~ डॉ. विकास मानव
‘मन् ज्ञाने’ धातु से ‘मन’ शब्द निर्मित है। ‘मन्यते ज्ञायते अनेन इति’ अर्थात् जिसके द्वारा ज्ञान होता है वह मन है। मन के संयोग से ही इन्द्रियाँ विषय ग्रहण करने में समर्थ होती है। मन उस विषय को इन्द्रियों से बुद्धि तक पहुँचाता है अर्थात् ज्ञान कराता है। ठीक इसी प्रकार बुद्धि के निर्णयों को मन इन्द्रियों तक पहुंचाकर ज्ञानेन्द्रियों को विषय ग्रहण करने में और कर्मेन्द्रियों को कर्म करने में प्रवृत्त कराता है।
इन्द्रियेणेन्द्रियार्थो हि समनस्केन गृह्यते।
कल्पते मनसा तूर्ध्वं गुणतो दोषतोऽथवा।।
जायते विषये तत्र या वृद्धिर्निश्चयात्मिका।
व्यवस्यति तया वक्तुं कर्तुं वा बुद्धिपूर्वकम् ।।
(चरक संहिता : 1/22-33)
इस प्रकार समस्त शरीर व्यापार मन पर आश्रित है। भारतीय दर्शन मन के तीन गुण मानता है :
- सत्त्व
- रज
- तम
यद्यपि मन सत्त्वगुण प्रधान होता है किन्तु उसका निर्माण इन तीनों ही गुणों से होता है इसीलिए प्रत्येक प्राणी में इन तीनों गुणों के लक्षण एवं प्रवृत्तियाँ न्यूनाधिक रूप में मिलती है। किसी व्यक्ति में सत्त्व की, तो किसी व्यक्ति में रज की, तो किसी में तम की प्रवृत्तियाँ अधिक होती हैं।
आचार्य सुश्रुत ने इन गुणों के कारण मन की भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियाँ वर्णित की है : - सत्त्व—दया, दान, क्षमा, धर्म, सत्य, आस्तिकता, बुद्धि, मेधा, स्मृति, धृति, अनाशक्ति, वचन-पालन।
- रज – दुःखाधिक्य, भ्रमणशीलता, अधीरता, अहंकार, असत्य भाषण, क्रूरता, दम्भ, मान, हर्ष, काम और क्रोध।
- तम – मानसिक उद्विग्नता, नास्तिकता, अधर्म की ओर प्रवृत्ति, बुद्धि का विरोध, अज्ञान, मूढ़ता, आलस्य और निष्ठा।
इन गुणों के आधार पर क्रमशः मन की सात्त्विक, राजस, तामस संज्ञाएँ भी की गयी हैं। सत्त्व, रज, तम ये तीनों भिन्न-भिन्न स्वभाव के होते हुए भी एक-दूसरे के सहयोग से निरन्तर क्रियाशील रहते हैं। देवीभागवत के अनुसार इन गुणों का दीपक जैसा स्वभाव है। तैल, बाती, अग्नि तीनों विरुद्धधर्मी हैं फिर भी तीनों मिलकर प्रकाश फैला- कर वस्तुओं को दिखाते है।
विरुद्धधर्मा तैल का अग्नि से पुनः विरुद्धधर्मा बाती संयोग कराती है और ये तीनों एकत्र हो वस्तुओं को प्रकाशित करने लगते है। ऐसे ही इन गुणो की क्रिया होती है। (देवीभागवत : 118).
मनोभावनाएँ :
मन के ज्ञान व्यापार के बाद निश्चित रूप से कुछ भावनाएँ उत्पन्न होती है। इन भावनाओं का विस्तृत वर्णन दर्शन-ग्रन्थों तथा आयुर्वेद में उपलब्ध नहीं है, परन्तु सुख, दुःख, राग, द्वेष को आत्मा का गुण स्वीकार किया गया है।
मन की क्रिया आत्मा के द्वारा होती है, परन्तु व्यवहार में उसे मन के ऊपर आरोपित कर दिया जाता है। मन में किस प्रकार की भावनाएँ उत्पन्न होंगी, यह बाह्य उत्तेजक के प्रकार पर निर्भर करता है।
प्रत्येक अनुभव के बाद संवेदना की उत्पत्ति होती है जिसे भावना कहते है। भावनाएँ असंख्य है.
