, मुनेश त्यागी
पिछले दिनों भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राज्यसभा को बताया है कि बैंकों ने पूंजीपतियों को दिए गए दस लाख करोड़ रुपए बट्टे खाते में डाल दिए हैं। पता चला है कि भारत के बड़े पूंजीपतियों ने बैंकों से कर्ज उधार लिया और अब लोन को वापस करने में आनाकानी कर रहे हैं जिस कारण बैंकों को दस लाख करोड़ रुपए बट्टे खाते में डालने पड़े हैं।
इस प्रकार हम देख रहे हैं कि हमारे देश के बैंक देश के बड़े-बड़े पूंजीपतियों को बहुत बड़ी धनराशि कर्ज में देते हैं और फिर ये पूंजीपति कर्ज लेकर इस कर्ज को बैंक को वापस नहीं लौटा दे और मामला मिलीभगत के साथ रफा-दफा कर दिया जाता है।
एक तरफ तो सरकार कह रही है कि उसके पास पुरानी पेंशन बहाली के लिए पैसा नहीं है इस प्रकार करोड़ों सरकारी कर्मचारियों को उनके बुढ़ापे के सहारे पेंशन से वंचित कर दिया गया है। सरकार कह रही है कि उसके पास अस्पतालों में पैसा लगाने के लिए नहीं है, नए अस्पताल बनवाने के लिए पैसा नहीं है और सरकार की इस अकर्मण्यता ने इस देश के करोड़ों लोगों को निजी अस्पताल मालिकों द्वारा लुटने पिटने के लिए छोड़ दिया गया है।
सरकार कह रही है कि उसके पास नए स्कूल बनाने के लिए, नए विश्वविद्यालय बनाने के लिए और शिक्षकों को वेतन देने के लिए पैसा नहीं है ना तो सरकार नये स्कूल और कॉलेज बनवा रही है और ना ही शिक्षकों की नियुक्ति कर रही है इस प्रकार देश के करोड़ों बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में के हवाले कर दिया गया है जहां उनकी विभिन्न प्रकार से लुटाई पिटाई की जा रही है।
सरकार कहती है कि उसके पास नए अदालत बनाने के लिए पैसे नहीं है, जज नियुक्त करने के लिए पैसे नहीं है, हजारों में कर्मचारी नियुक्त करने के लिए पैसे नहीं है, जिस कारण करोड़ों वादकारियों को अदालतों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं और उनके हिस्से में सिर्फ अन्याय आ रहा है। सरकार की नीतियों के कारण हमारे देश में पांच करोड़ से ज्यादा मुकदमें अदालतों में पेंडिंग है।
सुप्रीम कोर्ट में पर्याप्त संख्या में जज नहीं है, हाई कोर्ट में पर्याप्त संख्या में जज नहीं है और निचली अदालतों में 25% से ज्यादा पद खाली पड़े हुए हैं और अदालतों में काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों के 90% पद खाली पड़े हुए हैं जजों के पास कई साल से स्टेनो नहीं है जिस कारण जज लोग फैसले नहीं लिख पा रहे हैं और जनता को न्याय का शिकार होना पड़ रहा है।
सरकार के पास फौज को वन रैंक वन पेंशन देने के लिए पैसा नहीं है इस प्रकार लाखों फौजियों को अन्याय का सामना करना पड़ रहा है सरकार के पास किसानों को फसलों का वाजिब दाम देने के लिए पैसा नहीं है जिस कारण किसानों की अनाप-शनाप लुटाई हो रही है और उन्हें बहुत बडे स्तर पर न्याय का सामना करना पड़ रहा है और उन्हें आजादी मिलने के बाद से आज तक भी फसलों का वाजिब दाम नहीं दिया जा रहा है।
हमारे देश में करोड़ों नौजवान बेरोजगार हैं। सरकार के पास बेरोजगारों को काम देने के लिए मैं उद्योग धंधे स्थापित करने के लिए पैसा नहीं है।बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता देने के लिए पैसा नहीं है। इस प्रकार हमारे देश की नौजवानी बेरोजगार घूम रही है और इनके माता-पिता को भयंकर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
हमारे देश में लगभग 30 करोड लोग वृद्ध हैं, बुजुर्ग हैं। सरकार के पास उनको वृद्धावस्था पेंशन देने के लिए पैसा नहीं है और ये लोग विषम परिस्थितियों में अपना बुढ़ापा काटने को मजबूर हैं जिनके पास खाने-पीने, कपड़े और दवाई का माकूल पैसा नहीं है।
