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मृत्यु का धार्मिक- दार्शनिक- वैज्ञानिक विश्लेषण 

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पूर्व कथन :
मृत्यु को समझे बिना जीवन को सही अर्थो में समझना और जीना संभव नहीं है. जड़- घामड़ लोग पशुओं की तरह बचपन से कफ़न तक के शरीर के सफ़र को जीवनयात्रा समझकर कीड़े-मकोड़ों की तरह जीकर मर जाते हैं. चेतन इंसान चिंतन करता है : जीवन क्या है, मृत्यु क्या है और मृत्यु के बाद क्या?
इस टॉपिक पर मैं जो लिख रहा हूँ, वह अहर्निश अधर्म में डूबे धर्म के ठेकेदारों से नहीं मिलेगा. पोथियों या गूगलबाबा से भी नहीं मिलेगा. तो आप पढ़ेंगे ज़रा संभलकर और होशपूर्वक. लिंक संभाल कर रखेंगे. कभी फिर पढ़ सकेंगे और जिज्ञासुओं को भी पढ़ा सकेंगे.
उठने वाले सवालों के जबाब चाहिए या जीते जी मृत्यु का दर्शन- अनुभव चाहिए तो व्हाट्सप्प 9997741245 पर संपर्क कर लेंगे. इस लेख के बाद आने वाले समय में मैं मृत्यु का अपना ख़ुद का अनुभव भी इस अखबार में आपके लिए प्रस्तुत करूंगा.

~ डॉ. विकास मानव

डायरेक्टर : चेतना विकास मिशन

 मृत्यु क्या है ? साधारण तौर पर यदि कहें तो 'मृत्यु जीवन के सभी लक्षणों की समाप्ति है।' जब चिकित्सा-विज्ञान की इतनी प्रगति नहीं हुई थी तब मृत्यु की घोषणा करना अत्यंत सरल होता था। हृदय की धड़कन बंद हो गयी, साँस रुक गयी और मनुष्य मृत घोषित। लेकिन अब यह संदेहास्पद स्थिति समाप्त हो गयी है। अब चिकित्सा- विज्ञान ने हृदय और फेफड़ों को पुनः सक्रिय करने के यांत्रिक साधनों का अविष्कार कर डाला है। इसलिए अब मृत्यु की घोषणा के लिए चिकित्सा-शास्त्रियों को मस्तिष्क टटोलना पड़ता है।
   जब मस्तिष्क कार्य करना बंद कर देता है तो मनुष्य क्रियाशील नहीं रह जाता है और किसी उद्दीपन के लिए वह कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखलाता है। मस्तिष्क बौद्धिक कार्यो के अलावा स्पर्श, गन्ध, दृष्टि, श्रवण, रस तथा प्रेरक प्रक्रिया के साथ-साथ चेतना तथा श्वसन जैसे जीवन के अनिवार्य कार्यों का भी नियंत्रण करता है। चेतना तथा श्वसन से सम्बंधित भाग् 'मस्तिष्क सेतु' में होते हैं जो मस्तिष्क के पिछले हिस्से में होता है और मस्तिष्क के मुख्य खण्डों को सुषुम्ना से जोड़ता है। चिकित्सा-विज्ञान की हाल की प्रगति से 'गहन देख-रेख-इकाइयां'(इंटेंसिव केयर यूनिट : ICU) बनी हैं और उनकी मदद से ऐसे रोगियों को भी जीवित रखा जा सकता है जिनका मस्तिष्क  क्षतिग्रस्त हो चुका है। उसके ठीक होने की सम्भावना नहीं। यह सम्भव हो पाया है 'रेस्पिरेटर' नामक यंत्र से जो रक्त में पर्याप्त ऑक्सीजन के मिश्रण  का फेफड़ों का कार्य सही ढंग से पूरा करते हैं।
  यद्यपि हृदय और फेफड़ों का कार्य इस तरह हमेशा-हमेशा चलाया जा सकता है। लेकिन ऐसे रोगी के पुनः ठीक होने की सम्भावना नहीं के बराबर होती है जिसका मस्तिष्क मर गया है, उसके लिए ऐसा जीवन एक निष्क्रिय  अस्तित्व बनकर रह जाता है।

डॉक्टर ब्लादिमीर नेगोवस्की के विचार :
मास्को की ‘पुनर्जीवन प्रयोगशाला’ में मनुष्य के पुनर्जीवित होने की घटनाएं प्रायः देखने मिलती हैं। इस प्रयोगशाला के अध्यक्ष डॉक्टर ब्लादिमीर नेगोवस्की पिछले 40 साल से इस तरह के प्रयोग कर रहे हैं कि मरते हुए व्यक्ति को दुबारा जीवित किया जा सके। उनका दावा है कि सामान्य मनुष्य की शरीर-रचना ऐसी है कि उसे 150 वर्ष तक बेरोक-टोक चलना चाहिए।
नेगोवस्की की प्रयोगशाला 1936 में स्थापित हुई थी। प्रयोगशाला में मूल्यवान दवाओं, आधुनिक उपकरणों तथा शल्यक्रिया की आधुनिकतम व्यवस्था है। मरणासन्न व्यक्ति को पुनर्जीवन देने वाले विज्ञान को ( प्राचीन )सोवियत संघ के बाहर भी विश्व भर में अत्यंत विस्मय से देखा जाता है।
जहां भी पुनर्जीवन के शोध-कार्य हो रहे हैं, वहां के चिकित्सक इस प्रयोगशाला में आकर चकित हो उठते हैं। अविघटित सोवियत संघ के कई नगरों में अब तक 200 ऐसे पुनर्जीवन केंद्र खोले जा चुके थे जिनमें प्रशिक्षित डॉक्टर कार्य करते थे। डॉक्टर नेगोवस्की मरणासन्न व्यक्ति की लाक्षणिक मृत्यु तीन घण्टे तक बढ़ाने में सफल हुए थे।
वे मृत्यु को कोई निश्चित पल नहीं मानते थे, बल्कि उनके अनुसार मृत्यु होने की पूरी प्रक्रिया होती है–पूरी स्वाभाविक प्रक्रिया। ‘जीवन समाप्त होने’ और ‘मृत्यु होने’ के बीच की अवधि लाक्षणिक मृत्यु है। इस अवधि में यह पूरी तरह सम्भव है कि मृत्यु को जीवन में बदला जा सके, यानि मरणासन्न व्यक्ति को पुनर्जीवित किया जा सके।
अनेक प्रयोगों से यह सिद्ध हो चुका है कि मृत्यु होने पर शरीर की अनिवार्य क्रियाएं एक साथ नहीं रुकतीं। सबसे पहले ‘प्रमस्तिष्क कांटेक्स’ का कार्य रुकता है जिसके फलस्वरुप चेतना, देखने, सुनने, समझने, बोलने, पहचानने आदि की शक्तियां जाती रहती हैं। फिर ‘मस्तिष्क सेतु’ कार्य करना बंद कर देता है।
उसके बाद श्वास-प्रणाली, फिर हृदय और बाद में दूसरे अंग। उनके अनुसार मृत्यु कोई रहस्यमय चीज नहीं हैं। यह तो अनेक जैविक घटनाओं की तरह ही एक जैविक घटना है जिसे पलटा जा सकता है। मृत्यु से जीवन के और मरणोत्तर अनुभवों के सम्बंध में डॉक्टर नेगोवस्की का कहना है कि ये प्रायः रुग्ण मस्तिष्क की उपज हैं। मृगतृष्णा की तरह छलावा है। उनकी व्याख्या है कि मरते समय चेतना धीरे-धीरे लुप्त होती है। इसी प्रकार पुनर्जीवन के समय मस्तिष्क धीरे-धीरे सचेत होता है।
ये सब धुंधली मायाबी भ्रान्त धारणाएं और कल्पनाएं दिमाग के ठीक से काम न करने के कारण होती हैं। इनका कोई ऐसा आधार नहीं है और ये मृत्यु के समय नहीं, बल्कि मरने और जीवन में वापस लौटने के दौरान होती हैं। कुछ भी हो, डॉक्टर नेगोवस्की के ये प्रयोग चिकित्सा शास्त्र के इतिहास में आश्चर्यजनक उपलब्धि है और मानव जीवन के लिए नई आशाएं जगाने वाले भी।
मेरा जीवन दर्शन तो यह है कि प्रत्येक जीवन को मरना है एक न एक दिन। इसलिए मृत्यु को एक दार्शनिक रूप में लेना चाहिए–उतनी ही स्वाभाविकता से जितनी कि जीवन को लेते हैं। यदि हम मृत्यु से जुड़े भय को त्यागकर उसे एक अनिवार्य प्रक्रिया के रूप में देखें तो जीवन को एक नया अर्थ मिलेगा.

मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है :
विलियम ब्लैक एक महाकवि हुए हैं। वे माइकिल एंजिलो और मोजेज आदि की मृतात्माओं से बातचीत किया करते थे। रात की शान्त, स्तब्ध घड़ियों में, अपने एकान्त विस्तर पर, अकेले जागते हुए शताब्दियों पहले गुजरे व्यक्तियों से उनकी भेंट होती थी। ‘क्लियोपेट्रा’ की मृतात्मा से उनकी बातचीत होती थी और ब्लैक प्रिंस उनके सामने बैठकर फोटो खिंचवाता था।
अर्धरात्रि के समय में प्रसिद्ध महापुरुषों की मृतात्माएँ विलयिम ब्लैक के पास आया करती थीं। कभी-कभी उनकी भेंट बहुत छोटी होती थी। लेकिन अक्सर ब्लैक जितनी देर चाहते, उतनी देर उन्हें अपने साथ रख सकते थे।
हॉलीवुड के फिल्म-जगत् का 90-95 साल पहले का जमाना ‘रुडोल्फ वेलेंटीनो-युग’ कहलाता था। वेलेंटीनो एक महान् कलाकार, साहसी अभिनेता और उत्कट महिला-प्रेमी पुरुष था। 1926 को अचानक उसके जीवन की डोर कट गयी।
उसके प्रशंसक सारे संसार में फैले थे। उन्हीं में से एक था–इंग्लैंड का ‘लेसली फ्लिंट’। फ्लिंट ने वेलेंटीनो की जीवनी पढ़ी और यह जाना कि वेलेंटीनो को मृतात्माओं और पराजगत की विद्याओं में गहरी रुचि थी। फ्लिंट ने ‘प्रेतविद्या’ का अभ्यास शुरू कर दिया और वह शीघ्र ही मृतात्माओं के साथ संपर्क स्थापित करने का एक अच्छा ‘माध्यम’ बन गया।
1946 के आसपास फ्लिंट हॉलीवुड गया। वहां वेलेंटीनो के अनेक पुराने मित्र अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने फ्लिंट से आग्रह किया कि हमारे साथ वेलेंटीनो की मॄतात्मा की बातचीत कराओ।
वेलेंटीनो की मृतात्मा ने फ्लिंट के मुंह से बोलना शुरू किया तो पूरे वातावरण में सन्नाटा छा गया। वह फ्लिंट की अपनी आवाज़ न थी, बल्कि वेलेंटीनो की आवाज़ थी। उस आवाज़ में उस समय भी पहले जैसी मस्ती थी। उसकी एक प्रेमिका ने उससे पूछा–क्या तुम्हें हमारी आखिरी मुलाकात याद है ?
वेलेंटीनो ने तपाक से जवाब दिया–हाँ, हाँ, क्यों नहीं ? हम लोग आखिरी बार न्यूयार्क में मिले थे। मैं उस शाम तुम्हारा शो देखने गया था और उसके बाद हम दोनों एक रात्रि-क्लब में गये थे।
एक अन्य अभिनेत्री के साथ बातचीत में वेलेंटीनो ने उसे हॉलीवुड के समुद्र तट की उस पार्टी का स्मरण दिलाया जिसमें वे दोनों शामिल हुए थे और उन्होंने एक बाढ़ पर बैठकर फ़ोटो खिंचवाई थी। यह सुनकर वह अभिनेत्री दंग रह गई।
उसकी आँखों में आँसू छलछला आये। वह फोटो उसने बहुत संभाल कर अपने घर में एक बॉक्स में रख छोड़ी थी एक स्मृतिचिह्न के रूप में। वेलेंटीनो को उसकी याद थी।–यह सोचकर उसका मन भर आया। वह फोटो उसके लिए और भी अधिक महत्वपूर्ण धरोहर बन गयी।
मृतात्माओं के साथ बात करना फ्लिंट का व्यवसाय नहीं था। यह उसका शौक था और वह मरणोत्तर जीवन के रहस्यों को जानना चाहता था। वेलेंटीनो के मित्रों ने उसकी आवाज़ को टेप पर रिकॉर्ड कर लिया था। फ्लिंट के पास दो सौ से अधिक प्रसिद्ध व्यक्तियों की मृतात्माओं की आवाज़ें थीं जिनमें प्रसिद्ध नाटक अभिनेता लायोनेल बैरीमोर, प्रख्यात संगीतकार फ्रेडरिक चोपिन और उन्नीसवीं शताब्दी का प्रसिद्ध अंग्रेज साहित्यकार ‘ऑस्कर वाइल्ड’ भी था।
यदि यह मान लें कि मृत्यु से परे जीवन है तो सवाल यह उठता है कि मृत्यु के बाद आत्मा जाती कहाँ है ? वह कहाँ रहती है, क्या करती है ? प्रेतलोक कैसा है ?
यह कहना तो सम्भव नहीं है कि प्रेतलोक कहाँ है और वहां मरने के सिवाय किस तरीके से, किस रास्ते से, किस सवारी से जाया जा सकता है ? लेकिन प्रेतलोक कैसा है और वहाँ मृतात्माएँ क्या करती हैं ?-
-यह जानकारी फ्लिंट के साथ सम्पर्क स्थापित करने वाली आत्माओं ने अवश्य कराई है।

_*मोक्ष से पूर्व तक के जीवन की यात्रा का एक पड़ाव :*_
  नौ फरबरी 1957 को बड़े तड़के अपने घर के उस अँधेरे कमरे में फ्लिंट बैठा था जिसमें वह मृतात्माओं का आवाहन करता था और जहाँ आत्मायें स्वयम् भी उसके पास पहुँच जाती थीं। उस समय ब्रिटिश सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी 'सिडनी वुड्स' और उसकी एक अन्य मित्र 'श्रीमती बैटवें ग्रीन' भी साथ में थी। अचानक फ्लिंट के मुंह से कोई अपरिचित स्वर फूटा--हेलो.. आप लोगों के साथ बात करने का यह मेरा पहला मौका है। मेरा नाम 'लायोनेल बैरीमोर' है।
    बैरीमोर की मृत्यु नवम्बर 1954 में 76 वर्ष की आयु में हुई थी। उसने बोलना शुरू किया--जब मैं यहाँ (प्रेतलोक में) आया तो मुझे स्मरण हुआ कि मेरी चेतना एक तरह के बाग में लौटी थी। वह बाग़ वैसा ही था जिसका मुझे युवावस्था में बड़ा शौक था। आंख खोलते ही मैंने अपने माता-पिता को अपने पास पाया। मेरी माँ अपनी युवावस्था की तरह बड़ी सुन्दर दिख रही थीं।
    उसके बाद मुझे अपने पूर्व परिचित लोग मिले। मैं भी यहाँ अपनी युवावस्था में लौट आया हूँ। वहां तो मैं बूढ़ा हो गया था। वहां मेरा एक पांव ख़राब हो गया था, यहाँ पर ठीक है। मेरा प्रिय कुत्ता भी यहाँ मेरे पास है। यहाँ पर मेरा भाई जॉन भी मेरे साथ है। बचपन में हम वहां बहुत लड़ते थे, यहाँ नहीं लड़ते। यहाँ कोई लड़ता ही नहीं है किसी से।
   सिडनी वुड्स ने बैरीमोर से पूछा--वहां तुम समय कैसे बिताते हो ?
    उत्तर मिला--थियेटर में,  मेरी रुचि ज्यों-की-त्यों कायम है। यहाँ हम लोग मनोरंजन करते हैं, लेकिन यह मनोरंजन धरती की तरह का नहीं है। यहाँ प्रत्येक नाटक के पीछे कोई न कोई प्रयोजन होता है। यहाँ हमारे पास 'शेक्सपियर' के सभी नाटक हैं, नए नाटक भी हैं शेक्सपीयर के जो उन्होंने यहाँ आने के बाद लिखे हैं और धरती के नाटकों से कहीं अधिक महान् नाटक हैं।
   यहाँ मैं 'जीग फील्ड' तथा अन्य नाटककारों से मिला हूँ। शेक्सपीयर भी यहीं हैं। अब भी वे लिखते हैं। नाटक निर्माता, अभिनेता, अनेक महान् संगीतकार भी हैं। यहाँ का संगीत धरती के संगीत से बहुत भिन्न प्रकार का है।
    बैरीमोर द्वारा दी गयी जानकारी 29 सितंबर 1959 को महान् संगीतकार 'चोपिन' की आत्मा के साथ हुई बातचीत से प्रमाणित हुई। चोपिन एक कुशल पियानो वादक भी था। उसकी मृत्यु 110 वर्ष पहले अक्टूबर 1849 में हुई थी। वह इस समय भी यहीं (प्रेतलोक में)  विद्यमान है।
    चोपिन ने कहा--मैं बहुत बीमार था।बिस्तर से लग गया था। धीरे-धीरे सब कुछ दूर होता चला गया..और भी दूर..मानो मैं हर चीज से दूर हटता जा रहा हूँ। कुछ भी यथार्थ नहीं लग रहा था। तभी मुझे रौशनी दिखाई दी--पहले तो दिए की पतली लौ जैसी फिर बाद में बहुत उजली। साथ में संगीत की स्वर-लहरी भी बज उठी। ऐसा संगीत मैंने उससे पहले कभी नहीं सुना था।
   बहुत शानदार संगीत था वह। थोड़ी देर में मुझे लगा कि मैं एक बड़ी इमारत में आ गया हूँ जहाँ लोग ही लोग हैं तथा चारोँ ओर तेज रंगों की चमक है। इन लोगों में से बहुतों को तो मैं जानता था। कई एक तो मेरी जवानी के घनिष्ठ मित्र थे। मैं लोगों के बीच चलता रहा था--मानो मुझे मालूम हो कि मुझे कहाँ जाना है। मैं एक विशाल शानदार भवन में जा पहुंचा जिसके एक बड़े कमरे में  एक विराट व्यक्तित्व का व्यक्ति ऊँचे मंच पर बैठा था। मुझे देखकर वह मंच से उठा और मेरा स्वागत करने के लिए मेरी ओर बढ़ा। उसने मुझसे कहा--तुम्हारा यहाँ पर स्वागत है।
   तुम इस विशाल भवन के आंगन में बने एक घर में रहोगे तथा अपना अध्ययन और संगीत-रचना का काम जारी रखोगे। यहाँ का संगीत बहुत भिन्न प्रकार का है। ऐसे वाद्य-यंत्र हैं यहाँ जैसे धरती पर नहीं होते और हम लोग उच्चस्तरों पर वाद्य यंत्रों के बिना ही संगीत उत्पन्न कर सकते हैं।
   प्रेतलोक का यह वर्णन उस समय और भी पुष्ट हुआ जब 20 अगस्त 1962 को फ्लिंट के माध्यम से ऑस्कर वाइल्ड की आत्मा ने बोलना शुरू किया--मेरा नाम ऑस्कर वाइल्ड है और यहाँ आने में मुझे बहुत ख़ुशी हुई है। मैं यहाँ बहुत प्रसन्न और संतुष्ट हूँ।
  मैं बहुत सुहाना जीवन जी रहा हूँ। धरती पर प्राकृतिक जीवन बहुत पापमय है, मगर यहाँ ऐसा नहीं है।
   ऑस्कर वाइल्ड की मृत्यु 1900 में हुई थी। ऑस्कर वाइल्ड का प्रेत व्यंगपूर्ण हंसी हंसा फिर बोला--लेकिन मैं गंभीरतापूर्वक लिखता हूँ और मेरे नाटक यहाँ खेले भी जाते हैं। हमारा यह जगत् कुछ धरती जैसा ही है। हाँ, सुन्दरता में यह धरती से कहीं आगे है। यहाँ धरती जैसी बुराइयाँ नहीं हैं। यहाँ के लोग तो वहीँ के हैं और मैं मजे में उनके बीच में रहता हूँ। यहाँ का मेरा घर बहुत सुंदर है--मेरा मनपसंद घर। यह घर मैंने अपनी पसंद का स्वयम् ही बनाया है।
  अनजाने में ही, यहाँ आने से भी पहले, अपनी कल्पना में।(प्रेतलोक या सूक्ष्मलोक में इच्छा एक 'तत्व' है। जो भी इच्छा या कामना की जाती है वह तत्काल यहाँ पूर्ण हो जाती है।)
    _फ्लिंट की इन अनुभूतियों को सही मान लें और टेप पर भरी मृतात्माओं की आवाज़ पर विश्वास कर लें तो यह भी मानना होगा कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है, बल्कि मृत्यु जीवन की अनन्त यात्रा का एक पड़ाव है।_

