पुष्पा गुप्ता
म्यांमार (बर्मा) में दो साल पहले हुए आम चुनाव के नतीजों को ताक पर रखकर सत्ता में आए फौजी गिरोह ने पिछले दिनों एक गांव में जुटी भीड़ पर पहले हवाई जहाज से दो बम गिराए, फिर हेलिकॉप्टरों से गोलीबारी कर दी। इस बर्बर हमले में सौ से ज्यादा लोग मारे गए, जिनमें सोलह बच्चे भी शामिल हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक मौतों की संख्या सटीक नहीं है, क्योंकि कई मृत शरीरों के टुकड़े दूर-दूर तक बिखर गए हैं। पिछले दो महीनों में बर्मा के उत्तर-पश्चिमी प्रांत सगाइंग में फौजी जनसंहार की यह तीसरी घटना है।
यह बर्मी प्रांत भारत के तीन राज्यों मणिपुर, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश से सटा हुआ है। इस बार का हमला सगाइंग के कनबालू जिले में हुआ है, जिसके पाजिग्यी गांव में लोग बर्मा की निर्वासित सरकार के कार्यालय का उद्घाटन देखने आए थे। हमारे बिल्कुल पड़ोस में मौजूद यह मुल्क, जो प्रशासनिक दृष्टि से 1935 तक भारत का हिस्सा हुआ करता था, पिछले तीन दशकों में एक ऐतिहासिक विडंबना का नमूना बनकर रह गया है। हम इसे बर्मा के रूप में जानते हैं और इसका यही नाम इतिहास में चला आ रहा है। म्यांमार नाम इसे अपनी जागीर समझने वाले फौजी शासकों का दिया हुआ है।
पिछले तीस वर्षों में हुए तीन आम चुनावों में लोगों ने जमकर वोट डाले हैं और हर बार तीन चौथाई से ज्यादा बहुमत आंग सान सू की के नेतृत्व वाली नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी को हासिल हुआ है। लेकिन फौजी जनरलों का एक गुट सत्ता छोड़ने को राजी नहीं होता, सरकार को अपने डंडे से हांकता है और निर्वाचित प्रतिनिधियों को जेल में डाल देता है।
आम जनता की भूमिका इस दुष्चक्र का तमाशा देखने तक सीमित नहीं है। लोग सड़कों पर उतरते हैं, बौद्ध भिक्षु तक आगे बढ़कर सीने पर गोलियां खाते हैं, लेकिन देश पर फौज की पकड़ फिर भी ढीली नहीं पड़ती।
पिछला आम चुनाव 2020 में हुआ था। कोरोना की पहली लहर के तुरंत बाद हुए इस चुनाव में कुल 476 में से 396 सीटें एनएलडी ने जीती थीं। लेकिन उसकी सरकार बनने से पहले ही फौज ने शुरू में महामारी से सुरक्षा के नाम पर लोगों को घर में बंद किया, फिर फरवरी 2021 में चुनावी गड़बड़ी का आरोप लगाकर चुनाव नतीजे रद्द घोषित कर दिए और देश में मार्शल लॉ लागू कर दिया।
अलबत्ता इस बार मामले ने एक अप्रत्याशित मोड़ भी लिया। निर्वाचित प्रतिनिधियों में से कुछ देश छोड़कर बाहर चले गए और इंटरनेट के जरिये आपस में संपर्क रखते हुए ‘नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट’ नाम से निर्वासित सरकार की घोषणा कर दी।
कुल 17 निर्वाचित प्रतिनिधियों को लेकर गठित इस सरकार में चार मंत्री हैं, जो विदेश, वित्त, रक्षा आदि नौ विभागों के जरिये अपनी प्रतीकात्मक नीतियां लागू करते हैं। शांतिपूर्ण प्रतिरोध के बार-बार कुचल दिए जाने का नतीजा यह है कि नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट ने मिलिट्री जुंटा का सशस्त्र प्रतिरोध करने का फैसला किया है और उसके इस फैसले को जमीनी समर्थन भी हासिल हो रहा है।
राष्ट्रीय सेना को छोड़कर प्रतिरोधी सेना में शामिल होने पर मृत्युदंड की घोषणा फौजी शासन द्वारा की गई है। इसके बावजूद एक ब्रिगेडियर समेत 1500 सैनिकों ने अभी तक नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट की बागी फौज पीपुल्स डेमोक्रेटिक फोर्स (पीडीएफ) से जुड़ने का फैसला किया है।
