शिवानन्द तिवारी पूर्व सांसद
भारतीय जनता पार्टी के पास स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत के नाम पर कुछ नहीं है. इसलिए उसने आजीवन कांग्रेसी रहे सरदार पटेल को नेहरू विरोधी साबित कर उनको अपना नायक बनाने का प्रयास कर रही है. इसके लिए ज़रूरी है कि सरदार पटेल को कट्टर हिंदुत्ववादी और नेहरू को हिंदू विरोधी साबित करने का प्रयास किया जाए.
दरअसल यह सच है कि कुछ मामलों में सरदार का नेहरू से मतभेद था. लेकिन उनको हिंदुत्व वाद का समर्थक साबित करने का प्रयास करना उनका अपमान है. आज़ाद भारत में सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार होगा. धर्म के आधार पर किसी तरह का भेदभाव नहीं होगा. धर्म के आधार पर देश के विभाजन के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भरत को हिंदू राष्ट्र बनाने का अभियान चला रहा था.
विभाजन के बाद नेहरू सांप्रदायिकता से लड़ रहे थे उस समय पटेल इस मुद्दे पर मज़बूती के साथ उनका समर्थन कर रहे थे.
1948 के जयपुर अधिवेशन में उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि ‘कांग्रेस और सरकार इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि भारत एक सच्चा धर्म निरपेक्ष राज्य हो.’
सरदार ने हिंदू राष्ट्र की चरचा को पागलपन भरा विचार कहा था.
1950 में उन्होंने कहा था कि ‘हमारा एक धर्म निरपेक्ष राज्य है. यहाँ हरेक मुसलमान को महसूस करना चाहिए कि वह भारत का नागरिक है और भारतीय होने के नाते उसका समान अधिकार है.’
दरअसल हिंदुत्व के अपने अभियान में संघ और भाजपा नेहरू और कांग्रेस के विरूद्ध सरदार का इस्तेमाल कर उनको अपनी विचारधारा का समर्थक साबित करने के अभियान में उनको अपमानित कर रही है.
सरदार की बेटी मणिबेन पटेल ने जिन्होंने अपना पूरा जीवन पिता की सेवा में लगा दिया था, 1952 और 57 के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर दो बार लोकसभा का सदस्य बनीं थीं. उसके बाद सरदार के इकलौते पुत्र को भी कांग्रेस ने तीन मर्तबा राज्य सभा में भेजा.
कई मुद्दों पर नेहरू के साथ मतभेद के बावजूद सरदार नेहरू के साथ मज़बूती के साथ खड़े रहे. यहाँ तक कि नेहरू की गैर हाज़िरी में उन्होंने ही संविधान सभा में कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को पास कराने में विशेष भूमिका अदा की थी.
इसलिए जिन्हें अपने इतिहास पर शर्मिंदगी है वे सरदार को अपना नायक बना कर उनको शर्मिंदा कर रहे हैं.
शिवानन्द तिवारी पूर्व सांसद

