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धर्म, समाज और स्त्री : संदर्भ : दक्षिण भारत

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ज्योतिषाचार्य पवन कुमार (वाराणसी)*

 _धर्म ने महिलाओं को महज हिजाब और बुर्के में ही नहीं लपेटा है, देवदासियां और गृहदासियां बनायी, हरम में रखा ,सती के रूप में जलाया गया, सतीत्व की परीक्षा में अग्निपरीक्षा ली गयी और जुए के पाशे पर चढ़ाई गयी। और धर्म के पालनहार राजाओं और सामंतों ने औरतों के साथ यह भी किया जो नीचे लिखा गया है।_
   क्या आप ने सुना है कि पति अपनी पत्नी की चिता पर ख़ुद को उसके ख़ाक में ख़ाक विलीन कर अपनी पत्नी प्रेम का अमर गाथा लिख जाय?! वह पहला पति सती के रूप में जाना जाता है!?
   _जी हां। लेकिन यह भी एक दर्दनाक कहानी है जो रोंगटे खड़ी कर देती है। यह अपने दर्द,करुणा, भयभीत करने की क्षमता और आश्चर्य चकित करने के कारण शेक्सपियर के किसी भी ट्रेजेडी को मात दे देती है।अंतर यह है कि शेक्सपियर का हीरो या हेरोईन कोई शाही/बड़े घराने से सम्बन्ध रखते हैं परंतु इसकी नायिका एक निर्धन दलित युवती है जिसकी मौत शाही मौत तो नहीं परन्तु शाहीतन्त्र की मौत की घोषणा है।_
    आपने सब प्रकार के टैक्सों का नाम सुना होगा परन्तु "स्तन टैक्स" जिसे Mulakkaram कहते थे? इसे अंग्रेज़ी में Breast Tax कहते थे जो Travancore के राजा ने दलितों और पिछड़ी जातियों की महिलाओं के स्तन को ढकने पर लगा रखा था।   
   _त्रावणकोर जो आज का केरल है जिसमे तमिलनाडु के दक्षिण भाग भी शामिल था।1729 से यह राज क़ायम था जो कालांतर में अंग्रेजों के मातहत रहा।_

सुप्रिया उन्नी नायर ने लिखा है,” on the size of the breast” अर्थात स्तन के आकार पर यह टैक्स लगता था। ज्यूंहि किसी लड़की के स्तन का विकास हो,टैक्स भी आरम्भ हो जाता था। अब जब साइज़ पर ही टैक्स था तो स्तन मापने और टैक्स वसूलने वाले थे जिन्हें paravathiya या टैक्स संग्रहक कहते थे।


टैक्स का नाम mulakkaram था जिसका अर्थ ही स्तन-कर है. मुल्लाक्करम वसूली के लिए निर्धन ezhavar जाति की युवा महिला नंगेली के पास paravathiya पहुंचा.
अति निर्धन नंगेली ने उसे बैठाया , दिया जलाया और केले के पत्ते को बिछाया। फिर …फिर दूसरे ही क्षण वह हंसिया के साथ आई,अपने दोनों स्तनों को काट डाला और केले के पत्ते पर रख दिया।

ख़ून के धार ने फव्वारा बनकर हरे केले के पत्ते को लाल करदिया, ज़मीन लाल होगई और वातावरण एक चीख़ में डूब गया। टैक्स संग्राहक भाग खड़ा हुआ, कटे स्तन इतिहास और दन्त कथा के अमर स्तन बन गए।
गिरी हुई हुकूमत में वह नीचे गिरी—छटपटाई और जब अपने ही ख़ून ने अपना शरीर छोड़ दिया उसकी सांसों ने भी ज़िन्दगी के डोर को बेरहमी से काट दिया। यही उसकी चाहत थी–यह पौशाचिक स्तन के पैमाने और कर से मुक्ति का और अन्य कोई राह तो नहीं था?
उसको चिता पर लेटाया गया और अग्नि ने भी उसे ख़ाक करने के लिए ज़ोर पकड़ना शुरू किया। तभी–तभी उस का पति Chirukanandan (चिरुकनन्दन )उसमें कूद गया अपनी पत्नी को गले लगाया और दोनों ने राख बनकर एक दूसरे में अपने शरीर और वजूद को सदा के लिए
पेवस्त कर लिया।

