर्चित राजनारायण का यह पहला आंदोलन और पहली जेल यात्रा थी। इसके बाद तो स्वतंत्रता मिलने के बाद भी उनके विद्रोही तेवरोंं ने आजीवन चैन से बैठने नहीं दिया। संघर्ष यात्रा के दौरान उन्होंने लगभग सात सौ आंदोलनों का नेतृत्व किया, करीब 80 बार जेल गए।
1946 में राजनारायण कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव चुने गए। 1951 में सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना हुई तो उन्हें संयोजक बनाया गया। फिर तो समाजवाद खून बनकर उनकी रगो में दौड़ने लगा। वह एक दिग्गज समाजवादी नेता के रूप में धूमकेतु की तरह उभरकर सामने आए। 1952 से 1957 और 1957 से 1962 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। नेता प्रतिपक्ष के रूप में जनता के मानस पटल पर अमिट छाप छोड़ी।
आजादी के बाद लोकतंत्र में लोकभाव की स्थापना कैसे हो, इसे प्रतिपक्ष के नेता के रूप में मूर्त सत्य के रूप में प्रतिष्ठित किया। डा. राममनोहर लोहिया ने तो यहां तक कहा कि राजनारायण के जीते जी इस देश में लोकतंत्र मर नहीं सकता। 1966 से 1972 और 1974 से 1977 तक राज्यसभा सदस्य रहे। दो बार लोकसभा सदस्य के रूप में भारतीय संसदीय मूल्यों को नई ऊंचाई प्रदान की।
सत्ता पक्ष में रहते हुए भी स्वभाव प्रतिपक्ष का : आपातकाल का अंधेरा छंटने के बाद 1977 में राजनारायण मोरारजी देसाई की सरकार में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री बने। तब भी उनका स्वभाव विपक्षी नेता का ही रहा। अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज उठाने में कभी संकोच नहीं किया। लोग उन्हें चौधरी चरण सिंह का हनुमान कहते थे। किंतु जरूरत पड़ने पर उनका विरोध करने से भी वह पीछे नहीं हटे।

