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आरक्षण, समानता और समाज का पुनर्निर्माण

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अंबेडकरवादी–समाजवादी दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की समझ

-तेजपाल सिंह –तेज

आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला:

सुप्रीम कोर्ट का फैसला–

            सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरक्षित वर्ग का कट-ऑफ जनरल से ज्यादा हो और आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार जनरल कट-ऑफ पार करता है, तो जनरल कोटे में उसका चयन किया जा सकता है। जनरल कैटेगरी में सभी मेधावी छात्रों को जगह मिलनी चाहिए, फिर चाहे वो किसी भी जाति, धर्म, जनजाति, वर्ग या लिंग का हो।सरकारी नौकरी में आरक्षण पर SC का अहम फैसला, SC/ST/OBC और EWS उम्मीदवारों के लिए क्या हैं मायने?सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अब आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार, जो जनरल श्रेणी की कट-ऑफ से अधिक अंक लाते हैं, उन्हें मेरिट के आधार पर जनरल कैटेगरी में शामिल किया जा सकेगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जनरल श्रेणी किसी जाति विशेष की नहीं, बल्कि योग्यता पर आधारित है। यह फैसला SC, ST, OBC और EWS सहित सभी वर्गों पर असर डालेगा।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला:

            सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरक्षित वर्ग का कट-ऑफ जनरल से ज्यादा हो और आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार जनरल कट-ऑफ पार करता है, तो जनरल कोटे में उसका चयन किया जा सकता है। जनरल कैटेगरी में सभी मेधावी छात्रों को जगह मिलनी चाहिए, फिर चाहे वो किसी भी जाति, धर्म, जनजाति, वर्ग या लिंग का हो। कोर्ट का कहना है कि फॉर्म में अपनी जाति लिख देना अपने आप में आरक्षित सीट पाने का अधिकार नहीं देता, बल्कि सिर्फ यह बताता है कि उम्मीदवार आरक्षित सूची में भी दावेदार हो सकता है।  कोर्ट के अनुसार, ओपन कैटेगरी में आने की एक ही शर्त है- मेरिट। यह नहीं देखा जाएगा कि उम्मीदवार किस वर्ग से है।

हाईलाइट्स : डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। आरक्षण पर बीते दिन सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि जनरल या ओपन कैटेगरी में चयन मेरिट के आधार पर होगा। अगर कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार जनरल श्रेणी की कट-ऑफ से अधिक नंबर लाता है, तो उसे जनरल (अनारक्षित)  कैटेगरी में भी गिना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, जनरल श्रेणी किसी जाति विशेष की नहीं है, बल्कि मेरिट के आधार पर तय की जाती है। अदालत के इस फैसले का सामान्य वर्ग समेत SC, ST, OBC और EWS पर भी बड़ा असर पड़ेगा।

कोर्ट के फैसले का क्या होगा असर?

            सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी केस में साफ किया था कि मेधावी उम्मीदवारों को योग्यता के आधार पर मौका मिलना चाहिए। अदालत के नए आदेश से इस पर फिर से मुहर लग गई है। जनरल कट-ऑफ से ज्यादा अंक लाने वाले आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को भी सामान्य कैटेगरी में शामिल किया जा सकेगा। अगर उम्मीदवार ने परीक्षा के किसी भी स्तर पर आरक्षण का लाभ लिया है, तो उसपर ये नियम लागू नहीं होगा और उसे सामान्य वर्ग में नहीं गिना जाएगा। आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार अगर बिना छूट जनरल कट-ऑफ पार करता है, तो जनरल सीट पर ही उसका चयन किया जाएगा।  कोर्ट के अनुसार, इस फैसले से मेरिट के नियमों को मजबूती मिली है। इससे जनरल उम्मीदवारों के किसी भी अधिकारों का हनन नहीं हुआ है।

क्या है पूरा मामला?

            अगस्त 2022 में राजस्थान हाईकोर्ट ने 2756 पदों (जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड-II) के लिए भर्ती निकाली थी। लिखित परीक्षा के नतीजों में SC, OBC, MBC और EWS का कट-ऑफ जनरल से ज्यादा चला गया था। कुछ आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों ने जनरल कट-ऑफ पार किया, लेकिन अपनी कैटेगरी का कट-ऑफ न होने के कारण उन्हें अगले राउंड से बाहर कर दिया गया। राजस्थान हाईकोर्ट में नतीजों को चुनौती दी गई, जिस पर फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जनरल लिस्ट मेरिट के आधार पर तय होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी अब इस फैसले पर मुहर लगा दी है।

 

            नीचे मैं प्रस्तुत निबंध को अंबेडकरवादी–समाजवादी दार्शनिक ढाँचे में, और अधिक गहराई के साथ, लेकिन सहज, सरल और जनता-केंद्रित भाषा में विकसित कर रहा हूँ—ताकि यह लेख केवल पढ़ा न जाए, बल्कि सजगता पैदा करे, आत्मसम्मान जगाए और वैचारिक शक्ति दे

 

1. संविधान : क़ानून नहीं, उत्पीड़ितों का घोषणा-पत्र:

            डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान को केवल शासन चलाने का दस्तावेज़ नहीं माना था। उन्होंने उसे सदियों से कुचले गए लोगों की आज़ादी का घोषणा-पत्र कहा था। अंबेडकर जानते थे कि जिस समाज में जन्म से ही मनुष्य की कीमत तय कर दी जाती हो, वहाँ “बराबरी” केवल शब्दों से नहीं आती। बराबरी के लिए विशेष उपाय करने पड़ते हैं। इन्हीं विशेष उपायों का नाम है—आरक्षण। सर्वोच्च न्यायालय का हालिया फैसला इसी मूल भावना की ओर लौटने का संकेत है।

