डा.सुरेश खैरनार
23 मार्च को डॉ. राममनोहर लोहिया की 116 वी जयंती और शहिद भगतसिंग तथा सुखदेव और राजगुरु के शहादत का 95 वा शहादत दिवस के उपलक्ष्य में मै इस बार डॉ. प्रवीण मल्होत्रा के ‘डॉ. राममनोहर लोहिया, देशज समाजवाद और समाजवादी आंदोलन की विचारधारा का शोध – प्रबंध पुस्तक के रूप में BFC PUBLICATIONS PRIVATE LIMITED CP – 61, VIRAJ KHAND, GOMTI NAGAR, LUCKNOW – 22 60 10 के द्वारा 2025 मे 349 पृष्ठों की किताब के रूप में प्रकाशित किया है. जिसकी मै समिक्षा लिखने की कोशिश कर रहा हूँ.
प्रविणजी का जन्म मध्यप्रदेश के बड़नगर, जिला उज्जैन में मध्य प्रदेश संयुक्त समाजवादी पार्टी के विधायक दल के नेता श्री. रामप्रकाश मल्होत्रा नाम के पिताजी के घर में ही होने की वजह से उन्हें बचपन में ही डॉ. लोहिया जब चुनाव प्रचार के लिए आते थे तो, उन्हे अपने घर में ही नजदीकियों से देखने तथा मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है. लेकिन इसके बावजूद प्रवीणजी ने प्रबंध काफी तटस्थ होकर लिखने की कोशिश की है. इसलिए मै विशेष रूप से उनका अभिनंदन करते हूए उनके प्रबंध मे का डॉ. राममनोहर लोहिया के 57 साल की जीवन यात्रा का मुल्यांकन बचपन से लेकर उनके शिक्षा तथा स्वतंत्रता आंदोलन नेपाल के स्वतंत्रता का आंदोलन, गोवा के स्वतंत्रता संग्राम के बिगुल बजाने से लेकर अमेरिका के रंगभेद के खिलाफ तथा नेफा (वर्तमान उत्तर पूर्वी प्रदेश) मे परमिट लेने के खिलाफ, दाम बांधों निति, तीन आना बनाम सोलह आना, अंग्रेजी हटाओ, भूमी के बटवारे से लेकर सिविल राइट्स के लिए तथाकथित देशद्रोही आरोप के खिलाफ हेबियस कार्पस् की याचिकाओं की शुरुआत खुद सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने के उदाहरणों के साथ लोहिया के राजनीति एक सच्चे शोधार्थी के अनुशासन से किया है. जिससे मै काफी प्रभावित हुआ हूँ.
भारतीय राजनीति में आजादी के बाद के किसी भी राजनेता की तुलना में सर्वाधिक प्रतिभाशाली भारतीय कला से लेकर जाति-धर्म, भाषा, वेशभूषा, रंग भेद, राजनीति, सामाजिक,आर्थिक सांस्कृतिक, साहित्य, संगीत, इतिहास, सौंदर्यबोध से लेकर नर नारी संबधो के उपर आजसे पचहत्तर साल पहले लगभग हर पहलू पर इतनी बारीकी से भारतीय संद्घर्भ सोचकर उन्हें लेकर जमीन पर विभिन्न प्रकार के महात्मा गाँधी के सत्याग्रह को ही सिविल नाफरमानी का विस्तार करने का विचार और उनके लिए विभिन्न कार्यक्रमों की शुरुआत करने वाला दुसरा कोई भी राजनेता दिखाई नहीं दे रहा है. लेकिन अपने जीवन के आजादी के आंदोलन से लेकर आजादी के बाद भारत को बेहतर बनाने के लिए जो सांघटनिक रचना करना चाहिए थी उसकी जगह संपूर्ण देश को हिलाने का अकेले कुछ चंद साथियों के साथ करने और खुद भी उम्र की साठ साल की पहले ही यात्रा समाप्त होने की वजह से सिर्फ लोहिया अध्यन केंद्रों मे लोहिया का दर्शन सिकुड़ कर रह गया है. काश डॉ. राममनोहर लोहिया ने राष्ट्र सेवा दल जैसे संगठन की अहमियत को समझकर उसे संपूर्ण भारत में फैलाने के लिए कोशिश की होती. मुझे रह-रहकर अचरज हो रहा है कि जब इंदूताई केलकर, आचार्य केलकर, एस. एम. जोशी, मधु लिमये, मृणाल गोरे, भाई वैद्य, डॉ. बाबा आढाव, सदाशिव