जैसे-जैसे छँटनी और बेरोज़गारी के काले बादल भारत के आईटी सेक्टर व अर्थव्यवस्था के अन्य सेक्टरों पर मंडराते जा रहे हैं, वैसे-वैसे शासक वर्ग के लग्गू-भग्गू बुद्धिजीवी हमें यह समझाने में अपनी पूरी बौद्धिक ऊर्जा झोंक रहे हैं कि ऐसी गंभीर परिस्थिति के लिए मुख्य रूप से रोबोट और आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस की प्रौद्योगिकी जिम्मेदार हैं।
इसमें दो राय नहीं है कि artificial cognition, machine learning, internet of things, data driven decision-making, intelligent transportation systems जैसी तकनीकों में हाल में हुई पथप्रदर्शक खोजों में उत्पादन की प्रक्रिया में रूपांतरण की संभावना निहित है जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोग उत्पादन व्यवस्था से बाहर हो जाएंगे क्योंकि उनके कौशल की अब कोई ज़रूरत नहीं रह जाएगी।
परन्तु यथार्थ के इस पहलू पर ज़ोर देते समय अक्सर यह सच्चाई पर्दे के पीछे छिपा दी जाती है कि ऐसा केवल पूँजीवादी उत्पादन संबंधों के तहत होता है कि ऑटोमेशन की वजह से लोगों की आजीविका ख़तरे में पड़ जाती है। इसलिए ऑटोमेशन पर दोष मढ़ने की बजाय हमारे निशाने पर पूँजीवादी व्यवस्था होनी चाहिए।
पूँजीवाद के न होने की परिस्थिति में रोबोटिक्स और आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में हुई तकनीकी प्रगति से काम के घंटे कम हो जाएंगे और लोगों का जीवन और उनकी आजीविका कठिन होने की बजाय पहले से सुगम हो जाएगा।
मार्क्स ने पूँजी में शानदार ढंग से यह दिखाया था कि ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की चाहत पूँजीपतियों को नई तकनीकों व प्रौद्योगिकी में निवेश करने पर मजबूर करती है क्योंकि काम के घंटे बढ़ाकर या काम की तीव्रता तेज़ करके मुनाफ़ा बढ़ाने की अपनी एक सीमा होती है।
नई प्रौद्योगिकी में निवेश करने से उत्पादकता में बढ़ोतरी होती और थोड़े समय के लिए मुनाफ़े में भी वृद्धि होती है। इस प्रकार पूँजीपतियों की स्थिर पूँजी (मशीनरी, तकनीक, कच्चा माल आदि) परिवर्तनशील पूँजी (श्रमशक्ति) की तुलना में में बढ़ जाती है जिसकी वजह से पूँजी का जैविक संघटन (स्थिर पूँजी व परिवर्तनशील पूँजी का अनुपात) बढ़ जाता है। श्रम की तुलना में पूँजी के पक्ष में आए इस झुकाव का अन्तरविरोधी परिणाम दीर्घावधि में मुनाफ़े की दर में आई कमी के रूप में सामने आता है क्योंकि श्रमशक्ति ही मूल्य का स्रोत होती है। मार्क्स ने इसे मुनाफ़े की दर में होने वाली कमी की प्रवृत्ति की संज्ञा दी थी जो पूँजीवाद में अन्तर्निहित होती है।
इस पृष्ठभूमि के बाद भारत में आईटी सेक्टर के संकट को आसानी से समझा जा सकता है। यह एक खुला रहस्य है कि आईटी सुपरपावर होने के लंबे-चौड़े वायदों के बावजूद असलियत यह है कि भारत की आईटी कंपनियों ने शोध व अनुसंधान की बजाय छुटभैया स्तर की आई टी सेवाओं में विशेषज्ञता हासिल की है। भारत में आईटी सेक्टर ने बीसवीं सदी के अंतिम दशक में Y2K, इंटरनेट, ई-कॉमर्स आदि की वजह से विश्व अर्थव्यवस्था में सस्ते आईटी इंजीनियरों की माँग का लाभ उठाते हुए ज़बर्दस्त मुनाफ़ा पीटा। भारत की तमाम आईटी कंपनियाँ अपना मुनाफ़ा बॉडी शॉपिंग करके कमाती आई हैं।
आईटी इंजीनियरों की भूमिका भी पूँजीवाद की वैश्विक प्रणाली में उजरती मज़दूर की ही है और उनका भी भयंकर शोषण होता है। सच तो यह है 150 अरब डॉलर वाला आईटी उद्योग मुख्य तौर पर इन आईटी इंजीनियरों के अधिशेष निचोड़ने पर ही टिका है। हालाँकि चूँकि उनकी मज़दूरी और काम की परिस्थितियाँ भारत के औसत मज़दूर के तुलना में बहुत अच्छी होती है, इसलिए *वे आम तौर पर खुद को मज़दूर मानने से कतराते रहे हैं और उनमें से अधिकांश तो पूँजीवाद का समर्थन व बचाव करते नज़र आते हैं। लेकिन 2008 से जारी विश्वव्यापी आर्थिक संकट के बाद से परिस्थितियाँ बदलने लगी हैं। विकसित पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं में आई मंदी का भारत के आईटी उद्योग पर बहुत बुरा असर हुआ है जोकि मुख्य तौर पर उन अर्थव्यवस्थाओं पर ही निर्भर रहा है।
इसकी वजह से आईटी कर्मचारियों के जीवन में तनाव बढ़ा है क्योंकि उनकी नौकरी की असुरक्षा, काम के घंटे में बढ़ोतरी हुई है (आईटी इंजीनियरों को 10-12 घंटे खटना पड़ता और कई बार तो इससे भी ज़्यादा)। इसके अलावा एजाइल जैसी सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट की पद्धतियों की वजह से भी उन पर काम का बोझ बहुत बढ़ा है।
मानो यह सब कुछ काफ़ी न था कि अब आईटी इंजीनियरों के सामने रोबोटिक्स और आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस का हौव्वा खड़ा किया जा रहा है। यह निश्चित रूप से आर्थिक संकट के इस दौर में दुनिया भर के पूँजीपतियों की बदहवासी को दिखा रहा है जो इन तकनीकों की मदद से अपने मुनाफ़े को बरकरार रखना चाह रहे हैं। लेकिन जैसा कि मुनाफ़े की दर में गिरावट की प्रवृत्ति के नियम से स्पष्ट है, इससे पूँजीवाद का संकट कम होने की बजाय बढ़ने ही वाला है। निश्चित रूप से दुनिया भर के मज़दूरों को (जिसमें आईटी के मज़दूर भी शामिल हैं) पूँजी के इस हालिया हमले के ख़िलाफ़ एकजुट होकर अपनी नौकरी की सुरक्षा की मांग उठाने की ज़रूरत है। लेकिन यह ध्यान में रखना होगा कि जब तक कि उत्पादन के साधनों पर समाज के मुट्ठी भर परजीवियों का क़ब्ज़ा है, प्रौद्योगिकी में आई किसी भी प्रगति का लाभ मुख्य तौर पर समाज की बहुत छोटी सी आबादी को होगा, जबकि समाज की बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी की ज़िन्दगी की तकलीफ़ें बढ़ती ही जाएंगी।
इसलिए मेहनतकश आबादी को एकजुट होकर इस शोषणकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंककर एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण की ज़रूरत है जिसमें तकनीक व प्रौद्योगिकी में आई किसी भी प्रगति से लोगों के काम करने के घंटों में कमी आएगी और उनके व्यक्तित्व के तमाम रचनात्मक पहलुओं के विस्तार को सक्षम बनाने की ज़मीन तैयार होगी।

