अग्नि आलोक

जनता ही क्रान्ति करती है….!

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रजनीश भारती

ये पाँच शब्द किसी भी देश के क्रान्तिकारियों के लिए मूलमंत्र हैं। इस मूल मंत्र को छोड़कर जो लोग सोचते हैं कि, ‘जनता तो अन्धी भेड़ होती है कोई वीर पुरुष ही क्रान्ति कर सकता है’, वे लोग हीरोइज़्म के शिकार होकर जाने अनजाने क्रान्ति को बदनाम करते हैं, और धीरे-धीरे खुद क्रान्ति से दूर होते जाते हैं।

हीरोइज़्म के शिकार लोग जनता को कमजोर समझते हैं। जब कि जनता अपने आप में इतनी ताकतवर होती है कि किसी भी बड़ी से बड़ी हुकूमत का तख्ता पलट सकती है।

इतिहास गवाह है जनता जब अपने पर आ गई तो एक करोड़ बयालिस लाख सैनिकों वाली विशाल फौज भी रूस के जारशाही हुकूमत की हिफाजत नहीं कर पाई।

72 लाख सैनिकों वाली चीन की च्यांग काई शेक की सरकार जनता के सामने नहीं टिक पाई। इसके अलावा क्यूबा, उत्तर कोरिया, वियतनाम, लाओस, कम्बोडिया, जिम्बाम्बे.. आदि दर्जनों देश इसके उदाहरण हैं। परिणामों पर न जाएं तो नेपाल और हाल ही में श्रीलंका में हुए उथल-पुथल को भी एक हद तक उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है।

जिन्हें जनता की अपार शक्ति पर भरोसा नहीं है, वे हीरोइज़्म का शिकार होकर व्यक्ति पर भरोसा करके व्यक्तिवादी हो जाते हैं। 

किसी बहुसंख्यक जाति पर भरोसा करके उस जाति को रिझाने के चक्कर में फँस जाते हैं। इस तरह जाति पर भरोसा करके जातिवादी हो जाते हैं, या जाति समूहों पर भरोसा करके अगड़ावादी, पिछड़ावादी, दलित वादी हो जाते हैं, और जातियों के गठबंधन करने के चक्कर में पड़ जाते हैं।

या किसी महापुरुष या देवता पर भरोसा करके उसका अंधभक्त हो जाते हैं। या कानून पर भरोसा करके कानून वादी हो जाते हैं अथवा संविधान पर भरोसा करके संविधान वादी हो जाते हैं,  

या सम्प्रदाय पर भरोसा करके सम्प्रदायवादी हो जाते हैं, या संसद पर भरोसा करके संसदवादी हो जाते हैं, या हथियार पर भरोसा करके उग्रवादी, आतंकवादी हो जाते हैं, नस्ल पर भरोसा करके नस्लवादी हो जाते हैं, दलितों पर भरोसा किया तो दलित वादी हो जाते हैं, पूँजीपतियों एवं उनके नेताओं पर भरोसा किया तो पूँजीवादी हो जाते हैं। सिर्फ कैडरों पर भरोसा हो जाए तो भी उग्र कार्यवाहियों में फंस कर अपना नुकसान कर डालते हैं।

*जनता ही क्रान्ति करती है।* इस लाईन से विचलन होते ही कोई क्रान्तिकारी किस गड्ढे में गिर कर पूँजीपतियों या सामंतों की गोद में पहुँच जायेगा, इसका अंदाजा लगाना कठिन है।

*जनता ही क्रान्ति करती है।* इस लाइन पर भरोसा होते ही हम जाति, धर्म, पंथ, रंग, लिंग, नस्ल, भाषा, क्षेत्र के नाम पर होने वाले झगड़ों से ऊपर उठ जाते हैं।

*जनता ही क्रान्ति करती है।* इस सच्चाई पर विस्वास होने से जाति, धर्म… आदि समूहों की ताकत से विस्वास खत्म होता जाता है। तब किसी जाति विशेष को रिझाने, पटाने के लिए किसी महापुरुष का झूठा महिमामण्डन करने की जरूरत नहीं महसूस होती। जयभीम लाल सलाम बोलकर दलितों का भावनात्मक शोषण करने की जरूरत नहीं पड़ती। किसी धर्म विशेष के तुष्टीकरण के लिए कभी पूजा करने तिलक लगाने या टोपी लगाने, मुल्ला या मुल्ली कहलवाने, महन्त या महन्तिनी बनने का ढोंग करने की जरूरत नहीं पड़ती।

*जनता ही क्रान्ति करती है।* इस लाईन पर भरोसा होते ही क्रान्तिकारी लोग जनता की ओर खिंचते चले जाते हैं, जनता से मिलने, जनता से सीखने, जो सीखा वहीं जनता को बताने की प्रक्रिया उनके व्यवहार में उतरने लगती है। और धीरे-धीरे एक समय आ जाता है जब जनता क्रान्तिकारी कार्यवाहियों के लिए तैयार हो जाती है। और शोषक वर्ग का तख्ता पलट देती है। क्रान्ति न तो कोई बदले की कार्यवाही है और ना ही कोई अपराध है, यह जनता का जन्मसिद्ध अधिकार है। परिस्थिति अनुकूल होने पर जनता अपने इस अधिकार का प्रयोग करती है। यह सामाजिक विकास के अवरोधों को हटा कर समाज को आगे ले जाने की अनिवार्य प्रक्रिया है।

*रजनीश भारती*

*जनवादी किसान सभा*

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