रेल और सरकारी बसों को खरीदने के लिए सरकार के पास पैसा नहीं है। हम देख रहे हैं कि सड़कों पर नई बसें नहीं लगाई जा रही हैं, नई रेलगाड़ियां नहीं बनाई जा रही हैं, नई पटरियां नहीं बिछाई जा रही है जिस कारण पर्याप्त संख्या में डिब्बे और सीट में होने के कारण यात्रियों को जानवरों की भाति डिब्बों में ठूंस कर ले जाया जाता है। सरकार का कहना है कि उसके पास नई रेल पटरी बिछाने और नई बसें खरीदने के लिए पैसा नहीं है। सरकारी सड़कों की मरम्मत के लिए सरकार के पास पैसे नहीं है जिस कारण प्रतिवर्ष गड्ढा युक्त सड़कों के कारण लाखों लोग हादसों में मारे जाते हैं।
नये सरकारी बैंक और पोस्ट ऑफिस बनाने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं जिस कारण करोड़ों लोगों को दूर दूर तक जाना पड़ता है, घंटो घंटो लाइन में लगे रहना पड़ता है और छोटे काम छोटे-छोटे कामों के लिए कई बार चक्कर लगाने पड़ते हैं। इन बैंकों और पोस्ट ऑफिस में काम करने के लिए पर्याप्त संख्या में कर्मचारी नहीं है।
तो इस प्रकार हम देख रहे हैं कि एक ओर तो सरकार के पास जनता की बुनियादी समस्याओं का समाधान करने के लिए स्कूल, और अस्पताल बनाने के लिए पैसे नहीं है, कर्मचारी नियुक्त करने के लिए पैसे नहीं हैं, फौजियों को वन रैंक वन पेंशन नही दी जा रही है। वहीं दूसरी ओर पूंजीपतियों ने जो पैसा बैंकों से उधार लिया है उन पूंजी पतियों की एक बड़ी संख्या जनता के इस धन को बैंकों को लौटाने को तैयार नहीं है और सरकार और बैंकों ने एक मिली जुली साजिश के तहत इस पैसे को बट्टे खाते में डाल दिया है।
आखिर यह पैसा किसका है? हमारे देश की जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है। यह पैसा आम जनता का है। आम जनता ने बैंक पर भरोसा करके अपने पैसे बैंकों में जमा किए हैं। बैंकों ने बड़े-बड़े पूंजीपतियों को तो क़र्ज़ दे दिया जो अब उनसे पैसे वापस नहीं ले रही है और उसे बट्टे खाते में डाल दिया है। दूसरी तरफ यही बैंक और सरकार छोटे-छोटे गरीब लोगों को, किसानों को, एक तो कर्ज नहीं देते और अगर कर्ज दे भी दिया तो उसे बड़ी ही बेरहमी के साथ वसूल किया जाता है, लोगों के घर और खेत कुर्क कर लिए जाते हैं और उनसे वह यह तमाम पैसा वसूल कर लिया जाता है।
यहीं पर हम एक चालाकी और देख रहे हैं कि सरकार इन कर्जदार पूंजीपतियों के नाम भी जनता को नहीं बता रही है। आखिर यह जनता की चुनी हुई सरकार है। “हम भारत के लोगों” ने ही इस सरकार को चुना है तो इस सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह “हम भारत के लोगों” यानी जनता को इन पूंजीपतियों के नाम बताएं जिन्होंने बैंकों से कर्ज लेकर और यह कर्ज समय से बैंकों को नहीं लौटाया है। सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह कर्जदार पूंजीपतियों के नाम जनता को बताएं, ताकि जनता इनसे होशियार हो जाए और भविष्य में वह अपना सही रास्ता चुन सकें।
इस प्रकार हम देख रहे हैं कि हमारी सरकार जनता की बुनियादी समस्याएं हल करने के लिए कम पैसे होने का रोना रो रही है और दूसरी तरफ इस देश के बड़े बड़े पूंजीपतियों कर्जदारों से दस लाख करोड़ से ज्यादा काकर्जा वसूल नहीं रही है और इसे बट्टे खाते में डाल दिया है। इस प्रकार हमारी सरकार जानबूझकर एक साजिश के तहत पूंजीपतियों से जानबूझकर पैसा नहीं वसूल रही है और उसने एक सोची समझी साजिश के तहत जनता का पैसा अपने आका पूंजीपतियों को दे दिया है और बैंकों को डूबने के कगार पर पहुंचा दिया है।