स्थूल रूप से हम उन्हें दो भागों में विभक्त कर सकते हैं :
- सुख की भावनाएँ
- दुःख की भावनाएँ ।
इन्हें पुनः दो भागों में विभक्त किया जा सकता है : - संवेदी भावनाएँ: इन्द्रिय एवं अर्थ के सन्निकर्ष से।
- आन्तरिक भावनाएँ : संकल्प एवं स्मृति द्वारा।
इसे ही चरकसंहिताकार ने मानस स्पर्श संज्ञा दी है।
स्पर्शनन्द्रियसंस्पर्शः स्पर्शो मानस एव च।
द्विविधः सुखदुःखानां वेदनानां प्रवर्तकः।।
(चरक संहिता : 1/133)
मनोभाव :
भावनाओं और भावों में कोई अन्तर नहीं है। भाव तीव्र स्वरूप की भावनाएँ ही हैं। दोनों में अन्तर मात्रा का है। भाव की तरंगों का प्रभाव केवल मन पर न होकर शरीर पर भी होता है। यह ज्ञान प्रधान व्यापार के बाद तथा चेष्टा-प्रधान व्यापार के पूर्व होता है।
आचार्यों ने ज्ञान के साधनों को दो प्रमुख विभागों में विभक्त किया है :
- बाह्यकरण।
- अन्तःकरण। बाह्यकरण :
यह शरीर से बाहर स्थित अर्थों की ग्रहण प्रक्रिया है, जिसमें आत्मा, मन, इन्द्रिय एवं इन्द्रियार्थ के संयोग का फलितार्थ हैं।
आत्मा मनसा संयुज्यते मन इन्द्रियेण इन्द्रिय अर्थेन तत् ज्ञानम्।
आयुर्वेद वर्णित ज्ञान की उत्पत्ति प्रक्रिया में ऊर्ध्वस्थ (शिरःस्थ) चेतना केन्द्र से इन्द्रिय स्थान तक या सूक्ष्म से स्थूल की ओर गत्यात्मकता है। पुनः इन्द्रियार्थ इसी मार्ग से शिरःस्थ केन्द्रों तक जाता है; यह स्थूल से सूक्ष्म की ओर गत्यात्मकता है।
इस प्रक्रिया में शरीर से पृथक् स्थित बाह्य पदार्थ के ज्ञान कराने में प्रमुखतः कुछ बाहरी साधन और गौणतः कुछ भीतरी साधन भी प्रयुक्त हुए हैं। किन्तु यह ज्ञान मूलतः शरीर में बाह्य स्थित साधनों (करणों) अर्थात् इन्द्रियों पर आधारित रहता है, इसीलिए इन्हें बाह्यकरण की संज्ञा दी गयी है।
ये संख्या में पाँच है। तात्पर्य यह है कि शरीर के बाहरी हिस्से में स्थित ज्ञान के साधन (इन्द्रियाँ) बाह्यकरण है। कुछ आचार्य कर्मेन्द्रियों को भी बाह्यकरण में परिगणित कर उनकी संख्या दश मानते हैं। बाह्यकरणों से मात्र वर्तमान का ज्ञान होता है, जबकि अन्तःकरण त्रिकाल ज्ञान के साधन हैं।
अन्तःकरणं त्रिविधं दशधा बाह्यं त्रयस्य विषयाख्यम्।
साम्प्रतकालं बाह्यं त्रिकालमाभ्यन्तरं करणम्।। अन्तःकरण :
अन्तःकरण किसी भी ज्ञान के लिए जब शरीर के अन्दर स्थित साधनों (करणों) का मात्र प्रयोग होता है तथा जिसमें बाह्य साधनों (करणों) की कोई भूमिका नहीं रहती, इस प्रक्रिया को सम्पन्न कराने वाले प्रमुख तत्त्व को अन्तःकरण संज्ञा दी गयी है।
मन, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार- ये चार अन्तःकरण हैं।
आयुर्वेदशास्त्र में भी अन्तःकरण एवं बाह्यकरण का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मूर्च्छा की सम्प्राप्ति में कहा गया है कि उग्र दोष जब बाह्य एवं अन्तःकरणों के आयतन (स्थान) में प्रविष्ट होते हैं तब मनुष्य मूर्च्छित होता है।
करणायतनेषूया बाह्येष्वाभ्यन्तरेषु च।
निविशन्ते यदा दोषास्तदा मूर्च्छन्ति मानवाः।।
आत्मा के ज्ञान सम्बन्धी प्रश्न के उत्तर में चरक के शारीरस्थान के प्रथम अध्याय में स्पष्ट कहा गया है कि आत्मा ज्ञानी है। किन्तु ‘करणों’ के संयोग से उसे ज्ञान होता है और यदि ज्ञानकरण मलिन है अथवा उसका परस्पर योग नहीं है तो ज्ञान नहीं होता है :
आत्मा ज्ञः करणैयोंगाज्ज्ञानं त्वस्य प्रवर्तते।
करणानामवैमल्यादयोगाद्वा न वर्तते।।
(च. सं. 1/54)
इस विषय को उदाहरण देते हुए आचार्य स्पष्ट करते हैं कि जिस प्रकार मध्यमा अंगुलि, अंगुष्ठ और करतल संयोग से चुटकी बजती है या तार, वीणा और नख के संयोग से शब्द (स्वर) निकलते है उसी प्रकार आत्मा, मन, इन्द्रिय और विषयों के संयोग से अनेक प्रकार का ज्ञान होता है : अङ्गुल्यङ्गुष्ठतलजस्तन्त्रीवीणानखोद्भवः।
दृष्टः शब्दो यथा बुद्धिर्दृष्टा संयोगजा तथा।।
(च.सं. 1/34)
अन्तःकरण चतुष्टय में पृथक् मन और चित्त का उल्लेख इनकी भित्रता सिद्ध करने में पर्याप्त है। कार्य की दृष्टि से शास्त्रीय आधार पर विचार करें तो मन का ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान कराना प्रमुख कार्य है, जबकि चित्त का कार्य तर्क पर आधारित ऊहापोहात्मक चिन्तन करना है।
यह भी भिन्नता पोषक तथ्य है। अतः मन और बुद्धि के बीच चित्त का कार्य माना जाना चाहिए। मन द्वारा गृहीत विषय पर ऊहापोहात्मक चिन्तन कर पक्ष-विपक्ष के सभी तथ्यों को बुद्धि की ओर अग्रेषित कर देना चित्त का प्राकृत कार्य है।
इस क्रम में अहंकार की भूमिका यह होती है कि यह विषय ‘मेरे लिये’ अनुकूल या प्रतिकूल, लाभकर या हानिकर है। ‘मेरे लिये’ परक चिन्तन अहंकार संयोग से सम्भव होता है।

