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जातिगत जनगणना को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया क्षेत्रीय विपक्षी दलों ने

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केसी त्यागी, पंकज चौरसिया
आगामी लोकसभा चुनाव के पहले क्षेत्रीय विपक्षी दलों ने जातिगत जनगणना को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया है। कुछ दिनों पहले तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अपनी पार्टी DMK की ओर से आयोजित ‘ऑल इंडिया फेडरेशन फॉर सोशल जस्टिस’ के प्रथम सम्मेलन में कहा कि ‘जहां कहीं भी भेदभाव, बहिष्कार, छुआछूत और अन्याय है, उसे दूर करने की एकमात्र दवा सामाजिक न्याय है।’ DMK की ओर से आयोजित इस सम्मेलन में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, CPM महासचिव सीताराम येचुरी, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और JKNC प्रमुख फारूक अब्दुल्ला आदि विपक्षी नेताओं ने हिस्सा लिया और जाति आधारित जनगणना की भी वकालत की। इसे तब और बल मिला, जब कर्नाटक की एक चुनावी रैली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा, ‘2011 के जातिगत सर्वेक्षण के आंकड़ों को सार्वजनिक किया जाए।’ बिहार में सीएम नीतीश ने 15 अप्रैल से जाति जनगणना शुरू करवाई है, जो 15 मई तक चलेगी। वर्तमान में जातिगत जनगणना के बड़े नायक बन कर बिहार के सीएम नीतीश कुमार उभरे हैं जहां जनगणना के आंकड़े एकत्र करने का दूसरा दौर जारी है। लेकिन शुक्रवार, 21 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने इसके खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई की मंजूरी दे दी। शीर्ष अदालत 28 अप्रैल को यह सुनवाई करेगी।

जाति का बदलता स्वरूप
दिलचस्प है कि वर्ष 1931 के बाद कई जाति समूह जनगणना करने वालों से अलग कास्ट स्टेटस की मांग करने लगे। वंश परंपरा का हवाला देते हुए कुछ जातियों के लोग खुद को ब्राह्मण वर्ग में शामिल करने की मांग करते थे। कुछ जातियों को क्षत्रिय एवं वैश्य साबित करने के प्रयास होने लगे। यह जाति के आधार पर श्रेष्ठता तय करने का दौर था। लेकिन आज जाति पिछड़ेपन की निशानी बन गई है।

ओबीसी की विभिन्न जातियों के मध्य व्याप्त विसंगतियों को दूर करने के लिए इंद्रा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि ओबीसी वर्ग की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति का समय-समय पर अध्ययन कराया जाना चाहिए ताकि इस वर्ग की ऐसी जातियां जो सामाजिक, शैक्षिक व आर्थिक आधार पर वंचना से मुक्त हो गई हों, उन्हें ओबीसी वर्ग से निकालकर अन्य वर्ग में शामिल किया जाए। इससे उसी वर्ग में शामिल वंचित जातियों के उत्थान के अवसर बढ़ेंगे।

इसी क्रम में NDA सरकार द्वारा वर्ष 2017 में गठित जस्टिस रोहिणी कमिशन (जो पिछड़े वर्ग के अंतर्गत सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से गठित की गई थी) के आंकड़ों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

हमें यह भी समझना होगा कि 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा कोई अंतिम व आदर्श लकीर नहीं है, जिसे बदला नहीं जा सकता। दरअसल, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू कर यह सीमा तोड़ी जा चुकी है, जिसे सुप्रीम कोर्ट वैध ठहरा चुका है। यह भी समझना चाहिए कि अनुसूचित जाति व जनजाति के संदर्भ में उनकी उचित संख्या मालूम होने से सरकारें आसानी से तय कर पाती हैं कि उक्त राज्य में उनके लिए कितना प्रतिशत आरक्षण होगा, शैक्षणिक स्थिति को कैसे बेहतर किया जा सकता है, लेकिन ओबीसी की गणना न होने से वे इस लाभ से वंचित रह जाते हैं। अब समय आ गया है कि जाति जनगणना करवाई जाए और राज्यों की विविधता और जातियों की भिन्नता को ध्यान में रखकर सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक रूप से कमजोर जातियों (जैसे शिल्पकार, कारीगर, बुनकर एवं बागवानी करने वाली जातियों) के लिए समानुपातिक प्रतिनिधत्व सुनिश्चित किया जाए।

(त्यागी पूर्व सांसद और चौरसिया जामिया मिल्लिया इस्लामिया केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं)

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