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*जलपान के कायदे और फायदे*

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           डॉ. विकास मानव 

कहते हैं : जान है तो जहान है, तंदुरुस्ती हज़ार नियामत, पहला सुख निरोगी काया. इसके लिए स्वास्थ्य के कुछ मूलभूत नियमों का पालन करना जरूरी होता है. यहाँ हम पानी पीने के कायदे और इसके फायदे आपको बता रहे हैं.

      हमारे शरीर को सबसे बड़ी प्यास पानी की होती है। भोजन का नंबर बाद में अता है. पानी केवल प्यास बुझाने भर का साधन नहीं है, जीवन भी है. जल जीवन है, पढ़ा-सुना होगा आपने. 

    सही समय पर, सही मात्रा में और सही तरीके से पानी पीएं तो यह सेहत का सानी बन सकता है।

    *किसके लिए कितना पानी ?*

14 साल या इससे ऊपर वालों को दिनभर में 2.5 से 3.5 लीटर पानी पीना चाहिए। यह जरूरत सबके शरीर, उम्र और काम करने के तरीके पर भी निर्भर करती है। जो ज्यादा पसीना बहाते हैं, उन्हें ज्यादा पानी पीना होती है।

   6 से 13 साल तक के बच्चों को रोजाना 1.5 से 2 लीटर पानी पीना चाहिए। वे बीच-बीच में नीबू पानी, स्मूदी लस्सी, शिकंजी, शेक ले सकते हैं।

किडनी, हार्ट और लिवर सिरोसिस जैसी बीमारियों में कम पानी पीना चाहिए क्योंकि शरीर में ज्यादा लिक्विड जमा हो सकता है. इससे सूजन, हाई ब्लड प्रेशर और सांस लेने में दिक्कत हो सकती है।

*लिक्विड डाइट की लिमिट :*

   केवल पानी पीने के बजाय हमें पानी के साथ-साथ लिक्विड डाइट भी लेनी चाहिए. इसका रेशियो 80:20 का रहे तो अच्छा होगा. यानी 80 प्रतिशत पानी और 20 प्रतिशत लिक्विड डाइट होनी चाहिए. स्मूदी, नींबू पानी, चने का सत्तू, लस्सी आदि लिक्विड डाइट हैं. 

   गर्मी में लिक्विड डाइट में मीठे लिक्विड के बजाय नमकीन लिक्विड डाइट लेना ज्यादा फायदेमंद होता है. इसलिए कि, पसीने के रूप में हमारी बॉडी से सबसे ज्यादा सोडियम डिस्चार्ज होता है। नमकीन लिक्विड डाइट से शरीर में सोडियम की कमी नहीं होती. थकान, चक्कर और डीहाइड्रेशन से बचाव होता है। इससे शरीर का इलेक्ट्रोलाइट का बैलंस बना रहता है और एनर्जी लेवल बेहतर रहता है।

*पानी न कम,  न ज्यादा :*

  कई लोग जरूरत से ज्यादा पानी पीते हैं। दिन भर सिर्फ लिक्विड डायट ही लेते हैं। पानी हमारे शरीर के लिए बहुत जरूरी है। इसकी कमी से हमारे शरीर के सेल्स डिहाइड्रेट हो जाते हैं और घातक डिहाइड्रेशन हो सकता है। इसकी वजह से हमें शॉक भी लग सकता है। लेकिन इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि हम जरूरत से ज्यादा पानी पीएं। जब हम जरूरत से ज्यादा पानी पीते हैं तो यह खून में सोडियम स्तर को कम कर सकता है, जिसे हाइपोनेट्रेमिया कहते हैं। इससे मस्तिष्क पर दबाव बढ़ता है। इसके लक्षणों में सिरदर्द, मतली, थकान, भ्रम, मांसपेशियों में कमजोरी और गंभीर मामलों में दौरे या कोमा शामिल हो सकते हैं। ज्यादा पानी पीने से हमारी किडनी पर ज्यादा लोड पड़ता है। उसे ज्यादा पानी फिल्टर करना पड़ता है जो ठीक नहीं है।

*कितना होना चाहिए TDS ?*

   TDS का मतलब होता है Total Dissolved Solids, यानी पानी में घुले हुए कुल ठोस पदार्थ जैसे- खनिज, नमक, धातुएं आदि। यह पीने के पानी की क्वॉलिटी का संकेत देता है।  WHO के मापदंडों के मुताबिक 50 – 150 mg/L TDS बेहतरीन,150 – 300 अच्छा, 300 – 500 ठीक-ठाक, 500 – 1000  हानिकारक होता है.