बागाइतकर, विनायक कुलकर्णी जैसे राष्ट्र सेवा दल से ही समाजवादी समाज को साकार करने के लिए संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी मे डॉ. लोहिया के साथ इतने सारे राष्ट्र सेवा दल से तैयार होकर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टीमे रहते हूऐ राष्ट्र सेवा दल का कार्यकर्ताओं को निर्माण करने का प्रारंभिक शिक्षा केंद्र के रूप में स्वीकार किया होता तो शायद समाजवादी आंदोलन के लिए नऐ कार्यकर्ता तैयार होकर मिले होते तो शायद डॉ. लोहिया को अपने मौलिक कार्यक्रमों को जमीन पर कायम करने के लिए तपेतपाए लोग मिले होते. इस बारे में भी प्रविणजी ने अपने शोध – प्रबंध मे समावेश किया होता तो और भी अच्छा हुआ होता. हालांकि लोहिया के कार्यक्रमों की कल्पनाओं की तुलना में संघठन के अभाव के तरफ इशारा जरुर किया है. और उस वजहसे संयुक्त विधायक दलों के सरकारो के दौर में अधपके कार्यकर्ताओं के पतन का दौर जो शुरू हुआ है, वह नितिश कुमार तक आज भी चल रहा है.
लोहिया के विद्यार्थि जीवन में ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल होने का सुत्रपात 1 अगस्त 1920 के दिन लोकमान्य तिलक की मृत्यू के दिन (डॉ. लोहिया उम्र 10 साल) स्कूल के छात्रों की हड़ताल का नेतृत्व किया था. उनके संघर्षमय जीवन की यही से शुरुआत होती है, जो 11- 12 अक्तुबर 1967 मृत्यू के पहले क्षण तक अविरत जारी थी. काश लोहिया को और 20 – 25 सालों का जीवन मिला होता, तो भारत और समाजवादी आंदोलन का वर्तमान आज जितना खराब हो गया है, शायद वह उतना नहीं हुआ होता.
हालांकि मेरी इस टिप्पणी से तुरंत बाद ही लोग लोहिया को ही जिम्मेदार ठहराने का राग आलापने की शुरुआत कर सकते हैं. लेकिन वर्तमान में भाजपा के साथ राजनीतिक गठजोड़ की राजनीति का ठिकरा अकेले डॉ. लोहिया के माथे पर देनेवाली जमातों को मै बताना चाहता हूँ कि आजादी के बाद कांग्रेस की संपूर्ण देश में एकमुश्त सत्ता से तंग आकर कम्युनिस्टों से लेकर सभी ने कांग्रेस विरोध के लिए गठजोड़ करने का इतिहास मौजूद है. वैसे भी राजनीतिक शास्त्र का कम-से-कम शैतान (Laser Evil) जैसे राजनीति के इतिहास में दुसरे विश्वयुद्ध के दौरान स्टालिन और हिटलर का पैक्ट या कांग्रेस के खिलाफ दक्षिण भारत तथा महाराष्ट्र में भी कम्युनिस्ट पार्टीयों का जनसंघ से लेकर शिवसेना तथा मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन किऐ गए हैं. जैसे आज माले के दिपंकर भट्टाचार्य भाजपा के खिलाफ सभीको एकजूट होने के लिए हाथ जोड़ कर सभी लेफ्ट पार्टीयों को पिछले बारह सालों से लगातार लिखने और बोलने का काम कर रहे हैं. और मै उनके इस अपिल का समर्थन करने वाले लोगों में से एक हूँ. इसलिए कालसापेक्षता का सिद्धांत के अनुसार इतिहास के क्रम में सिर्फ अकेले वर्तमान भाजपा को पुष्ट करने का अपराध मे कम्युनिस्टों से लेकर कांग्रेस पार्टी भी जिम्मेदार है. 2014 मे नरेंद्र मोदी जी ने सत्ताधारी बनने के बाद मैने भारत में अब सौ साल पहले के जर्मनी के जैसा फासिस्ट दौर शुरू होने की संभावना है, लेख के बाद सीपीएम के पूर्व सचिव प्रकाश करात ने भाजपा या आर एस एस फासिस्ट नहीं है. शिर्षक से पार्टी के मुखपत्र मे लिखा हैं.