क्या उपनिषद सच्चे हैं ?
क्या मृत्यु वस्त्र बदलने की तरह देह बदलना मात्र है ? क्या आत्मा वह परम चेतन तत्व है जिसे ऋषियों ने, योगियों ने स्थानातीत और कालातीत बताया है ?_
आत्मा त्रिकालगामी अर्थात् भूत, भविष्य और वर्तमान में अबाध गति से विचरण करने वाली है। उसे स्थान की कोई बाधा नहीं व्यापती। वह कभी भी कहीं भी पहुँच सकती है। और सच तो यह है कि वह न चलती है, न पहुंचती है। वह तो है, सर्वत्र व्याप्त है, सब कहीं है– परमात्मा की तरह।
प्राचीन भारतीय ऋषियों (वैज्ञानिकों) ने तो यही कहा था मगर पश्चिम के नवोदित विज्ञान के ज्वार में डुबकी लगाने वाले भारतीयों ने इसका मज़ाक उड़ाया और कहा कि यह तो अन्धविश्वास है। मगर, शायद अब वक्त आ गया है कि वे इस सच्चाई को कुबूल करेंगे, क्योंकि पाश्चात्य जगत् के मुख्य वैज्ञानिक इसे स्वीकार कर रहे हैं।
सम्भवतया ‘गेटे’ आधुनिक युग का पहला वैज्ञानिक है जिसने इस समय ब्रह्माण्ड को यथार्थ कहा है। उसके दर्शन के आधार पर ‘रुडोल्फ स्टीनर’ ने यह सिद्ध किया कि ब्रह्माण्ड जड़ तत्व नहीं, एक सजीव अस्तित्व है–संपूर्णतया आध्यात्मिक अर्थात् आत्मा से सम्पन्न।
विकासवाद के जन्मदाता ‘डारविन’ के मित्र ‘हक्सले’ ने अपनी पुस्तक ‘Heaven and Hell’ में लिखा है कि यह एक अद्भुत तथ्य है कि ब्रह्माण्ड का शाश्वत तत्व उसके कण-कण में विद्यमान है। हक्सले आत्मा के आवागमन अर्थात् मरणोत्तर जीवन में विश्वास करते थे। उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धान्त को सत्य पर आधारित बताया है।
ग्रामोफोन और बिजली के बल्ब के आविष्कर्ता ‘थॉमस ऐल्वा एडिसन’ ने इस विषय में कुछ महत्वपूर्ण आवश्यक वैज्ञानिक तथ्यों का रहस्य खोलकर रखा है। वह कहते हैं कि जीवन की प्रत्येक इकाई ( प्राणी या जीव ) उन खरबों विद्युत् कणो के झुण्डों से बनी है जो जीवों के कोशों में निवास करती है। मेरा विश्वास है कि मनुष्य की मृत्यु होने पर यह झुण्ड शरीर को छोड़कर शून्य में चला जाता है।
किन्तु वह वहां जीवित रहता है और समय पाकर पुनः नए जीवन- चक्र में प्रवेश कर् जाता है। यह झुण्ड अमर है। मैं पल भर को भी यह मानने के लिए तैयार नहीं हूँ कि एक जीवन दूसरे जीवन को जन्म देता है।
हमारे शरीर को ही लीजिए, मुझे विश्वास है कि प्रत्येक शरीर असंख्य और अनंत परम सूक्ष्म जीवाणुओं से निर्मित तथा उनमें से प्रत्येक ही इकाई है। ये इकाइयां समूहों और झुण्डों के रूप में कार्य करती हैं और ये अमर और सूक्ष्म हैं। जब हम मरते हैं तो ये इकाई-झुण्ड मधुमखियों की तरह कहीं और चले जाते हैं तथा किसी अन्य रूप, आकार और वातावरण में सक्रिय जीवन व्यतीत करते रहते हैं।
प्रसिद्ध विज्ञानी ‘रॉबर्ट मायर’ ने जब ऊर्जा के अविनाशी होने की खोज की, उससे पहले आत्मा के अविनाशी स्वरुप का बोध प्राप्त किया जा चुका था। वेदों में आत्मा को ‘अमृतस्य वै पुत्रा:’ कहा गया है।