    TDS 50 से कम हो तो इसका मतलब है कि पानी से मिनरल्स से काफी हद तक निकल चुके हैं जो सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए RO (Reverse Osmosis) तभी लगाएं जब पानी का TDS 300 से ज्यादा हो। कुछ RO मिनरल्स को वापस पानी में जोड़ने वाली टेक्नॉलजी के साथ भी आते हैं।

*कब, कैसा और कितना पानी?*

    कई लोग गर्मी के मौसम में भी गर्म पानी पीते रहते हैं ताकि उनका वजन कम हो। यह ठीक नहीं है। इस मौसम में गर्म पानी पीने से शरीर में गर्मी पैदा होती है जो डिहाइड्रेशन कर सकती है। इसमें सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इसका जितना फायदा होना है उससे ज्यादा नुकसान हो सकता है।

   सुबह उठते ही एक गिलास गुनगुना पानी पीना पाचन के लिए अच्छा होता है। इसकी जगह चाहें तो एक गिलास नॉर्मल पानी भी पी सकते हैं। एक गिलास पानी में आधा नीबू निचोड़कर या उसमें शहद भी डालकर ले सकते हैं।

   जो लोग वजन कम करना चाहते हैं उन्हें खाना खाने से आधा घंटा पहले पानी जरूर पीना चाहिए। अगर वे पहले पानी पी लेंगे तो पेट कुछ भरा रहेगा और वे ज्यादा खाना नहीं खा पाएंगे। इसकी जगह सूप या मट्ठा ले लें तो भी अच्छा रहेगा। 

   खाना खाते समय अपने साथ पानी जरूर लेकर बैठना चाहिए। खाते समय गले में कुछ फंस जाए या हिचकी आए तो पानी को घूंट-घूंट में ले सकते हैं। यह पानी भोजन जितना गरम होना चाहिए. ठंडा पानी आंतों की आग (जठराग्नि) कम कर देगा. भोजन देर से पचेगा. अपच, गैस होना संभव है.

     खाना खाने के 30 से 45 मिनट बाद कैसा भी पानी पीना चाहिए. मॉडर्न मेडिसिन भी कहती है कि खाने के तुरंत बाद पानी पीने से पेट में जो एंजाइम बनते हैं वे घुल जाते हैं जिससे खाना पच नहीं पाता। 

    शरीर से निकलने वाले पसीने की भरपाई के लिए जरूरी है कि एक्सरसाइज के 20 मिनट बाद पानी जरूर पिएं। गर्मी में नमक डालकर नीबू पानी ले सकते हैं। एक गिलास पानी पीकर सोने से शरीर रातभर हाइड्रेटिड रहता है।

*पानी पीने का सही तरीका :*

    पानी को एकदम से न पिएं, घूंट-घूंट कर धीरे-धीरे पिएं। धीरे-धीरे पानी पीने से लार (सलाइवा) पानी में मिलती है जो पाचन को बेहतर बनाती है।

    पानी आराम से बैठकर और अपने शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़कर पीना चाहिए। इससे पानी पूरे शरीर की कोशिकाओं में जाता है। जब हम खड़े होकर पानी पीते हैं तो हमारा शरीर तना हुआ यानी सख्त होता है जिससे पानी हमारी बॉडी के सेल्स में नहीं पहुंच पाता। 

   जब हम गर्मी के मौसम में बाहर से घर में आते हैं तो तुरंत पानी न लें। यह जरूरी है कि शरीर का तापमान सामान्य होने पर ही पानी पिएं। औसतन 5 से 10 मिनट के भीतर शरीर का तापमान सामान्य हो जाता है। लेकिन इस चक्कर में बहुत-से लोग काफी देर तक पानी नहीं पीते जिससे डिहाइड्रेशन की स्थिति हो सकती है। इसलिए बाहर से आकर थोड़ी देर बाद पानी पीना न भूलें।

    बहुत ठंडा पानी पीने से बचें क्योंकि यह पाचन पर असर डाल सकता है। वहीं बहुत गर्म पानी पीना भी ठीक नहीं है।

  कभी अगर प्यास लगे तो उसे नजरअंदाज न करें, तुरंत पानी पिएं। इन दिनों घर से बाहर जाना पड़े तो भरपूर पानी पीकर ही निकलें। यह डिहाइड्रेशन से बचाता है।

*मटके का पानी :*

   सादा मटका ही खरीदें। केमिकल से पेंट किए गए मटके सुंदर दिखते हैं लेकिन इनका पानी सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है। इसलिए जब भी मटका बाजार से खरीदें तो ध्यान दें कि इसे सिंथेटिक कलर से पेंट न किया गया हो। 

    जब मटका एक साल पुराना हो जाए तो इसे नींबू या विनेगर से अंदर और बाहर दोनों ओर से अच्छी तरह से साफ करें। 

    पानी को हमेशा स्टेनलेस स्टील, कांच की बोतल या मिट्टी के बर्तन में स्टोर करना चाहिए। इन बर्तनों में पानी लंबे समय तक साफ रहता है और बैक्टीरिया पनपने की संभावना कम होती है। आयुर्वेद के अनुसार, तांबे और चांदी के बर्तन में पानी रखना फायदेमंद माना गया है।

     जब कोई व्यक्ति ज्यादा मानसिक तनाव में होता है तो उसे बार-बार प्यास लग सकती है और पेशाब भी अधिक आ सकता है। इस दौरान ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और पाचन तंत्र भी गड़बड़ा जाता है।

      मेंटल स्ट्रेस की वजह से भी शरीर में पानी की मांग बढ़ जाती है जिससे उस शख्स को ज्यादा प्यास लग सकती है और ज्यादा यूरिन डिस्चार्ज होता है। एंग्जाइटी की स्थिति में ऐसा होता है। अगर किसी को बार-बार प्यास लग रही है, ज्यादा यूरिन आ रहा है तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।

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