स्थितियां खुले तौर पर गृहयुद्ध जैसी बन रही हैं, लेकिन मिलिट्री जुंटा की ओर से जिन हमलों की सूचना अबतक सामने आई है, वे पीडीएफ के हथियारबंद दस्तों के खिलाफ नहीं, लोकतंत्र के लिए किसी शहर में सड़क पर उतरे या किसी गांव में जुटे आम लोगों पर किए गए हैं।
कुछ समय पहले तक ऐसा लग रहा था कि दुनिया का कूटनीतिक दबाव रंग लाएगा और हर तरफ से अलग-थलग पड़ते जा रहे बर्मा के फौजी शासकों को एक दिन लोकतंत्र को स्वीकार करने भर की अक्ल आ जाएगी। कोरोना का हल्ला शुरू होने से पहले तक यह धारणा सच साबित होती लग रही थी।
2016 में हुए आम चुनाव से निकली सरकार के हाथ-पांव बांधकर ही सही, लेकिन चार साल का कार्यकाल उन्होंने पूरा कर लेने दिया। लेकिन इस बीच कुछ काम उन्होंने ऐसे किए जिनसे खेल पलटने लगा। फिर महामारी ने पुराने ढर्रे पर लौटने का मौका उन्हें दे दिया। बर्मा में 68 प्रतिशत आबादी बामर जाति की है जो धर्म से बौद्ध है।
अल्पसंख्यक जातियों और धर्मों के लोग बर्मा को तोड़ डालेंगे या इसकी सत्ता पर कब्जा कर लेंगे, यह बहाना शुरू से यहां फौजी शासकों की मदद करता आया है। 2016 के आम चुनाव में नतीजे फौजी शासन को लेकर नरम रुख रखने वाले दलों के बिल्कुल खिलाफ जाने के बाद जनरलों ने पहला काम रोहिंगिया का मुद्दा खड़ा करने के रूप में किया, जिसमें दुर्भाग्यवश कुछ बौद्ध भिक्षुओं का समर्थन भी उन्हें प्राप्त हुआ।
बर्मा के रखाइन प्रांत में रोहिंगिया जाति के 14 लाख मुसलमान रहते हैं। उन्हें बाहरी और आतंकी घोषित करके 2017 में उनके खिलाफ ऐसा कत्लेआम मचाया गया कि आधे से ज्यादा रोहिंगिया अपनी जमीन छोड़कर भाग गए। इनमें कुछ भारत चले आए हैं और बाकी नारकीय स्थितियों में बांग्लादेश में रह रहे हैं।
बर्मी फौज की इस शातिर चाल का कूटनीतिक नुकसान वहां लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई एनएलडी सरकार को उठाना पड़ा। दूसरा कदम चीन से रिश्ते मजबूत करने का था, जिसकी पहल फौज की ओर से ही हुई लेकिन पूंजी की किल्लत को देखते हुए सरकार के पास भी इसके लिए हामी भरने के सिवा कोई रास्ता नहीं था।
नतीजा यह कि हिंद महासागर तक सीधे पहुंचने का रास्ता पाकिस्तान में बनाने में जुटे चीन के लिए बर्मा में यह रास्ता बिना किसी मशक्कत के खुल गया। अभी खाड़ी देशों से अपना अच्छा-खासा तेल आयात वह इसी रास्ते से कर रहा है और इसकी सुरक्षा के नाम पर अंडमान के बहुत करीब स्थित एक बर्मी द्वीप पर अपना फौजी अड्डा भी बना रहा है।
भारत के लिए इससे धर्मसंकट यह खड़ा हो गया है कि आंग सान सू की और उनके लोकतांत्रिक संघर्ष के पक्ष में लगातार खड़ा रहने के बावजूद बर्मा के मिलिट्री जुंटा के खिलाफ बोलने की उसकी स्थिति नहीं रह गई है।
चीन ने बर्मा के रास्ते बंगाल की खाड़ी में अपनी स्थिति पहले ही मजबूत कर रखी है, कम से कम बर्मी फौज को यह बहाना तो न मिले कि ‘भारतीय दबाव’ का मुकाबला करने के लिए उसे चीन से अपने रिश्तों की रफ्तार बढ़ानी पड़ रही है! अभी सत्ता पर कब्जे के बाद चीन की तरफ से उसे सीधा अभयदान मिल गया है। बाहरी दबाव थोड़ा-बहुत अमेरिका और आसियान देशों की ओर से ही बन सकता है, लेकिन जैसी असुरक्षा ने अभी विश्व अर्थव्यवस्था को घेर रखा है, उसमें कोई भी देश वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए अपना चवन्नी का भी हर्जा बर्दाश्त नहीं करना चाहता।
ऐसे में बर्मा की लोकतांत्रिक शक्तियों के सामने गृहयुद्ध में जाने के सिवा कोई रास्ता ही नहीं बचा है, जो सचमुच दुखद स्थिति है।

