शशिकांत गुप्ते
राष्ट्रीय मुद्दा आटे का भाव लीटर में बताया गया। गलती से ज़बान से किलो की जगह लीटर निकल गया अगले ने तुरंत क्षमा याचना के साथ गलती को सुधार लिया।
जरासी गलती किलों जगह लीटर कह देने से बेतहाशा रफ्तार से बढ़ती महंगाई की समस्या गौण तो नहीं हो सकती है?
Slip of tongue मतलब ज़बान का फ़िसलना एक स्वाभाविक गलती है।
बहुत सी बार गलती से ‘ढ’ की जगह ‘ट’ अक्षर का प्रयोग हो जाता है। इन अक्षरों में आ की मात्रा लगने से अर्थ सिर्फ बदलता ही नहीं है। अनर्थ सूचक संदेश प्रकट होता है। प्रयोग करके देखो बेटी पढाव की जगह बेटी प….व बोल कर देखों?
गांधीजी ने कहा है गलती वो ही व्यक्ति करता है,जो सतत कर्मशील रहता है।
गलती स्वीकारना और गलती करते रहना दोनों में फर्क है।
मुँह से किलों की जगह लीटर निकलना क्षम्य गलती हो सकती है। लेकिन पंद्रहलाख रुपयों का जुमला देश की जनता के साथ सिर्फ मज़ाक ही नहीं है, जनता की भावनाओं से खिलवाड़ भी है?
जब एक व्यक्ति देश की बागडौर संभालता है तो कहा जाता है कि, फलाँ व्यक्ति है तो सब मुमकिन है।
यह वाक्य सुनते ही देश के सोलह करोड़ बेरोजगरों को रोजगार महैया होना क्यों मुमकिन नहीं हुआ यह प्रश्न स्वाभाविक ही कि,
एक अहम सवाल उपस्थित होता है क्या रुपये का लुढ़कना भी मुमकिन है?
इस मुद्दे पर स्मृति पटल पर सन 1982 में प्रदर्शित फ़िल्म नमक हलाल के गीत की कुछ पंक्तियाँ उभर आई। गीतकार अंजानजी रचित गीत की पंक्तियाँ प्रस्तुत है।
रुपया लुढ़कते हुए कहता है कि…
,अरे अरे अरे न न न न न न न
आज रपट जायें तो हमें ना उठाइयो,
आज फिसल जायें तो हमें ना उठाइयो
निम्न पंक्ति, खास पंक्ति है!
हमें जो उठाइयो तो खुद भी रपट जइयो
हॉ ख़ुद भी फिसल जाइयो
सीतारामजी ने सलाह दी इन पंक्तियों के साथ यह स्पष्टीकरण भी लिख दो कि जनप्रतिनिधियों की स्मृति मलिन हो सकती है लेकिन जनता सब जानती है।
सिलेन्ड्रा के नृत्य को जनता भूली नहीं है।
उक्त पंक्तियों का स्मरण इसलिए भी होता है। एक सरदारजी की असरदार अर्थनीति के कारण भारत की आर्थिक स्थिति विकसित कहलाने वाले देश के मुक़ाबले सुदृढ़ रही थी। तात्कालिक समय रुपये थोड़ा लुढ़का था, तो यह कहा गया कि, रुपया कमोजर होता है तो देश की साख कमजोर होती है।
इतिहास सब नोट करता है।
अब की बार?
जनता ने भावनावश ताली और थाली बजा चुकी है और दीपक भी जला चुकी है। महामारी से तो समयावधि के कारण निजात मिली लेकिन,कुपोषण,बेरोजगारी और महंगाई की विक्राल होती समस्या से कब छुटकारा मिलेगा?
अब तो ये अहम प्रश्न उपस्थित होता है कि, अमुक के बाद कौन? अब तो यह प्रश्न है ऐसा ही कबतक चलेगा?
एक पंक्ति बार बार याद आती है।
रात भर का है मेहमाँ अंधेरा
किस के रोके रुका है सवेरा
एक सूक्ति का भी बार बार ही स्मरण होता है।
अहंकार में तीनों गए बल, बुद्धि और वंश,
ना मानो तो देख लो कौरव, रावण और कंस
इतिहास साक्षी है।
जरा सी जबान क्या फिसली गौदी में बैठ कर थोथे आश्वासनों की लोरी सुनकर ताल से ताल मिलने वालें माध्यमों को ब्रेकिंग न्यूज के लिए मुद्दा मिल गया।
जवाब देने वालों को आपनी स्मृति के पन्ने पलटने में देर नहीं लगी।
लगभग चालीस बार फिसलती जबान से निकले उद्गारों को जवाब के रूप में प्रस्तुत करने में भी देर नहीं लगी।
मुख्य मुद्दा यह है कि मूलभूत समस्याओं पर कब बहस होगी।
समस्याएं हल होंगी या हल होने के लिए तारीख पे तारीख और तारीख पे तारीख बढ़ते जाएगी।
तारीख़ के चक्कर में बहुत से कहीं तवारीख (इतिहास) में जमा नहीं हो जाएं?
सकारात्मक सोच तो यही कहता है कि, परिवर्तन संसार का नियम तो अटल है।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

