शशिकांत गुप्ते
इतिहास को झुठलाने का फैशन चल पड़ा है। झुठलाने का फैशन विज्ञापनों में दर्शाया जा रहा है।
“बिल्ली के भाग से छींका टूटा” यह कहावत जिन लोगों के लिए चरितार्थ हुई वे भी विज्ञापनों में इतिहास को कोस रहें हैं।
हाथों में झाड़ू थाम लेने से सिर्फ जमीन पर दिखाई देने वाला कचरा साफ होता है। दिमागी सफ़ाई के लिए आदर्शवादी विचारों को समझने के बाद आत्मसात करना पड़ता है।
इतिहास को कितना भी झुठलाने का प्रयास करो, इतिहास अमर है।
इतिहास में झांक कर देखों तो किसी अज्ञात शायर का यह शेर याद आता है।
दीवारें छोटी होती थीं लेकिन पर्दा होता था
तालों के ईजाद से पहले सिर्फ़ भरोसा होता था
जो व्यक्ति भरोसा दिलता है,वह विश्वनीय होना चाहिए। विश्वनीयता पर यह कहावत याद आती है “दूध से जलने पर छांछ भी फूंक फूंक कर पीना चाहिए” कारण वादें जुमलों में बदलतें देर नहीं लगती है।
इस मुद्दे पर शायर आरजू लखनवी फरमातें हैं।
भोली बातों पे तेरी दिल को यक़ीं
पहले आता था अब नहीं आता
झूठे भरोसे पर यक़ीन करने से जो नतीजा होता है, वह किसी शायर यूँ बयाँ किया है।
हमें तो अपनों ने लूटा,गैरों में कहाँ दम था
हमारी कश्ती वहाँ डूबी,जहाँ पानी कम था
इस शेर पर किस तंज़-ओ-मज़ाह ( हास्यव्यंग्य) के शायर ने निम्न नसीहत दी है।
तुम तो थे ही बेवकूफ़,तम्हारे दिमाग़ में कहाँ दम था
वहाँ कश्ती लेकर गए ही क्यों, जहाँ पानी कम था
यह व्यंग्य ठीक इस कहावत की तरह ही है। आ बेल मुझे मार
इस कहावत से मिलता जुलता एक शेर है। शायरा मोहतरमा शिखा पाचोलीजी का यह शेर एकदम मौजु है।
तेरी ख़्वाहिश भी शामिल थी,तेरे यूँ डूबने में
ये सारा दोष बस दरिया के पानी के नहीं था
इतना सब होने पर भी हम सकारात्मक सोच ही रखतें है। हम ग्लास पानी से आधा भरा है। इस उक्ति को निर्मल मन से यूँ कहतें हैं। हमारे रुपये का अवमूल्यन नहीं हो रहा है। डॉलर मजबूत हो रहा है
यह बात ठीक उसी मजबूती से कही गई है, जिस मजबूती के साथ अच्छेदिन लाने का वादा किया गया था?
अब तो बस यही गाने का मन करता है।
दिन प्यारे, मेरे बिछड़े साथी सारे
हाय! कहाँ गये, हाय! कहाँ गये
कोई लौटा दे मेरे, बीते हुए दिन
बीते हुए दिन वो हाय, प्यारे पल छिन
कोई लौटा दे …
यह गीत सन 1964 में प्रदर्शित फ़िल्म दूर गगन की छांव में का है।
इसे लिखा है गीतकार शैलेंद्रजी ने।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