लोहिया के जन्म के पांच साल बाद ही महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से भारत हमेशा के लिए वापिस आने के बाद लोहिया ने महात्मा गाँधी के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए एक वर्ष के लिए अपनी शिक्षा का त्याग करते हूऐ 1928 मे भारत के विधान मे परिवर्तन की संभावना- शक्यताओ की जॉंच करने के लिए इंग्लैंड से ‘साइमन कमीशन’ भारत आया था जिसका भारत की जनता ने महात्मा गाँधी के आवाहन पर बहिष्कार किया था जिसमें 18 साल के लोहिया ने भी सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था उस समय लोहिया अखिल भारतीय संघठन मे काम करते थे. और इसी दौरान उनकी नेताजी सुभाष चंद्र बोस औ जवाहरलाल नेहरू से कलकत्ता में अखिल भारतीय बंगाली विद्यार्थी संघटठन के अधिवेशन में पहलीबार मुलाकात हुई है. जवाहरलाल उस संमेलन के अध्यक्ष थे और सुभाषचंद्र बोस विषय नियामक समिती के अध्यक्ष थे और लोहिया सदस्य थे. और उस संमेलन मे नेहरू की प्रथम मुलाकात से ही लोहिया नेहरू के प्रति आकर्षित हूए थे.
लोहिया 1929 मे अपने बी ए की पढ़ाई पूरी करने के बाद पहले इंग्लैंड गए लेकिन उनकी स्वतंत्र प्रकृति को इंग्लैंड का गैरबराबरी का माहौल रास नहीं आया तो जर्मनी चले गए और जर्मनी में हम्बोल्ट यूनिवर्सिटी में प्रवेश लेकर उन्होंने नमक सत्याग्रह को अपना शोध – प्रबंध का विषय चुना जिसका शिर्षक था ‘नमक कर और नमक सत्याग्रह’ ( Salt tax and Salt Satyagraha ) और उनके गाइड थे अर्थशास्त्री बर्नर जोम्बार्ट 1932 मे लोहिया ने गाइड के कहने पर की तुम जल्दी से जल्दी अपना शोधकार्य समाप्त करो और जर्मनी से चले जाओ क्योंकि हिटलर कभी भी जर्मनी का तानाशाह के रूप में आ सकता है उसके पहले तुम्हें भारत लौटना चाहिए क्योंकि लोहिया ने जर्मनी के आमचुनाव मे हिटलर का विरोध करते हूए चुनाव प्रचार में हिस्सा लेने की जानकारी गाइड को थी इसलिए उन्हें डर था कि हिटलर सत्ता में आने के बाद शायद लोहिया पर भी हिटलर कारवाई करने की संभावना है इसलिए उन्होंने यह सलाह दी थी.
जर्मनी में लोहिया का भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति रुझान भी स्पष्ट और मुखर था. 1930 – 32 के दौर में भारत धारासान के नमक सत्याग्रह के बाद( 6 अप्रैल 1930) संपूर्ण भारत में सत्याग्रह का आंदोलन आग की तरह फैल रहा था. और सत्याग्रहियों के उपर किऐ गए अत्याचारों का लोहिया के उपर गहरा असर हुआ और इसकी वजह से उन्होंने अपने गोंवेनिज मित्र डॉ. जूलिओ मेनेजिस के साथ मिल कर जिनेवा के लिग ऑफ नेशंस की बैठक में भारत मे अंग्रेजी सरकारने नमक सत्याग्रहियों के उपर किए गए अत्याचारों के पर्चे बाँटने का और उसके खिलाफ नारे लगाने का काम किया है.