The Hindu ने 21 अक्टूबर,2013 को निधि सुरेन्द्रनाथ की article छापी जिसमें कहा कि,” 200 years on her sacrifice only a fading memory.”अर्थात 200 वर्ष हुए परन्तु उसकी याद अब धीमी पड़ रही है।
Encyclopaedea of Dravidian Tribes के पृष्ठ 198 पर इसका ज़िक्र है कि नंगेली की क़ुरबानी का एक chain reaction हुआ जिसमें लोगों ने इसका भयमुक्त होकर विरोध किया। वह जगह जहां वह जली उसका नाम भी मुलचिपरम्बू अर्थात “स्तनवाली महिला की भूमि” रखा गया जो आज भी है।
यह गांव नंगेली की वीर शहादत को भूलने नहीं देगा। अदूर के. के. रामचन्द्रन ने अपनी किताब Slavery in Kerala में Nadars, Ezhavars और दूसरी पिछड़ी जातियों पर ब्रैस्ट टैक्स का विवरण दिया है।
नादर जाति के लोग 1921 के पूर्व Shanar जाति के रूप में जाने जाते थे जो मुख्यतः ताड़ी के धंधा में थे। Ezhavas जाति अधिकांश संख्या में बुद्ध परम्परा को मानती थी। तथा हिन्दू समाज से विलगता के कारण जैसा कि Pullapilly ने लिखा है उन्हें बहिष्कृत कर दिया गया था। इनका पेशा ताड़ी के अतिरिक्त कृषि, रस्सी बनाना और नारियल की चटाई बनाना था।
इन दोनों जातियों पर विशेषकर ज़ुल्म हुआ। वर्ष 2016 में लोगों ने दांतों तले अंगुली दबाली जब बीबीसी ने दिव्य आर्य का “नंगेली” के स्तन काट कर पड़ोसने पर मुराली टी द्वारा की गई पेंटिंग्स की सिरीज़ आरम्भ की। पेंटिंग्स आत्मा को झकझोरती हैं… आहें भरवाती हैं और आंखों को तर कर जाती हैं।
CBSE ने Social Sciences में Caste, Conflict and Dress Change के शीर्ष के तहत पाठ्यक्रम में डाला परन्तु मद्रास हाई कोर्ट ने इसे “hate speech” और कुछ समुदायों के विरुद्ध बताया तथा इसे कोर्स से हटा दिया गया।

केरल में बड़ी तादाद में ईसाई और इस्लाम धर्म अपनाने का कारण भी उच्च जाति का अत्याचार था।
1813 में इस स्तन-कर को त्रावणकोर कोर्ट के दीवान कर्नल मुनरो ने वापस लेलिया था परन्तु पुनः इसे पुनःस्थापित करना पड़ा क्योंकि राजा के परिषद सदस्यों का मत था कि स्तन-कर हटाने से उच्च और निम्न जाति के बीच का विभेद ही मिट जाएगा। विभेद उनके नंगा रहने से ही बरक़रार रहता!
1829 में त्रावणकोर की रानी ने उद्घोषणा की कि स्तन ढकने के लिए कपड़े पहनने का अधिकार नहीं है। Selvister Ponnumuthan ने अपनी किताब The Spirituality of Basic Ecclesial Communities के पृष्ठ 109 पर इस आशय का ज़िक्र किया है।
यह भी अजब प्रथा था जो दलितों पर थोपा गया था कि महिला और पुरुष यदि ऊपर से नंगे रहेंगे तो ही बड़ी जाति के लोगों का स्वागत कर पाएंगे।

यही नहीं डॉ एस एन सदासिवन ने अपनी किताब A Social History of India में लिखा है,” Taxes and cesses of extraordinary nature ran into more than 120…Of which 110 were levied exclusively on poor communities.”
अर्थात 120 करों/उपकरों में 110 कर केवल निर्धन समुदाय यानी दलितों पर लगाया जाता था! न्याय का कौन सा रूप?!
एल के अनंत कृष्ण अययर ने अपनी किताब कोचीन ट्राइब्स एंड कास्ट्स में 1909 में लिखा :
“,यदि कोई चोगु या izhuvan किसी नायर को अपवित्र करता है तो “,he was at liberty to cut him down.”
यानी उसको काट देने की आज़ादी थी! उनके न्यायालय जाने से न्यायधीश अपवित्र हो जाएंगे। 36 फ़ीट के अंदर उनकी उपस्थिति उच्च जाति को अपवित्र कर देगी।
वे ब्राह्मणों के ग्राम से नहीं जा सकते थे : The males and females were not formerly permitted to wear an upper garment above waist.
यह भी अजीब है कि पुरुषों को मूंछ रखने की भी अनुमति नहीं थी. वर्ष 1859 की एक तस्वीर है जिसमे सरकारी अफसर दो महिलाओं के ऊपरी कपड़े को फाड़ रहे थे।
Deccan Chronicle ने प्रोफेसर एन नरसिंहइया की आर्टिकल छपी जिसमें लिखा है : केरल में मुलक्काराम अर्थात स्तन-कर निम्न जातियों पर लगाया गया।औरतों को कपड़े पहनने की अनुमति नहीं थी।टीपू ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया और सरकारी ख़ज़ाना से कपड़े की क़ीमत दिलाई।
टीपू सुल्तान ने जो सामाजिक व्यवस्था को disturb किया जिसका नतीजा आज उनकी रूह को विरोध के रूप में झेलना पड़ रहा है।
जो लोग हिजाब को समस्या बताते हैं वो कल स्तन ढ़कने को भी समस्या मानते थे और टैक्स तभी तो था उसमें भी स्तन के आकार की पुरुष द्वारा मापी के बाद!

क़ुरान ने तो 1500 वर्ष पूर्व निर्धारित कर दिया था कि पुरुष भी तन ढकें और महिला भी।
नंगेली नहीं मरी। उसने मरकर जीवित कर दिया मृत आत्माओं को, और फिर लोग उसकी जयकार करते संघर्ष करते रहे,मरते रहे और साथ में इस ज़ालिमिना “कर”पर ही नहीं पूर्ण नंगी व्यवस्था पर ज़र्ब लगाते रहे।मज़बूत व्यवस्था पर मज़बूततर प्रहार होता रहा।
चन्नार उपद्रव उसी के ख़ून से जनित इंक़लाब था। मुलक्करम” तो मरगया परन्तु इसे मारने के लिए जो “नंगेली” शहीद हुईं वह अमर हो — लोगों की गाथाओं में,लोक गीतों में और मुराली जैसे ब्रश और रंग के कलाकार की पेंटिंग में।
🔥चेतना विकास मिशन

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