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स्त्री की भूमिकाएँ और पुरुष की अपेक्षाएँ

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      सोनी कुमारी, वाराणसी

समाज में स्त्री की भूमिका को लेकर धारणाएँ लंबे समय से बनती और बदलती रही हैं। आधुनिक युग में, स्त्री केवल घर की चारदीवारी में सीमित नहीं रही, बल्कि उसने हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। फिर भी, जब बात एक जीवनसाथी चुनने की होती है, तो समाज की अपेक्षाएँ आज भी कई बार विरोधाभासों से भरी होती हैं।

     एक ओर, यदि कोई पुरुष कार्यरत स्त्री को जीवनसाथी चुनता है, तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह नौकरी भी करे और घर को भी उसी कुशलता से संभाले। 

    लेकिन सच्चाई यह है कि पूर्णकालिक कार्य करने वाली स्त्री के लिए घर के हर छोटे-बड़े काम को अकेले संभालना यथार्थवादी नहीं होता। ऐसी स्थिति में यह जरूरी हो जाता है कि साथी मिल-बांट कर जिम्मेदारियाँ निभाएँ।

     दूसरी ओर, यदि कोई पुरुष गृहिणी को चुनता है, जो घर-परिवार की देखभाल को प्राथमिकता देती है, तो उसे यह भी स्वीकार करना होगा कि वह आर्थिक रूप से योगदान नहीं दे रही। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उसका योगदान कमतर है परिवार की स्थिरता और भावनात्मक संतुलन में उसका योगदान अमूल्य होता है।

      यदि कोई पुरुष आज्ञाकारी स्वभाव की स्त्री को चुनता है, जो उसकी बातों को प्राथमिकता देती है, तो उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि वह स्त्री उस पर निर्भर है भावनात्मक, सामाजिक और शायद आर्थिक रूप से भी।

      ऐसे में उसका दायित्व दोगुना हो जाता है, क्योंकि अब वह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक पूरे जीवन का संबल बनता है।

     यदि कोई मजबूत और स्वतंत्र विचारों वाली स्त्री जीवन में आती है, तो यह मानकर चलना होगा कि उसके अपने विचार, सिद्धांत और निर्णय होंगे। वह जीवन में बराबरी चाहती है, न कि अधीनता। 

     उसका आत्मबल ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति होती है, और यह पुरुष के अहंकार को चुनौती नहीं, बल्कि प्रेरणा देनी चाहिए।

      जब कोई व्यक्ति सुंदर स्त्री को चुनता है, तो उसके पीछे अक्सर सामाजिक प्रतिष्ठा, आकर्षण या भौतिक अपेक्षाएँ होती हैं। 

    लेकिन सुंदरता केवल देखने भर की चीज नहीं उसके साथ आती हैं अपेक्षाएँ, देखभाल, और कभी-कभी खर्च भी, जो केवल आर्थिक नहीं बल्कि मानसिक भी हो सकते हैं।

      यदि कोई सफल स्त्री जीवन में प्रवेश करती हैचाहे वह करियर में हो, या सामाजिक पहचान में तो उसके अपने लक्ष्य, प्राथमिकताएँ और जीवनशैली होती है।

      ऐसे में उसे सीमाओं में बांधना या अपनी इच्छाओं के अनुसार ढालना अनुचित है। उसका आत्मबल, महत्वाकांक्षा और दृष्टिकोण उसे उसी रूप में स्वीकार करने की मांग करता है।

    परफेक्ट जैसी कोई चीज़ नहीं होती। हर स्त्री अपने आप में एक अनूठा व्यक्तित्व लिए होती है कुछ गुणों के साथ, कुछ सीमाओं के साथ। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब लोग हर स्त्री से एक साथ सब कुछ बनने की उम्मीद करते हैं: वह काम भी करे, घर भी संभाले, आज्ञाकारी भी हो, आत्मनिर्भर भी, सुंदर भी हो और खर्च भी न करे, सफल भी हो और पूरी तरह उपलब्ध भी : यह असंभव है।

    पुरुष को यह स्वीकार करना होगा कि हर भूमिका के साथ कुछ स्वाभाविक सीमाएँ और अपेक्षाएँ आती हैं। स्त्री कोई आदर्श उत्पाद नहीं, जो हर पैमाने पर फिट बैठे। वह एक इंसान है अपने सपनों, सीमाओं, कमियों और विशेषताओं के साथ।

    इसलिए यदि पुरुष सच में एक संतुलित, सशक्त और संवेदनशील समाज बनाना चाहते हैं, तो स्त्रियों को उनके स्वरूप में स्वीकार करना होगा  उन्हें गढ़ने की नहीं, समझने की कोशिश करनी होगी।

    सच्चा रिश्ता वही है जहाँ दोनों एक-दूसरे की खूबियों के साथ कमियों को भी अपनाते हैं न कि आदर्श की खोज में जीवन भर समझौते करते रहते हैं।

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