काल अथवा समय चतुर्थ आयाम :
जिस प्रकार पदार्थ अविनाशी है, उसी प्रकार मानसिक और परामानसिक अर्थात् चेतन और अतिचेतन तत्व भी अविनाशी है। यह तत्व ही ‘आत्मा’ है। मनोविज्ञान के प्रणेता ‘कार्ल जुंग’ (1857-1961) ने इस विषय पर गहन शोध किया था। वे लिखते हैं–मनुष्य के लिए मूलभूत निर्णायक प्रश्न यह है कि वह किसी ‘परातत्व’ से सम्बंधित है या नहीं ?
कोर्ल जुंग मनुष्य के ‘उपचेतन’ को सार्वभौमिक मानते थे। उनके अनुसार यह उपचेतन ही पराबोध ग्रहण करता है और यह काल तथा स्थान की मर्यादाओं में नहीं बंधता। मृत्यु के बाद के जीवन का कोई भौतिक प्रमाण नहीं दिया जा सकता, लेकिन हमारे अनुभव यह सिद्ध करते हैं कि ‘वह एक सत्य है’।
आधुनिक मनोवैज्ञानिक डॉक्टर जे. बी. राइन ने सिद्ध किया है कि मनुष्य का मन एक पराभौतिक और परा-जागतिक यथार्थ है। वह शरीर के साथ नहीं मरता। वह कभी नहीं मरता। यह इस बात का संकेत है कि मृत्यु के बाद भी सूक्ष्म अथवा पराचेतन अस्तित्व बना रहता है। वह सम्भवतया विद्युतीय या चुम्बकीय स्तर पर जीवित रहता है और उसमें यह सामर्थ्य रहती है कि वह समय पड़ने पर अपनी शक्तियों का प्रयोग कर सके तथा भौतिक आकार भी ग्रहण कर सके।
वेदान्त पदार्थ और आत्मा में कोई भेद नहीं मानता। दोनों एक ही हैं–एक सूक्ष्म तथा जागृत और दूसरा स्थूल तथा सुषुप्त। शरीर छूट जाने से मनुष्य का कुछ भी नहीं बिगड़ता। क्योंकि ‘जीवन का मूल’ चेतन, उपचेतन और अतिचेतन अवस्थाओं में एक ही रहता है।
Experiment with Time (समय के साथ प्रयोग) के लेखक ‘डब्ल्यू एच उन’ कहते हैं–काल अथवा समय ‘चथुर्थ आयाम’ है जिसमें हम तैर रहे हैं और हमारी चेतना उसके एक छोटे-से अंश पर केंद्रित है जिसे हम कहते हैं–‘वर्तमान’। लेकिन जब हमारा चेतन मन तनाव से मुक्त रहता है, जैसे नींद में तो हम इस काल या आयाम में दोनों ओर आगे-पीछे यानि भूत और भविष्य–दोनों आयामों में देख सकते हैं।
धर्म कहता है :
1- जिस आत्मा की आसक्ति जगत् में नहीं रही है, भोगों में भी नहीं रही है, वह मोक्ष प्राप्त करती है। जन्म-मरण के बंधन से छूट जाती है।
2- दूसरी कोटि की आत्मा पुण्यवती होती है जो किसी कामना (वासना) के कारण पुण्य करती है, वह स्वर्ग में जाती है और पुण्य क्षीण हो जाने पर पुनः धरती के भोगों के प्रति असक्त हो जाती है। 3- तीसरी कोटि की आत्मा घोर असक्त आत्मा होती है जिसका मन धरती पर ही रहता है। वह धरती के लिए तरसती और भटकती है तथा धरती पर लौट आती है।
पुनर्जन्म अपने आप में आत्मा की अमरता का प्रमाण है। पुनर्जन्म एक प्रकार से मरणोत्तर जीवन ही है। संवेदनशील आत्माओं के साथ गया ‘सूक्ष्म मन’ अपने उपचेतन में पिछले जन्मों की स्मृतियां लेकर लौटता है जिन्हें ‘सम्मोहन’ द्वारा जगाया जा सकता है। कई लोगों में वे अपने आप जाग जाती हैं। पिछले जन्म की घटनाओं का स्मरण इस बात का प्रमाण है कि ‘आत्मा त्रिकालदर्शी है’। वह अतीत से भविष्य तक सब कुछ देख सकती है।
इसी कारण शायद कुछ लोग सही- सही भविष्यवाणी करते हैं। भविष्यवाणी की बात छोड़ दें क्योंकि उसकी प्रामाणिकता आगे जाकर सिद्ध होगी।
कुछ ऐसी घटनाओं का अध्ययन करें जिनमें हमारे बीच रह रहे लोगों ने अतीत के जीवन को इसी जीवन में देखा है और उसका वर्णन किया है तथा जो जाँच करने पर सही भी निकला है।

 _*अंतश्चेतना शाश्वत है :*_
    उत्तरी इंग्लैंड की एक नौ साल की लड़की 'जोआन' अपने माता-पिता के साथ लन्दन देखने गयी। जोआन पढ़ने में कमज़ोर थी और खास तौर से इतिहास के मामले में। टॉवर ग्रीन के पास पहुंची तो उसने कहा---यहाँ आठवें हेनरी की पत्नी साम्राज्ञी 'एन बोलेन' की हत्या फरसे से गर्दन काट कर की गयी थी। तो जोआन की माँ ने पूछा--तुझे यह सब कैसे पता?
      जोआन ने सहज भाव से उत्तर दिया--मैं वहीँ थोड़ी दूरी पर थी। वह सब मैंने अपनी आँखों से देखा था। माँ, हुआ यह था कि जल्लाद को एन पर दया आ गयी, उसे लगा कि यदि सामने से फरसा चला जाऊंगा तो एन को बहुत छटपटाहट होगी, इसलिए वह जूते उतार कर रेंगता हुआ एन के पीछे चला गया तथा वहां से उसने उसकी गर्दन फरसे से एक बार में उड़ा दी।
   दूसरी घटना भारत की है। 30 जुलाई, 1955 को चार वर्ष के रवि से किसी ने पूछा--तुम्हारे गले पर यह लंबा-सा घाव का निशान कैसा है ?
    रवि ने बहुत सहजता से जवाब दिया--पिछले जन्म में मेरा गला काट दिया गया था। मेरा नाम मुन्ना प्रसाद था और लोग मुझे मुन्ना-मुन्ना कहकर पुकारते थे। मेरे पिता जागेश्वर प्रसाद नाई थे और कन्नौज में रहते थे। एक दिन चिंतामणि मंदिर के पास मैं खड़ा-खड़ा अमरुद खा रहा था। मेरे एक रिश्तेदार चतुरी और उसके साथी जवाहर धोबी ने मिलकर मुझे पकड़ा, मेरी गर्दन काट दी और वहीँ पड़े रेत के ढेर में मुझे दबा दिया। 
   जाँच करने पर ये सब बातें सच निकलीं। चतुरी ने अदालत में अपना अपराध स्वीकार करते हुए घटना ठीक इसी तरह बताई थी। रवि का कन्नौज की गलियों का ज्ञान बिलकुल सही निकला। वह जागेश्वर प्रसाद के पूरे परिवार को अच्छी तरह से पहचानता था।
   तीसरी घटना भी उत्तरी इंग्लैंड की है। 1957 में पोलक परिवार की दो कन्यायें जोअन्ना और जैकलीन चर्च जाते हुए एक सड़क दुर्घटना में मारी गई। थोड़े समय बाद श्रीमती पोलक गर्भवती हुई और उनकी कोख से दो जुड़वां कन्याओं ने जन्म लिया। एक का नाम रखा गया--'जेनिफर' और दूसरी का 'गिलियन'। माँ-बाप ने बच्चियों को देखते ही पहचान लिया। जेनिफर के चेहरे और बाएं कूल्हे के निशान ठीक वैसे थे जैसे कि जैकलीन के चेहरे और कुल्हे पर थे। पर उन्होंने यह बात किसी को बतलाई नहीं। धीरे-धीरे वे स्वयम् भी भूल गए।
  मगर जब दोनों कन्यायें बड़ी हुईं तो एक दिन अचानक वे दोनों आपस में उस दुर्घटना की बातें करने लगीं। माँ ने जब सुना तो वह सन्न रह गयी।
   पुनर्जन्म की इन घटनाओं से महत्वपूर्ण निर्णय निकलते हैं। पहला तो यह कि जीवन-मृत्यु निरपेक्ष है तथा मनुष्य की अंतश्चेतना शाश्वत है। वह काल के व्यविधान को बींध कर पीछे देख सकती है।
   _दूसरा यह कि अंतश्चेतना स्वयम् अपने शरीर की मृत्यु या हत्या तटस्थ होकर एक तीसरे व्यक्ति की तरह देख सकती है। वह अपनी अनंत यात्रा के प्रति पूर्ण सचेत रह सकती है। मृत्यु उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। वह मृत्यु को लाँघ कर् उससे भी परे चली जाती है।_