1933 मे लोहिया ने फासिस्ट विरोधी पूंजीवाद विरोधी और साम्राज्यवाद विरोधी तथा समाजवादी रुझान के साथ जर्मनी को छोडने के पहले लोहिया का जर्मनी के (SOCIALIST DEMOCRATIC PARTY) के साथ गहरा, बौद्धिक और वैचारिक रिश्ता रह है. और उसी प्रभाव की वजह से उन्होंने 1934 मे जर्मनी से लौटने के बाद कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना मे (उम्र 24) सक्रिय योगदान दिया है. वे उसकी कार्यसमिति के सदस्य थे और पार्टी के मुखपत्र ‘कांग्रेस सोशलिस्ट’ के संपादक के रूप में नियुक्त किए गए थे.
शास्त्रीय समाजवाद के कार्ल मार्क्स के सिद्धांत से लोहिया जर्मनी में रहते हूऐ ही हेगेल, कार्ल मार्क्स जैसे विद्वानों के जर्मन भाषा में लिखा साहित्य से परिचित होते होते ही उनके ध्यान मे आया था कि औद्योगिक क्रांति के बाद यूरोपियन देशों से लेकर अमेरिका तक पूंजीवाद के संकट को देखकर ही कार्ल मार्क्स ने सिर्फ वर्गहीन समाजवादी दर्शन लिखा है. लेकिन भारतीय संदर्भ में हजारों सालों की वर्णव्यवस्था के कारण जातिव्यवस्था की इमारत जिसे डॉ. बाबा साहब आंबेडकर ने एक चार मंजिला इमारत जिसमें सिढियां नहीं होने के वजह से उपर का उपर और नीचे का निचे ही रहने की रचना की वजह से भारतीय समाज में आदान-प्रदान बिल्कुल भी नहीं है. और उचनिच की रचना की वजह से सडांध पैदा हो गई है. इसे दूर किऐ बगैर किसी भी प्रकार का बदलाव हो नहीं सकता. यह डॉ. लोहिया के भी चिंतन में प्रमुखता से होने की वजह से वह जयप्रकाश नारायण और आचार्य नरेंद्र देव के जैसे अपने आप को कभी भी मार्क्सवादी नहीं बोलते थे. यही डॉ. राममनोहर लोहिया का स्वतंत्र चितंन दिखाई देता है. इसलिए उन्होंने भारतीय संदर्भ में समतामूलक समाजवादी समाज के निर्माण के इर्द-गिर्द अपने सामाजिक चिंतन का ताना – बाना बनाने की कोशिश डॉ. बाबा साहब आंबेडकर के बाद दुसरे द्रष्टा राजनेता दिखाई देते हैं. और इसलिए डॉ. बाबा साहब आंबेडकर के साथ मिल कर एक पार्टी बनाने के लिए डॉ लोहिया, जयप्रकाश नारायण तथा एस. एम. जोशी जी के साथ डॉ. बाबा साहब आंबेडकर के साथ चर्चा शुरू हो गई थी. और डॉ. बाबा साहब आंबेडकर ने 5 दिसंबर 1956 की रात को सोने से पहले लिखा हुआ पत्र समाजवादी पार्टी के साथ एक ही पार्टी के बनाने के प्रस्ताव को स्वीकारोक्ति देने वाला ही लिखा है. जिसे उन्होंने अपने स्विय सहायक श्री. नानकचंद रत्तू को समाजवादी पार्टी के नेताओं को पहुंचाने का निर्देश देकर सो गए थे और रात की नींद मे ही डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर अपने महानिर्वाण की यात्रा पर निकल पड़े थे. काश यह पार्टी बनती तो आज भारत का राजनीतिक परिदृश्य शायद बदला हुआ मिलता. यह महत्वपूर्ण कडी प्रविणजी के शोध कार्य में कैसे छुट गई यह भी कमी मुझे दिखाई दी है.
हालांकि एक ही प्रबंध मे सभी मुद्दों को समावेश करना भी काफी जटील काम है लेकिन देशज समाजवाद और समाजवादी आंदोलन की विचारधारा शिर्षक के प्रबंध मे इस पहल का समावेश उचित होता.

