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अनिवार्य है प्रासंगिक विषय

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शशिकांत गुप्ते

जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का , पड़ा रहन दो म्यान।

जो लोग जरा जरा सी बात पर अपनी जात को लेकर विवाद करते हैं, मतलब व्यंग्य की भाषा में अपनी जात दिखाते हैं।
ऐसे लोगो पर करारा व्यंग्य करते हुए,संत कबीर साहब कहतें हैं।
जाति पांति पूछे नहिं कोई
हरि को भजे सो हरि को होय”

भगवान की आराधना करने के लिए कोई जाति अवरोधक नहीं बनती है।
संत की फेहरिस्त पढ़ेंगे समझेंगे तो ज्ञान चक्षु खुल सकते है।
दादू दयाल पिंजारे, सावाता माली माली समाज के,रविदास मोची,नामदेव दर्जी, सूरदास भील थे मूल नाम “बिल्वमंगल” था। कबीरसाहब को किसने जन्म दिया पता ही नहीं है? गोरा कुम्हार, संत रसखान संत रहीम खान सूफी संत श्री शेख सादी हुए हैं। जिन्होंने कहा है। आदम को खुदा मत कहो,आदम खुदा नहीं,लेकिन खुदा के नूर से आदम जुदा नहीं
अपने देश में ऐसे अनेक संत हुए हैं,जिन्होंने दकियानूसी विचारों,समाज व्याप्त संकीर्ण रूढ़ियों,और सांप्रदायिक वैमनस्य पर सिर्फ व्यंग्य किया है,समाज में वैचारिक क्रांति के माध्यम से परिवर्तन भी किया है।
संतों द्वारा यथास्थितिवाद पर शब्दिक प्रहार करने वाले उपदेशक संदेश लिखे हैं,बेबाक तरीके से बोलों हैं,भजन रूप में गाए हैं।
संतों के साथ भी तात्कालिक कट्टर पंथियों ने छल किया है।
उन्हे प्रताड़ित किया है।
गांधीजी ने भी समाज के कल्याण के लिए सुधारवादी तरीका त्याग कर परिवर्तनकारी तरीका ही अपनाया।
सत्य बोलने के लिए आत्म विश्वास चाहिए।
गांधीजी के परिवर्तनकारी विचारों से भयभीत होकर कायर मानसिकता ने उनके शरीर की हत्या कर दी।
गांधीजी के विचार अमर ही रहेंगे।
कट्टरता बुजदिल मानसिकता की द्योतक हैं।
व्यापक सोच वाले अपने देश में भी भारतीय ही रहतेंं हैं। संकीर्ण सोच वाले सिर्फ विदेशों में ही भारतीय होते हैं।
मात्र बावीस वर्ष की आयु में समाधि लेने वाले संत ज्ञानेश्वर ने कहा है, हे विश्वची माझे घर मतलब स्मपूर्ण विश्व ही मेरा घर है।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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