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धार्मिक विधिविधान और संविधान?

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शशिकांत गुप्ते

आज सुबह डोर बेल बजी जैसे ही दरवाजा खोला,सीतारामजी बहुत ही विशिष्ठ वेशभूषा में प्रकट हुए।
स्वच्छ सफेद धोती ऊपर पवित्र रंग का कुर्ता,और रामनामी चादर ओढ़े हुए हैं।
मैने उन्हें अचरज से निहारते हुए अंदर आने को कहा।
कौतूहलवश मैने इस विशिष्ठ परिवर्तन का कारण पूछा?
सीतारामजी कहने लगे पंजाब में हुए हादसे को टीवी पर देख, सुन,कर और समाचार पढ़ कर मै व्यथित हूँ। देश के प्रधान सेवक की महान उदारता और सदहृदयता को प्रणाम करता हूँ। सुरक्षा में इतनी भयंकर चूक के बाद भी प्रधान सेवक ने स्वयं सकुशल लौटने के लिए सूबे के मुखिया को धन्यवाद प्रेषित किया। धन्यवाद भी प्रशासनिक अधिरकारियों के द्वारा प्रेषित कर उदारमना का परिचय दिया। यदि वे सीधे मोबाइल पर संपर्क कर धन्यवाद देतें तो मुखिया को लगता कि प्रधान सेवक ताना मार रहें हैं।
मै ने पूछा यह तो सब समझ में आ गया लेकिन आप ने अपनी वेशभूषा क्यों बदल दी?
सीतारामजी कहने लगे,कल मैने भी प्रधान सेवक की दीर्घायु के लिए घर में ही मौन रखकर महामृत्युंजय का जाप किया।
धार्मिक अनुष्ठान के लिए धार्मिक गणवेश ही धारण करना चाहिए। क्षमा करना गणवेश शब्द व्यंग्यात्मक लगता है। कारण शिक्षा संस्थानों में विश्वविद्यालय में गणवेश तो बदल देतें है।लेकिन उन्नीसवीं सदी के पच्चीस वे वर्ष का पाठ्यक्रम नहीं बदलतें हैं। इसलिए धार्मिक परिधान कहना ही ठीक है।
मै कहा रामचरितमानस में तुलसीबाबा ने चौपाई लिखी है।
लाभ,हानि जीवन मरण,यश अपयश सब विधि हाथ
सीतारामजी ने कहा इसीलिए विधि लिखित विधान का अनुसरण करते हुए पूर्ण मनोभाव से धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न किया।
मैने कहा विपक्षी तो इसे आडम्बर कहतें हैं?
सीतारामजी ने कहा कहने दो अब सभी कार्य धार्मिक विधि विधान से होंगें।
मै ने पूछा देश के संविधान का क्या होगा?
सीतारामजी ने कहा धार्मिक विधान के आगे संविधान की बात करना नास्तिक मानसिकता का द्योतक है।
देश को पहली बार इतने धार्मिक आस्थावान लोग सत्ता में विराजित हुए हैं।
मैने कहा एक विचारक ने कहा है कि,गंदा नाला साफ करों,मच्छर मारने की विभिन्न दवाइयां मत बनाओं।
सीतारामजी ने कहा सन 2014 के बाद एक अविष्कार के बाद नाले को गंदा कहना भी नाले का अपमान है। सन 2014 के बाद नाला तो स्वरोजगार का स्रोत बन गया है।
आस्था रखने से अंतरचक्षु जागृत हो जातें हैं।
मै ने कहा समझ गया। आस्थावान लोगों के सत्तासीन होने के बाद हर एक समस्या संवैधानिक नीति नियमों से नहीं धार्मिक विधि विधान से हल होंगी।
सीतारामजी मेरी बात सुनकर प्रसन्न हो गए।
जय जय सियाराम कहकर चर्चा को विराम दिया।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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