 _मृत्यु की कल्पना के चारों ओर लिपटे पर्यावरण ने सदियों से मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित किये रखा है--इसमें सन्देह नहीं। वर्तमान समय में इस रहस्यमय  विषय पर काफी खोज-बीन हुई है, काफी शोध-कार्य हुआ है।_
    इन शोध-कार्यों के लिए अमेरिका तथा भारत के प्रमुख वैज्ञानिकों ने अस्पतालों में मरणासन्न रोगियों की शारीरिक, मानसिक स्थितियों के विषय में काफी विस्तार से जानकारियां प्राप्त कीं और फिर कंप्यूटर से उनका विश्लेषण भी किया।
  जन्म और मृत्यु--ये दो अति महत्वपूर्ण घटनाएं हैं मानव जीवन की--यह तो निर्विवाद सत्य है। किन्तु विस्मय की बात यह है कि वे दोनों घटनाएं जब घटतीं हैं, उस समय मनुष्य बेहोशी की स्थिति में होता है। यही एक मात्र कारण है कि मनुष्य को अपने जन्म और अपनी मृत्यु की स्मृति नहीं रहती।
     जन्म के पहले हम कहां थे ? और मृत्यु के बाद हम कहाँ जाएंगे ? 'काल विद्या' जो भारत की सबसे प्राचीन और रहस्यमयी विद्या समझी जाती है, इन दोनों प्रश्नों का समुचित और सप्रमाण उत्तर देने का प्रयास करती  है। इस महान् विद्या का कहना है कि 'मृत्यु अन्त नहीं है। उसे जीवन का अन्त नहीं समझ लेना चाहिए। 'मृत्यु' को एक 'गहन विश्राम' मानना चाहिए। मृत्यु एक गहन विश्राम के सिवाय और कुछ नहीं है।
   जैसे दिनभर हम परिश्रम करते हैं और रात में सो जाते हैं। भारतीय प्रज्ञा शुरू से यह मानती रही है कि नींद भी एक अल्पकालीन मृत्यु ही है। हम दिनभर जागते हैं, श्रम करते हैं और रात में सो जाते हैं। जो व्यक्ति सो न सके या उसे सोने का मौका न मिले तो वह व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता। अगर मरा नहीं तो पागल तो अवश्य हो जायेगा। इसलिए हर रात मरना आवश्यक है ताकि प्रातःकाल एक नया जीवन मिल सके।
    इसीलिये रात में जो जितनी गहराई से मरता है, वह दूसरे दिन उतनी ही गहराई से जागेगा। रात में हमारी नींद 'मृत्यु' के जितने निकट पहुंचेगी, प्रातःकाल हमारा जीवन उतना ही जीवन के समीप पहुँच जायेगा। यदि रात में हम अधूरे सोये हैं तो सबेरे हम अधूरे ही उठेंगे। सबेरे हमारा उठना मरा-मरा-सा होगा। पूरा दिन हमारा झल्लाहट से भरा होगा। सच बात तो यह है कि रात में जो मरने की कला सीख नहीं सका, वह दिन में जीने की कला भी नहीं सीख सकेगा।  
      दिन हमारे लिए जन्म है और रात है हमारी मृत्यु।
_मृत्यु अनिवार्य है जीवन के साथ। मृत्यु विश्राम है, जीवन थकान है, तनाव है, श्रम है। मृत्यु विराम है। मृत्यु का अर्थ है--फिर से जीवन-शक्तियों का संचय। नई यात्रा के लिए नई शक्ति और नई ऊर्जा को पा लेना।_

  _जिस नयी जीवनी शक्ति और ऊर्जा को हम 'मृत्यु की अवस्था' में प्रप्त करते हैं, उसे योगिगण समाधि की अवस्था में पाते हैं। समाधि में वैसी ही स्थिति होती है। समाधि में प्रवेश करने का मतलब है-- मृत्यु में प्रवेश  करना। समाधि से लौटने का मतलब जीवन में लौटना। समाधि के अनुभवों को प्राप्त योगिगण ही ठीक-ठीक बतला सकते हैं कि 'मृत्यु' क्या है ?_
      मृत्यु और उसके बाद का अनुभव क्या है ? और यह भी बतला सकते हैं कि समाधि या मृत्यु के समय आत्मा किन्-किन् अनुभवों से गुजरती है ?
  पराविज्ञान के अनुसार परलोक से कोई वापस नहीं लौटता और मृत्यु के बाद पुनः उसी शरीर में आत्मा वापस नहीं आती। यदि कहीं परलोक है तो उसका अनुभव एक परम योगी ही बतला सकता है, सामान्य लोगों के लिए परलोक का अनुभव केवल कल्पना के ही आधार पर सामने आता है। लेकिन ऐसे भी बहुत सारे उदाहरण हमारे सामने हैं जिनमें क्षणिक मृत्यु की अवस्था में मनुष्य को परलोक के विलक्षण अनुभव हुए हैं।
     यह तो निश्चित है कि किसी भी कारण से पार्थिव शरीर छोड़ कर आत्मा का परलोक जाना और फिर उसी पार्थिव शरीर में वापस लौट आना और साथ ही परलोक के विलक्षण अनुभवों से सम्पन्न होना अविश्वसनीय लगता है।
   _मैंने 'काल विद्या' पर अन्वेषण किया है और यह निष्कर्ष निकाला है कि मृत्यु के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी न होने के कारण वह भयानक लगती है।_
   मनुष्य पूर्ण चेतन प्राणी है। इसलिए उसका एक स्थिति में ही बने रहना सम्भव नहीं है। प्रकृति के सभी रूपों में परिवर्तन होता रहता है तो जीवन-यात्रा में भी गतिशीलता क्यों नहीं रहेगी ? यात्रा-क्रम में इन पड़ावों को ही 'जन्म' और 'मृत्यु' कहते हैं। इसमें न तो कोई अप्रत्याशित है और न तो है कुछ आश्चर्यजनक ही। फिर मृत्यु में भय किस बात का ?
  वास्तव में मृत्यु के सम्बन्ध में लोग विचार ही नहीं करते। उसकी संभावनाओं और तैयारियों के संदर्भ में उपेक्षा बरतते हैं। फलस्वरूप समय आने पर मृत्यु एक अज्ञात रहस्य के रूप में सामने आती है जो भयानक और कष्टदायी   होती है।
    अज्ञात की ओर बढ़ने और विचार करने पर ही महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं। इतिहास उन व्यक्तियों और महापुरुषों से भरा है जिन्होंने जन-प्रवाह के विपरीत अज्ञात की दिशा में बढ़ने का साहस भरा कदम उठाया है, एक पुरुषार्थ दिखाया है।
  _मृत्यु के बाद के जीवन के अस्तित्व को अपनी योग-साधनाओं द्वारा देखकर आत्मा के अजर-अमर होने की घोषणा की है जिसकी पुष्टि परामनोविज्ञान अपने शोधों के द्वारा आज कर रहा है।_