2. बराबरी का अर्थ : एक-सी लाइन में खड़ा करना नहीं:

            अंबेडकरवाद और समाजवाद दोनों यह सिखाते हैं कि— “बराबरी का मतलब सबको एक-सा व्यवहार देना नहीं, बल्कि सबको इंसान बनने का समान अवसर देना है।” जो बच्चा पीढ़ियों से स्कूल, ज़मीन, सम्मान और अवसर से दूर रखा गया हो, उसे उसी लाइन में खड़ा कर देना जहाँ पीढ़ियों से लाभ उठाने वाले खड़े हों—यह न्याय नहीं, चालाकी है। आरक्षण इसी अन्याय को ठीक करने का औज़ार है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह स्वीकार किया है कि—

·         अनारक्षित सीटें किसी जाति की निजी संपत्ति नहीं हैं

·         वे सभी नागरिकों के लिए हैं, जिनमें दलित, आदिवासी और पिछड़े भी शामिल हैं

 3. ‘जनरल’ का झूठ और असली सच:

            संविधान में कहीं भी “जनरल कैटेगरी” नहीं लिखी है। संविधान सिर्फ़ दो बातें करता है—

·         आरक्षित

·         और अनारक्षित (जिस पर कोई रोक नहीं) –

            लेकिन व्यवस्था ने अनारक्षित को चालाकी से “जनरल” बना दिया—और “जनरल” को ऊँची जातियों का पर्याय बना दिया। यह  एक वैचारिक धोखा था। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला इस धोखे को उजागर करता है।

4. योग्यता : मेहनत बनाम विशेषाधिकार:

            अंबेडकर ने कहा था— “जिसे अवसर नहीं मिला, उसकी योग्यता को मत नापो।” जब कोई दलित, आदिवासी या पिछड़ा बच्चा तमाम रुकावटों के बावजूद ज़्यादा अंक लाता है, तो वह सिर्फ़ नंबर नहीं लाता—वह पूरी व्यवस्था को चुनौती देता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि—

·         अगर आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार सामान्य कट-ऑफ से ज़्यादा अंक लाता है

·         तो उसे जाति के कारण बाहर करना

·         योग्यता का अपमान है –यह बात सीधे उस झूठ को तोड़ती है कि आरक्षण योग्यता के ख़िलाफ़ है।

5. ‘दोहरा लाभ’ का भ्रम : डर की राजनीति:

            आरक्षण विरोधी अक्सर कहते हैं—“उन्हें दोहरा लाभ मिल रहा है।” अंबेडकरवादी सोच पूछती है—किसका लाभ? किसकी हानि? अगर कोई दलित उम्मीदवार अपनी मेहनत से सामान्य सीट पर आता है—

·         तो वह किसी का हक नहीं छीन रहा

·         वह अपना छीना हुआ हक़ वापस ले रहा है

            न्यायालय ने सही कहा कि “दोहरा लाभ” की सोच ही ग़लत है। यह सोच दरअसल बराबरी से नहीं, बराबरी खोने के डर से पैदा होती है।

6. समाजवाद और राज्य की ज़िम्मेदारी:

            समाजवाद सिखाता है कि राज्य तटस्थ नहीं हो सकता। जिस समाज में शोषण हुआ है, वहाँ राज्य की ज़िम्मेदारी है कि वह कमजोर के पक्ष में खड़ा हो। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला यही करता है—

·         यह सत्ता की ओर नहीं

·         बल्कि समाज के सबसे नीचे खड़े व्यक्ति की ओर झुकता है –यह वही “संवैधानिक नैतिकता” है जिसकी बात अंबेडकर करते थे।

7. यह फैसला क्यों ऐतिहासिक है?

            यह फैसला इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि

·         यह आरक्षण को दया नहीं, अधिकार मानता है

·         यह योग्यता को जाति से मुक्त करता है

·         यह अनारक्षित सीटों को सचमुच “सबके लिए” खोलता है

·         यह दलित-बहुजन समाज को आत्मविश्वास देता है

            यह फैसला कहता है— “तुम योग्य हो, और तुम्हारी योग्यता को रोका नहीं जाएगा।”

8. जनता के लिए संदेश : जागो, संगठित हो, समझो:

            अंबेडकर ने कहा था—“शिक्षित करो, संगठित हो, संघर्ष करो।” यह फैसला तभी ज़मीन पर असर डालेगा जब जनता—

·         इसे समझे

·         इसकी रक्षा करे

·         और किसी भी उल्लंघन पर आवाज उठाए

            कानून तभी ताक़त बनता है जब जनता उसे अपनी ढाल बनाती है।

उपसंहार : सम्मान की ओर एक कदम:

            यह फैसला कोई आख़िरी मंज़िल नहीं है। यह उस लंबे संघर्ष का एक पड़ाव हैजो इंसान को इंसान बनाने के लिए लड़ा जा रहा है। अंबेडकरवादीसमाजवादी नज़रिए से देखें तो यह निर्णय कहता है— “बराबरी माँगी नहीं जातीउसे समझ करसंगठित होकर हासिल किया जाता है।” और यही इस फैसले की सबसे बड़ी ताक़त है। (https://youtu.be/adNukEXMSbM?si=FtBWqx-6QaP67KWY

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