Site icon अग्नि आलोक

पुनर्जन्‍म : वाद और सिद्धांत से परे स्वानुभूति का विज्ञान

Share

डॉ. विकास मानव
(ध्यानप्रशिक्षक, मनोचिकित्सक)

किसी वाद या सिद्धांत में मेरा विश्‍वास नहीं है। चेतना का विकास करो और ‘स्व’-अनुभूति से जानो। ज्ञान नहीं, बोध सही जबाब देगा ऐसे हर विषय से संबंधित सवालों का।
सिद्धांतवादी यथार्थ के बारे में कुछ भी नहीं जानते, मगर वह इस सबके बारे में सिद्धांत गढ़ते रहते हैं। उसका पूरा जीवन घूमता ही रहता है : सत्‍य, यर्थाथ तो बस केंद्र में ही रह जाता है। सिद्धांतवादी बस इधर-उधर की हांकने में माहिर होता है।
जिस क्षण आप किसी दूसरे पर भरोसा करने लगते हो, तो अपनी व्‍यक्‍तिगत खोज बंद कर देते हो: यह आत्म-हिंसा है। हजारों वर्ष से व्‍यक्‍ति को इसी तरह छला गया और उसका शोषण किया गया है।

केवल अपने अनुभव पर भरोसा रखो। मैं हां कहूं या न, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। अंतर इस बात से पड़ता है कि-
आपने इसका अनुभव किया या नहीं। वहीं निर्णायक होगा। उससे आपके जीवन में परिवर्तन आ जाएगा।
तीन धर्म हैं—यहूदी, ईसाइयत, इसलाम, जिनका पूनर्जन्‍म के सिद्धांत पर नकारात्‍मक रूख रहा है। वे कहते है कि यह सच नहीं है। यह एक नकारात्‍मक विश्‍वास है। इन तीनों धर्मों के समानांतर—हिंदू, बौद्ध और जैन, तीन धर्म है जिनका सकारात्‍मक दृष्‍टिकोण है। वे कहते है, पुनर्जन्‍म एक वास्‍तविकता है।
किंतु-
वह भी एक विश्‍वास है; एक सकारात्‍मक विश्‍वास।

मेरा दृष्टिकोण दोनों से परे मौलिक है:
पुनर्जन्म को परिकल्‍पना मान कर स्‍वीकार करो, न तो हां कहो और न तो ना कहो। परिकल्‍पना मान कर स्‍वीकार करने का अर्थ है: ‘’मैं इसके बारे में किसी सकारात्‍मक अथवा नकारात्‍मक पूर्वाग्रह के बिना इसी जांच-पड़ताल करने के लिए तैयार हूं। मैं इसकी सच्‍चाई जानने के लिए किसी पूर्व कल्‍पित विचार के बिना इसकी गहराई में जाऊँगा।
धर्मों ने परिकल्‍पना शब्‍द का प्रयोग किया ही नहीं है। आप या तो विश्‍वास करें या अविश्‍वास।
अविश्‍वासी भी विश्‍वासी होता है। केवल नकारात्‍मक ढंग से।
उनमें कोई गुणात्‍मक भिन्‍नता नहीं है। वे एक तरह के लोग हैं।
जब आपका कोई नकारात्‍मक विश्‍वास या कोई सकारात्‍मक विश्‍वास होता है, तो मन ने यह निर्णय कर लिया होता है कि सच्‍चाई क्‍या है। इसे अप्रामाणिक, बेईमान कहा जा सकता है।
आप किसी वस्‍तु को नकारात्‍मक अथवा सकारात्‍मक दृष्‍टि से स्‍वीकार कर लेते हो, तो मन की यह क्षमता है कि वह उस तरह का भ्रम पैदा कर देता है।

इसलाम में, ईसाइयों में, यहूदियों में ऐसे बच्‍चे नहीं मिलेंगे जिन्‍हें अपने पूर्वजन्‍म की याद हो।
किंतु- हिंदू, बौद्ध, और जैन धर्मों में लगभग प्रत्‍येक दिन कहीं ने कहीं किसी बच्‍चे को अपने पूर्व जन्‍मों की याद आती है।
लोगों ने यह समझने का प्रयत्‍न किया है कह उसकी स्‍मृति में कोई तथ्‍य होता है या यह मात्र कल्‍पना होती है।
ऐसे बहुत से मामले मिले हैं जिनके तथ्‍य पुनर्जन्म का स्‍पष्‍ट रूप से समर्थन करते हैं।
भारत में तो ऐसा हर दिन होता रहता है—एक स्‍थान में, दूसरे स्‍थान में, किसी ने किसी बच्‍चे को इसकी स्‍मृति होती है।
हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म कोई भी इसकी जांच-पड़ताल नहीं करता। क्‍योंकि- वे इस बात से भयभीत होते हैं कि उनका सिद्धांत गलत न सिद्ध हो जाये। मगर आप किसी ईसाई देश में, यहूदी समुदाय में, किसी इस्‍लामिक भूमि में ऐसा नहीं कर सकते।
इसलिए कि-
उन्‍होंने इस बात को स्‍वीकार कर लिया है कि इस तरह की चीज पूर्ण रूप से असत्‍य है।

हां तक मेरा अनुभव है :
पुनर्जन्‍म एक सच्‍चाई है। यह मेरा अपना अनुभव है; जो मेरे लिए सत्‍य है, ‘किसी और के लिए वह सिद्धांत हो जाता है। इसीलिए तो- मेरा सिद्धांतों में, विश्‍वासों से कुछ लेना-देना नहीं है। ‘स्व’-अनुभूत सत्‍य मेरा आधार है।
आपका भी यही होना चाहिये। किसी पोथी में लिखा है, बुद्ध- महावीर- ओशो आदि ने कहा है: कूड़े में डालो। जो सत्य खुद अनुभव करो वो ही स्वीकरो।
अनुभू़व का मार्ग हम बता सकते हैं, चलकर दिखा भी सकते हैं; परन्तु- चलना अंतत: आपको होगा। अनुभव का द्वार हम खोल सकते हैं- प्रवेश-द्वार : उसमें एंट्री आपको लेनी होगी। व्हाट्सप्प 9997741245 पर इंट्रोडक्शन देकर समय लेने के बाद आप हमसे बात कर सकते है.
🏵चेतना विकास मिशन

Exit mobile version