 _जीवन अत्यन्त साधारण है पर मनुष्य तो विशिष्ट है। हरेक व्यक्ति को एक-न-एक दिन मरना है। यदि जन्म सत्य है तो मृत्यु भले ही सत्य न हो, फिर भी कम महत्वपूर्ण तो नहीं है। इसलिए मृत्यु को हमें दार्शनिक रूप में स्वीकार करना चाहिए, उतनी ही स्वाभाविकता से स्वीकार करना चाहिए, जितना कि हम जीवन को स्वीकार करते हैं।_
   यदि हम मृत्यु से जुड़े भय का त्याग कर दें और उसे एक अनिवार्य स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में देख लें तो जीवन एक नया सत्य हमारे सामने प्रकट कर देगा।
  मृत्यु को दो प्रकारों में विभक्त किया जा सकता है। पहले प्रकार की वह है जो स्वाभाविक या प्राकृतिक होती है। इस प्रकार की मृत्यु का एहसास अचानक होता है। स्पष्ट है तब वह एहसास निश्चय ही एक भयंकर त्रास के रूप में सामने आता होगा। यद्यपि ऐसा होना आवश्यक नहीं है क्योंकि मृत्यु को हरेक व्यक्ति अपनी-अपनी मानसिकता के अनुरूप लेता है।
   दिल का दौरा पड़ने पर, किसी भयंकर दुर्घटना का शिकार हो जाने पर मर जाना कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन जो स्वाभाविक या प्राकृतिक मृत्यु है, वह अपने- आप में एक बहुत बड़ा रहस्य है।
  मृत्यु की क्रम से पांच अवस्थाएं हैं। रोगी को एक-के-बाद-एक करके  मृत्यु की उन पांचों अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। गम्भीर और प्राणघातक बीमारी की बात सुनकर  सर्वप्रथम रोगी को एक झटका-सा लगता है, मगर वह मन से इस बात को स्वीकार नहीं कर पाता कि वह इस भयानक बीमारी में मर ही जायेगा। वह अस्पतालों और डॉक्टरों के चक्कर काटने लगता है।
   पर वह पूर्णतया निराश नहीं होता। वह इस आशा से अपना इलाज कराता है कि उसकी हालत गम्भीर नहीं है। निश्चय ही वह मरने से बच जायेगा। मृत्यु की यह पहली अवस्था है।
   धीरे-धीरे वह दूसरी अवस्था में पहुँचता है, जब वह अपनी बीमारी को गम्भीरता से स्वीकार करता है। मगर उसकी यह स्वीकारोक्ति उसके भीतर क्रोध को जन्म दे देती है। वह क्रोधी और चिड़चिड़ा हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह जीवनी शक्ति, ऊर्जा और गति के प्रति विरोध प्रकट करने लग जाता है।
   वह सोचता है कि 'मैं ही क्यों ?' और इसी के साथ वह ईश्वर् के प्रति रोष भी व्यक्त करता कि वह उसकी  सुन क्यों नहीं रहा है ?
  फिर वह तीसरी अवस्था में आता है, जब वह समझ जाता है कि उसके जीवन का अन्त अब निकट है। अब वह ईश्वर् के प्रति रोष व्यक्त नहीं करता। वह अब ईश्वर् से प्रार्थना करता है--'हे परमात्मा ! है परमेश्वर ! थोड़ा-सा जीवन और दे दो ताकि मैं अपने अधूरे कार्यों को पूरा कर लूं।' यद्यपि इस अवस्था में वह मानसिक रूप से शान्त तो नहीं होता पर भावनात्मक रूप से अवश्य ठीक और सहज होता है।
   चौथी अवस्था में रोगी चिन्ता-मग्न हो जाता है। वह अब निश्चित रूप से यह स्वीकार कर लेता है कि उसकी मृत्यु अब निकट है और पूर्णरूप से निश्चित है। यही सोच कर वह अधिक-से -अधिक मौन रहने लग जाता है। वह बाहर से तो अवश्य मौन दिखलाई पड़ता है, मगर भीतर सबसे बिछुडने, सबका साथ छूट जाने और सब कुछ छूट जाने की गहरी पीड़ा का अनुभव करता है।
    ऐसी स्थिति में वह केवल यही चाहता है कि उसके अन्तरंग और निकट के रिश्तेदार उसके समीप रहें। जिसे वह सबसे अधिक चाहता है, उसी को वह अपने समीप अधिक- से-अधिक देखना चाहता है।
  और फिर पांचवीं और अन्तिम अवस्था होती है जब वह संसार से हमेशा-हमेशा के लिए विदा हो जाता है।
   मृत्यु क्या शरीर का अन्त है या है अन्त जीवन का ? क्या शरीर के साथ-साथ जीवन का भी अन्त हो जाता है ? अगर यह सत्य है कि शरीर के साथ ही जीवन का भी अन्त हो जाता है तो अन्य लोक-लोकान्तरों की बात क्या कोरी कल्पना है ? यदि यह मान भी लिया जाय कि कोरी कल्पना ही है तो उन अनुभवों की क्या व्याख्या की जायेगी जिनके बीच से एक मरणासन्न व्यक्ति गुजरता है ?
    क्या मृत्यु के समय अथवा मृत्यु के बाद के तमाम अनुभव भी कल्पना मात्र समझे जायेंगे और समझे जायेंगे मात्र एक दुस्स्वप्न ?
  वैज्ञानिकों का कहना है कि श्वास-प्रश्वास के शिथिल होते ही जब हृदय खून के दौरे को रोक देता है, अर्थात् हृदय से जब खून के प्रवाह की गति बन्द हो जाती है तो उसके परिणामस्वरूप मस्तिष्क को मिलने वाला रक्त स्वतः ही बन्द हो जाता है। रक्त के अभाव में मस्तिष्क की कोशिकाएं नष्ट होने लग जाती हैं।
    मस्तिष्क के इस विनाश में अधिक-से-अधिक 10 से 15 मिनट का समय लगता है और तभी यह मान लिया जाता है कि व्यक्ति की मृत्यु हो गयी है। विनाश की इस दिशा को उलटा नहीं जा सकता। मस्तिष्क की कोशिकाओं को पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता। हृदय की बन्द धड़कन को पुनः चालू नहीं किया जा सकता।
  चिकित्सा-शास्त्र से संबद्ध जितनी भी शैक्षणिक संस्थाएं हैं, वे लम्बे समय से यही तथ्य बतलाती चली आ रही हैं। क्या ये तथ्य इतने मजबूत हैं कि उन पर संदेह नहीं किया जा सके ? हर हालत में विश्वास ही किया जा सके ?
  मगर सबसे आश्चर्य की बात यह है कि मरणासन्न अवस्था प्राप्त व्यक्ति के जो अपने अनुभव हैं, वे इस ठोस तथ्य का प्रबल विरोध करते दिखायी देते हैं। मरणासन्न व्यक्ति क्या देखता है, क्या सुनता है  और क्या अनुभव करता है ?--उन सबके आधार पर क्या हम मृत्यु के साथ ही जीवन के अन्त को स्वीकार कर सकते हैं ?
   _हम यह सोचने-समझने की कोशिश नहीं करते कि मृत्यु तो जीवन-यात्रा का एक पड़ाव मात्र है, एक मोड़ मात्र है आत्मा के एक नए लोक और एक नए जगत् में प्रवेश करने की प्राकृतिक स्थिति मात्र है._

  _*मरणासन्न व्यक्ति जिन अनुभवों से गुजरता है और जो कुछ देखता-सुनता है, वे क्यों होते है ?*_
     कुछ समय पहले तक डॉक्टरों अथवा वैज्ञानिकों के पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था, कोई समाधान नहीं था। उनके पास इस बात का भी कोई जवाब नहीं था कि मृत्यु की अवस्था में व्यक्ति दिवंगत लोगों से साक्षात्कार करने, सुन्दर दृश्यों को देखने और मधुर कर्णप्रिय स्वरों को सुनने के बाद भयंकर-से- भयंकर यातना सहते हुए भी कैसी बड़ी शान्ति से और कैसे सहज भाव से मृत्यु का वरण कर लेता है। कहने की आवश्यकता नहीं--वैज्ञानिक इस दिशा में मौन साधे नहीं बैठे रहे।
   पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में पर्याप्त खोज और शोध-कार्य हुआ है और बराबर हो भी रहा है। उन खोजों और शोधों से निकले अब तक के निष्कर्षों ने अब तक चली आ रही मृत्यु सम्बन्धी मान्यताओं पर एक जबरदस्त प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
    सन् 1975 में प्रकाशित होने वाली इलीजावेथ क्यूवलर रॉस लिखित पुस्तक 'Death The Final Stage of Growth' और आर. डी. मूडी लिखित पुस्तक 'Life After Life' ने चिकित्सा के क्षेत्र में हलचल मचा दी। इन दोनों पुस्तकों का मूल विषय था--जीवन के बाद का जीवन और मृत्यु के बाद जीवन समाप्त नहीं हो जाता। 
   इस वैज्ञानिक युग में इस सिद्धान्त का प्रतिपादन करना और साथ ही वैज्ञानिक खोज के आधार पर प्रतिपादन करना वास्तव में एक क्रन्तिकारी कदम ही समझा जायेगा। विशेषकर पश्चिम के देशों में जहाँ आत्माओं और भूत-प्रेतों की चर्चा करना सदैव अन्धविश्वास समझा जाता रहा है, पाश्चात्य प्रभावों और आधुनिक शिक्षा के कारण हमारे देश में भी यही स्थिति धीरे-धीरे उत्पन्न होती जा रही है।
  सन् 1975 के बाद सन् 1977 में दो अमेरिकी डॉक्टरों ने जिनके नाम कार्लिस आसिस और अर्लेंडर हाराल्डसन थे, अपनी एक शोध-पुस्तक प्रकाशित की जिसका नाम था--'The Power of Death'. यह पुस्तक पूरे दो दशकों की खोज और शोध का परिणाम है।
     उन दोनों डॉक्टरों ने अपनी खोज और शोध के सिलसिले में सैकड़ों, हज़ारों मरणासन्न लोगों के अनुभव एकत्र किए। उन मरणासन्न लोगों के मृत्युपूर्व या मृत्यु सम्बन्धी अनुभवों के आधार पर अपने निष्कर्ष इस पुस्तक में लिपिबद्ध किये। कहने की आवश्यकता नहीं, इस पुस्तक ने भी मृत्यु के बाद के जीवन को एक ज्वलन्त प्रश्न बना दिया है।
  मैंने अपने गवेषणा काल में जैसे मृत्यु को अस्वाभाविक और स्वाभाविक--ये दो रूप दिए, उसी प्रकार उसको मुख्य रूप से तीन अवस्थाओं में भी विभक्त किया है। ये तीनों अवस्थाएं पूरे पांच घंटों में गुजर जाती हैं। मृत्यु के पूर्व के दो घंटों का समय मृत्यु की पहली अवस्था है और यह पहली अवस्था शारीरिक और मानसिक यन्त्रणा की अवस्था समझी जाती है।
   इस अवस्था में मरणासन्न व्यक्ति के सारे शरीर में एक विशेष् प्रकार की सनसनाहट होती है। अंग-अंग में ऐंठन-सी होने लगती है। धीरे-धीरे क्रम से उन अंगों पर से मस्तिष्क का नियंत्रण समाप्त होने लग जाता है।
 _अन्त में सारा शरीर शिथिल हो जाता है। मरणासन्न व्यक्ति अपने अंग-सञ्चालन की क्रिया में अपने आप को पूर्णरूप से असमर्थ पाता है और इस दिशा में अपने को दीन-हीन समझने लग जाता है।_

 _*चेतना के तीन केंद्र :*_
  मनुष्य की चेतना के तीन केंद्र हैं--नाभि, हृदय और मस्तिष्क। मृत्यु के क्षणों में सबसे पहले नाभि में भयानक पीड़ा होती है। उसके बाद पीड़ा होती है हृदय में जिसके फलस्वरूप साँस कंठ के नीचे नहीं जा पाती, कंठ से खरखराहट और घड़घड़ाहट की आवाज़ें निकलने लगती हैं और साथ ही गला भी सूखने लगता है।
   _दोनों केंद्रों में होने वाली असहनीय पीड़ाओं का प्रभाव मरणासन्न व्यक्ति के चेहरे पर उस समय स्पष्ट रूप से दिखलाई  पड़ने लगता है। फिर एकाएक हृदय की पीड़ा तीव्र गति से बढ़ती है और उसी के साथ श्वास-प्रश्वास की क्रिया हमेशा के लिए रुक जाती है।_
     हृदय धड़कना बन्द हो जाता है, परिणामस्वरूप व्यक्ति की नाड़ी चलनी भी बन्द हो जाती है। श्वास-प्रश्वास और नाड़ी-संचालन की क्रिया रुकने का मतलब है मरणासन्न व्यक्ति के शरीर से वायु तत्व का निकल जाना। फिर धीरे-धीरे पूरा शरीर शीतल होना शुरू हो जाता है जिसका अर्थ है--शरीर से अग्नि तत्व का समाप्त हो जाना।
  अब मरणासन्न व्यक्ति के चेहरे पर उभरी हुई पीड़ा के भाव समाप्त हो जाते हैं और धीरे-धीरे वहां शान्ति छाने लगती है जिसे देखकर यही लगता है कि जैसे कोई बड़ा भयानक तूफान आकर गुजर गया हो आत्मा के ऊपर से। इसे ही हम शरीर की मृत्यु कहते हैं। लेकिन मस्तिष्क इस शरीर की मृत्यु के बाद भी अपना कार्य करता रहता है बराबर। यह मृत्यु की दूसरी अवस्था कहलाती हैं। 
    इस अवस्था में मस्तिष्क की बाह्य चेतना लुप्त अवश्य हो जाती है पर उसकी आतंरिक चेतना बराबर बनी रहती है। किसी-किसी व्यक्ति की यह मरण अवस्था एक से दो घंटे तक बनी रहती है। कहने की आवश्यकता नहीं-- मरणासन्न व्यक्ति जो देखता, सुनता और अनुभव करता है, वह सब इसी दूसरी अवस्था में करता है। वास्तव में यह मस्तिष्क की अंतर्चेतना की गहन अवस्था है। इसे ही योग-शास्त्र में 'मृत्यु-मूर्च्छा' कहते हैं।
  अंतर्चेतना बनी रहने के कारण मुमुर्षु व्यक्ति अपने आपको मृत नहीं समझता। जबकि घर-परिवार के लोग उसे मृत समझकर रोने-धोने और विलाप करने लग जाते हैं। यही वह समय है जब परिवार वालों को रोते-कल्पते और विलाप करते देख कर मृतक को आश्चर्य होता है--आखिर ये सब लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं ?
   फिर धीरे-धीरे अंतर्चेतना भी लुप्त होने लग जाती है और दूसरी अवस्था के अन्त में मस्तिष्क की भी मृत्यु हो जाती है।
  तीसरी अवस्था में मृतक अपनी आत्मा को अपने शरीर से अलग देखती है। उस समय उसे अपने अन्दर अत्यन्त हल्केपन के साथ-साथ अनिर्वचनीय शक्ति का भी अनुभव होता है। वह अपने को पूर्ण स्वतन्त्र समझने लग जाती है। फिर वह यह भी समझने लग जाती है कि वह अब मर चुका है और परिवार, समाज और संसार से उसका कोई रिश्ता-नाता नहीं रह गया है।
   _यह समझकर एक बार वह निराश और दुःखी अवश्य होता है, मगर यह स्थिति क्षणिक होती है। स्वतंत्रता, शान्ति और आनंद उसके दुःख और उसकी निराशा को कर देते हैं।_
  _मैंने मृत्यु की तीसरी अवस्था के समय को मृतात्मा के मनोबल और आत्मबल के अनुसार 2 घंटे से 10 दिन, 13 दिन, 45 दिन और 12 महीने निर्धारित किये हैं।_
    यहाँ यह स्पष्ट बतला देना अनावश्यक न होगा कि ये समय-अवधियां उन्होंने विभिन्न प्रकार की मृतात्माओं से विशेष् माध्यम द्वारा संपर्क साध कर निर्धारित की हैं। यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित है कि उन अवधियों में गैर-हिन्दू मृतात्माओं की तीसरी अवस्था उनकी मति-गति, संस्कार और उनकी संस्कृति के अनुसार निर्मित होती है।
     लेकिन फिर भी गैर-हिन्दू मृतात्माओं की तीसरी अवस्था कम-से-कम 2 घंटे की और अधिक से अधिक 40 दिनों की अवधि की होती है। यदि इतने समय के अंतर्गत उनको किसी गर्भ में प्रवेश मिल गया तो ठीक, अन्यथा अनिश्चित काल तक इधर-उधर भटकती ही रहती हैं वे।
  तीसरी अवस्था के प्रथम दो घंटों का समय अति महत्वपूर्ण माना जाता है। जिन मृतात्माओं में शरीर के प्रति आकर्षण अधिक रहता है और जिनमें वासना का वेग प्रबल रहता है, उनमें पुनर्जन्म लेने की आकांक्षा अति प्रबल होती है, भले ही वह गर्भ उनके संस्कार के अनुकूल न हो।
   अनुकूल गर्भ न होने की स्थिति में मृतात्माएँ या तो गर्भ त्याग कर बाहर निकल आती हैं या फिर जन्म ले लेती हैं। कुछ मृतात्माएँ ऐसी भी होती हैं जो शरीर के प्रति मोहवश गर्भ में प्रवेश तो कर जाती हैं, मगर कुछ दिन बाद ही गर्भ छोड़ देती हैं। इसे ही हम 'गर्भपात' या 'शिशु की अकाल मृत्यु हो जाना' कहते हैं।
     इसी प्रकार कुछ ऐसी भी मृतात्माएँ  होती हैं, जो जन्म लेने के बाद किसी कारणवश मरती तो नहीं, मगर जीवनभर अपने संस्कार के विपरीत पारिवारिक वातावरण के कारण दुःख अवश्य झेलती हैं। इसके विपरीत कुछ मृतात्माएँ ऐसी भी होती हैं जो अपने संस्कारों के कारण परिवार के लिए हमेशा के लिए दुःख और क्लेश का कारण बनी रहती हैं।
    यदि हम यह कहें कि पारिवारिक विचार-वैषम्य, विचार-मतभेद और विचार-संघर्ष का मूल रहस्य एकमात्र यही है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
  दूसरी अवधि 10 दिन की है। इस अवधि में मृतात्मा का अपने परिवार से बराबर अगोचर सम्पर्क बना रहता है। शरीर की अन्तिम क्रिया से लेकर उसके निमित्त जितने भी कर्मकाण्ड होते हैं, उन सब का साक्षी रहता है वह। यदि कर्मकाण्ड में कहीं कोई त्रुटि होती है तो उसका उसे भारी दुःख होता है।
   इतना ही नहीं, वह यह भी समझता है कि उसके प्रति परिवार के किस सदस्य के मन में कौन-सा और कैसा भाव या विचार है।
  सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि जिस प्रकार माता के गर्भ में शिशु के स्थूल शरीर की रचना नौ मास में होती है, उसी प्रकार उन (मृत्यु के बाद के) दस दिनों में मृतात्मा के लिए सूक्ष्मशरीर की रचना होती है। यह सूक्ष्मशरीर की रचना का कार्य ठीक ढंग से हो, इसी के लिए हिन्दू शास्त्रों में "दशगात्र श्राद्ध" का विधान है।
  अपने अन्वेषण-काल में एक प्रबुद्ध आत्मा ने मुझे बतलाया कि मुख्य रूप से आत्मा के तीन ही शरीर हैं--स्थूल शरीर, सूक्ष्मशरीर और मनोमय शरीर। पदार्थ के कणों से स्थूल शरीर का, प्राण के परमाणुओं से सूक्ष्मशरीर का और मन की चेतना के परमाणुओं से मनोमय शरीर का निर्माण होता है। जब और जिस समय जिस शरीर में आत्मा रहती है, वही शरीर प्रमुख होता है और अन्य शरीर बीज रूप में उसमें ही विद्यमान रहते हैं। आत्मा बिना शरीर के रह ही नहीं सकती। एक शरीर छूटने के बाद तत्काल उसको दूसरा शरीर चाहिए। स्थूल शरीर के बाद आत्मा के लिए जो शरीर है, वह है--सूक्ष्मशरीर।
   और मरणोपरान्त सूक्ष्मशरीर की रचना में पूरे दस दिनों का समय लगता है। इसलिए जब तक सूक्ष्मशरीर की रचना पूरी नहीं हो जाती तब तक मृतात्माएँ अपने लिए अपनी वासनाओं के कणों से 'वासना शरीर' की रचना स्वयम् ही कर लेती हैं। इसी वासना शरीर को प्रेतशरीर कहते हैं और उसमें निवास करने वाली मृतात्मा को प्रेतात्मा कहते हैं।
  आजकल समाज में स्वार्थवश या अज्ञानतावश मृतात्मा की अन्तिम क्रिया और उसके बाद शुद्धि और दशगात्र श्राद्ध के प्रति उपेक्षा का भाव देखने को मिलता है, जिस कारण मृतात्मा को प्रेत योनि से मुक्ति मिल पाना सम्भव नहीं हो पाता। सर्विस, व्यवसाय के चलते, समयाभाव के फलस्वरूप लोग अब शुद्धि तीसरे, पांचवें, सातवें दिन कर लेते हैं और दशगात्र श्राद्ध तो अनेक परिवारों में किया ही नहीं जाता।
     जबकि शुद्धि दसवें दिन और ग्यारवें दिन दशगात्र श्राद्ध(एकादशा) किया जाना मृतात्मा के प्रेतशरीर से मुक्ति के लिए आवश्यक है। क्योंकि सूक्ष्मशरीर की रचना में पूरे दस दिन की अवधि का समय लगता है। एक-एक दिन में एक-एक अंग का निर्माण पूर्ण हो पाता है।
  जब दस दिनों में सूक्ष्मशरीर का निर्माण हो जाता है, तब मृतात्मा को अपने स्व निर्मित वासना शरीर से मुक्ति मिल जाती है। वह प्रेतशरीर छोड़कर सूक्ष्मशरीर में प्रवेश कर जाती है। इसी को कहते हैं--'प्रेतमुक्ति'। एक बात यहाँ तथाकथित प्रगतिवादी, बुद्धिवादी आधुनिक विचारधारा वाले लोगों के लिए अवश्य समझने की है कि सूक्ष्मशरीर की रचना के जितने भी आधार हैं, उनमें सर्वश्रेष्ठ आधार है--दशगात्र श्राद्ध।
   वह दशगात्र श्राद्ध ज्येष्ठ पुत्र द्वारा ही सम्पन्न होना चाहिए। क्योंकि पिता की मृतात्मा पुत्र से कहती है--जैसे तुम्हारी माता के गर्भ में तेरे लिए स्थूल शरीर का निर्माण मेरे द्वारा हुआ, उसी प्रकार अब तू मेरे लिए अब इस समय दशगात्र श्राद्ध द्वारा सूक्ष्मशरीर का निर्माण कर।
  भारतीय संस्कृति का यह 'श्राद्ध विज्ञान' अपने आप में कितना गम्भीर और रहस्यमय है--इसका पता इसी तथ्य से लग जाता है और यही मुख्य कारण है कि जितने भी प्रकार के श्राद्ध हैं, उनमें दशगात्र श्राद्ध अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
     इस श्राद्ध के अभाव में या त्रुटिपूर्ण ढंग से होने की दशा में मृतात्मा का प्रेतयोनि से मुक्त हो पाना अत्यन्त कठिन हो जाता है। वैसे तो मृतात्माओं को अन्य अनेक कारणों से प्रेतयोनि मिलती है।
   _मगर इस प्रकार प्राप्त प्रेतयोनि से मृतात्माओं को पीड़ा, यातना की कोई सीमा नहीं रहती। वही उनका 'नर्क' है और उस नर्क के क्रोध को वे अपने परिवार के लोगों को सता कर् शान्त करती हैं। इसे ही 'प्रेतबाधा' की संज्ञा दी जाती है।_
   _दशगात्र श्राद्ध के बाद प्रेतयोनि से मुक्ति का एकमात्र मार्ग रह जाता है और वह मार्ग है--मृतात्मा से सम्बन्ध रखने वाले अन्य 'कर्मकाण्ड' और अन्य श्राद्ध-क्रियाएं। उनसे एक वर्ष में धीरे-धीरे वासना का वेग और वासना के कण क्षीण हो जाते हैं और प्रेतात्मा को प्रेतशरीर और प्रेतयोनि से मुक्ति मिल जाती है। मुक्त होते ही वह अपने कर्म, विचार, भाव और संस्कार के अनुरूप गर्भ की तलाश में निकल पड़ती है।_
     यदि तुरंत अनुरूप गर्भ नहीं मिला तो उस अवस्था में वह उसके लिए प्रतीक्षा करती है। वह प्रतीक्षा कब पूरी होगी--यह निश्चित रूप से नहीं बतलाया जा सकता। वास्तव में यदि देखा जाय तो प्रतीक्षा की अवधि मृतात्मा के अच्छे-बुरे कर्मों और संस्कारों पर निर्भर है। बुरे कर्मों और बुरे संस्कारों वाली आत्मा को तो अधिक समय तक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती क्योंकि आज संस्कारहीन समाज का परिवेश कुछ इसी तरह का चारों ओर दिखलाई पड़ता है, इसीलिये उसे शीघ्र ही जन्म लेने का अवसर मिल जाता है।
   यही कारण है कि आज समाज में मनुष्य रूप में बुरे संस्कारों वाली आत्मायें अधिक दिखाई पड़ती हैं। जबकि अच्छे संस्कारों और कर्मो वाली आत्माओं को सैकड़ों-हज़ारों सालों का समय लग जाता है योग्य गर्भ की प्रतीक्षा में।
 _दोनों प्रकार की प्रतीक्षारत आत्माओं को प्रेतयोनि से मुक्ति मिल जाने के पश्चात् जिस शरीर की उपलब्धि होती है, वह है--सूक्ष्मशरीर। सूक्ष्मशरीर धारण करने के कारण ऐसी ही आत्मा को 'सूक्ष्मात्मा' कहते हैं।_
  अपने अन्वेषण-काल में मुझे एक उच्चतम अवस्था प्राप्त आत्मा ने बतलाया--
    _वासना और प्राण के कणों से निर्मित एक और शरीर होता है जिसे 'पितृशरीर' कहते हैं। यह प्रेतशरीर और सूक्ष्मशरीर के बीच का शरीर है। यह शरीर उस मृतात्मा को उपलब्ध् होता है जिसकी 'अधोगति' हुई होती है। जिनके कर्मकाण्ड और वार्षिक श्राद्धकर्म ठीक ढंग से नहीं हुए होते हैं, ऐसी दुर्भाग्यशाली मृतात्मा को ही 'पित्रात्मा' कहा जाता है और इनके लोक को कहा जाता है--'पितृलोक'।_
      पितृलोक में भी अच्छी और बुरी दोनों प्रकार की आत्माएं होती हैं जो अपने पूर्वकृत कर्म, विचार, भाव और संस्कार के अनुरूप गर्भ की खोज में रहती हैं। इन्हें अनुकूल गर्भ कब मिल सकेगा--यह ठीक-ठीक नहीं बतलाया जा सकता। लेकिन कुछ ऐसी पित्रात्माएँ भी होती हैं जिनका सबसे बड़ा दुःख होता है--संसार के प्रति मोह और उसी मोह के वशीभूत होकर वे यथासमय गर्भ में प्रविष्ट हो जाती हैं, भले ही वह गर्भ उनके अनुकूल न हो।
  _आत्मा के लिए सबसे मूल्यवान और मत्वपूर्ण शरीर होता है--'स्थूलशरीर' और इसके बाद किसी शरीर का मूल्य और महत्व है तो वह केवल मात्र है--सूक्ष्मशरीर का। इसलिए कि इस सूक्ष्मशरीर के एक ओर है देवदुर्लभ मानवशरीर और दूसरी ओर है--मनोमय शरीर। देवता जिस शरीर में रहते हैं, वही मनोमय शरीर होता है।_
    मनोमय शरीर का मतलब है--देवशरीर और मनोमय लोक का मतलब है--देवलोक। जिस सूक्ष्म शरीरधारी पित्रात्माओं का पूर्व कृतकर्म, भाव व संस्कार राजसी स्तर का होता है, वे मानव योनि प्राप्त कर लेती हैं और उच्च कुल और राजसी सम्पन्न परिवार में जन्म ले लेती हैं। मगर जिन पित्रात्माओं का कर्म, भाव और संस्कार सात्विक स्तर का होता है, वे देवयोनि में चली जाती हैं और वहां से वापस लौटने पर उनका जन्म मानव योनि में उच्च कुल और संस्कार- संपन्न परिवार में होता है।
  _ऐसी मानव आत्माएं धार्मिक, सात्विक, आध्यात्मिक, सुन्दर, गुणी और वीतरागी होती हैं।_

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