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*आरएसएस का ‘संविधान संशोधन’ एजेंडा: एक ऐतिहासिक धोखे की दास्तान*

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तेजपाल सिंह ‘तेज’

                   प्रस्तुत आलेख में कोशिश की गई है कि जिस समृद्ध, ऐतिहासिक और तथ्याधारित सामग्री न केवल आरएसएस की दोहरी भूमिका और आपातकाल के दौरान उसके आत्मसमर्पण की पोल खोलता है, बल्कि यह भी उजागर करता है कि किस तरह वर्तमान राजनीतिक शक्तियाँ उस इतिहास को विकृत कर, ‘संविधान की प्रस्तावना’ से ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ जैसे शब्द हटाने की चुपचाप कोशिशों में जुटी हैं। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है।

आरएसएस की आपातकालीन माफी और आज का संविधान संशोधनएजेंडा:

          “जो इतिहास से नहीं सीखते, वे इतिहास को दोहराते हैं — पर धोखे से।” जब भारतीय लोकतंत्र पर 1975 में आपातकाल का अंधेरा छाया था, तब बहुत से संगठनों ने प्रतिरोध किया, बहुत से नेताओं ने सच्ची लड़ाई लड़ी, लेकिन एक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) – ने सत्ता के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। आज वही संगठन, जो इंदिरा गांधी की तानाशाही के आगे नतमस्तक था, अपने को ‘लोकतंत्र का रक्षक’ बताकर संविधान की आत्मा – “समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता” – को हटाने के लिए आर एस एस के मानमीय दत्तात्रेय होशबोले ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की है।

1. आपातकाल और आरएसएस का आत्मसमर्पण

          आरएसएस समर्थक कहते हैं कि वे इमरजेंसी के दौरान जेल में रहे, यातनाएं झेलीं। लेकिन सच यह है कि आरएसएस के बड़े नेताओं ने माफ़ी मांगकर, संजय गांधी के 20 सूत्रीय कार्यक्रम को लागू करने का वादा कर, जेल से रिहाई पाई।

2. माफ़ी और मुआवज़ा: कैसा “लोकतांत्रिक संघर्ष”?

          वर्तमान में गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ऐसे लोगों को पेंशन दी जा रही है जिन्होंने आपातकाल में एक महीने से भी कम समय जेल में बिताया।

          यहाँ एक सवाल उठता है — जब देश में लोकतंत्र कुचला जा रहा था, तब आर एस एस के लोग कैसे एक-दो महीने में जेल से रिहा हो गए? क्या आपने माफ़ी नहीं माँगी? क्या ये पेंशन किसी “संघर्ष” का पुरस्कार है, या सत्ता के आगे झुकने का पुरस्कार?

3. जनसंघआरएसएस का इमरजेंसी में दोहरा चरित्र

4. आज का षड्यंत्र: संविधान की प्रस्तावना बदलना

          वर्ष 2024-25 में जब देश में फिर से लोकतंत्र पर हमले हो रहे हैं, RSS और भाजपा के नेता यह कह रहे हैं कि संविधान की प्रस्तावना से “धर्मनिरपेक्ष” और “समाजवाद” शब्द हटा दिए जाएं। यह मांग एक सांस्कृतिक नहीं, राजनीतिक क्रांति के नाम पर प्रतिक्रांति है। धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद कोई बाद में जुड़े शब्द नहीं, बल्कि भारत की संविधान सभा की आत्मा के मूल तत्व थे।

          डॉ. अंबेडकर ने स्पष्ट कहा था: “धर्म राज्य से अलग रहेगा; और राज्य सब धर्मों से समान दूरी रखेगा।” समाजवाद के बिना संविधान केवल अमीरों का चार्टर बनकर रह जाएगा।

5. मौजूदा आपातकाल: तवलीन सिंह की गवाही

          तवलीन सिंह, जो कभी भाजपा की प्रशंसक थीं, आज कहती हैं: “एक अलग तरह की आपातकाल पहले ही लागू है… जिसे ‘घोषित’ नहीं किया गया है, लेकिन हर असहमति, हर पत्रकार, हर विपक्षी को कानूनों की चक्की में पीसा जा रहा है।”

(Indian Express, 22 जून 2024)

          ED, CBI, UAPA और मीडिया का दमन, यह सब उस आपातकाल से भी घातक है, जहां सत्ता विरोध को “देशद्रोह” बता देती है।

निष्कर्षत: आरएसएस की आपातकालीन शर्म और आज का ढोंग

          एक ओर वे लोग हैं जिन्होंने आपातकाल के दौरान सत्य, स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए असली लड़ाई लड़ी — जेलों में सड़ते रहे, यातनाएं झेलीं, बिना समझौता किए। और दूसरी ओर, आरएसएस जैसे संगठन हैं, जो उस समय माफी मांग रहे थे, आज वही संविधान बदलने का दुस्साहस कर रहे हैं। “वे जिन्होंने इमरजेंसी के आगे घुटने टेक दिए थे, आज संविधान से ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘समाजवाद’ को हटाना चाहते हैं। ये कोई ‘संविधान प्रेमी’ नहीं हैं, बल्कि संविधान के विरुद्ध चल रही प्रतिक्रांतिकारी साजिश के सूत्रधार हैं।” आज जब भारतीय लोकतंत्र एक नए संकट से जूझ रहा है, यह ज़रूरी है कि हम इतिहास को फिर से पढ़ें — मूल दस्तावेजों से, सच्ची गवाही से, और आत्मसम्मान के साथ।

          यहाँ एक सवाल यह भी उठता है — क्या वर्तमान राजनीति में धर्मनिरपेक्षता खतरे में है? जवाब है — हाँ, वर्तमान भारतीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता गंभीर संकट और खतरे में है। यह खतरा केवल वैचारिक स्तर पर ही नहीं है, बल्कि संस्थागत, नीतिगत और सांस्कृतिक स्तर पर भी स्पष्ट रूप से दिखता है। नीचे कुछ बिंदुओं में इसका विश्लेषण किया गया है।

1. धर्मनिरपेक्षता का मतलब क्या है?

          भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता (Secularism) का अर्थ है — राज्य का किसी धर्म से न पक्ष न लेना और न  ही विरोध करना, सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखना, और धर्म को राजनीति, प्रशासन, न्याय और शिक्षा से अलग रखना। डॉ. अंबेडकर, नेहरू और गांधी – तीनों ने इस सिद्धांत को भारतीय राष्ट्रवाद का आधार माना।

2. वर्तमान समय में धर्मनिरपेक्षता पर हमले:

(क) राजनीति में धर्म का खुला उपयोग — 2024 के लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ दल द्वारा मंदिर, पूजा, धर्मयात्रा और राम मंदिर जैसे धार्मिक प्रतीकों का व्यापक राजनीतिक उपयोग किया गया। प्रधानमंत्री का राम मंदिर के “प्रधान यजमान” के रूप में उदय होना, संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के विपरीत है।

(ख) मुसलमानों और ईसाइयों का राजनीतिक दमन — CAA, NRC, हिजाब, लव जिहाद, हलाल बैन, बुलडोज़र राजनीति – ये सब कानून या प्रवृत्तियाँ धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ एकतरफा लागू की जा रही हैं। भाजपा के कई मुख्यमंत्रियों द्वारा खुलेआम “मुसलमानों से भारत खतरे में है” जैसे बयान दिए जाते हैं – यह धर्मनिरपेक्षता की आत्मा पर हमला है।

(ग) संविधान की प्रस्तावना को बदलने की चर्चा — भाजपा/आरएसएस से जुड़े संगठनों द्वारा ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवाद’ शब्दों को हटाने की माँग बार-बार उठाई जाती है।

          भारतीय संविधान की प्रस्तावना पर यह एक वैचारिक हमला है, क्योंकि  ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ जैसे शब्द ही भारत की विविधता और समानता की गारंटी देते हैं।

3. धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ आरएसएस की वैचारिक रणनीति — RSS ने हमेशा यह कहा कि

“भारत एक हिंदू राष्ट्र है, और सेकुलरिज़्म पश्चिमी अवधारणा है जो यहां नहीं चल सकती।”

(गोलवलकर, “Bunch of Thoughts”) वर्तमान सत्ताधारी दल इस विचारधारा को ही नीति में बदल रहा है।

4. न्यायपालिका और धर्मनिरपेक्षता — हाल के वर्षों में कुछ फैसलों में न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं:

5. मीडिया और प्रचारतंत्र का सांप्रदायीकरण –

6. ऐतिहासिक उदाहरणों से सबक :

7. क्या भारत का संविधान बचेगा?–डॉ. अंबेडकर ने चेताया था: “संविधान चाहे जितना अच्छा क्यों न हो, अगर उसे चलाने वाले लोग बुरे होंगे, तो वह बुरा ही सिद्ध होगा और यदि उसे चलाने वाले अच्छे होंगे, तो वह अच्छा ही सिद्ध होगा” (संविधान सभा में 25 नवम्बर 1949 को भाषण) आज संविधान की आत्मा को चलाने वाले जब उसे ही बदलने की बातें कर रहे हैं, तो धर्मनिरपेक्षता का बचा रहना आसान नहीं है।

निष्कर्षत: धर्मनिरपेक्षता खतरे में क्यों है?

विशेष :

क्या आरएसएस की भूमिका वर्तमान में बदल रही है? —  हाँ, RSS की भूमिका वर्तमान समय में स्पष्ट रूप से बदली है — और यह बदलाव केवल ‘भूमिका’ का नहीं, बल्कि चरित्र, रणनीति और दायरे का भी है। नीचे हम इस बदलाव का विश्लेषण ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक दृष्टिकोण से करेंगे:

1. ऐतिहासिक भूमिका: बैकस्टेज की ताक़त:

अतीत में:

तब RSS की भूमिका:  “हम राजनीति में नहीं हैं, हम केवल राष्ट्र को जाग्रत कर रहे हैं।”

2. वर्तमान भूमिका: पर्दे से मंच पर आना:

उदाहरण:

3. रणनीति में बदलाव: छाया से सत्तातक का सफर:

पुराना RSS :  सत्ता से दूरी, मुस्लिमों से दूरी, गुप्त संगठन, सार्वजनिक संगठनों का जाल, शुद्ध

हिंदुत्व वैचारिक प्रशिक्षण आदि..

नया RSS:   सत्ता के केंद्र में, मुस्लिम आउटरीच (शक़ के साथ),सीधे नीतिगत हस्तक्षेप, सामाजिक समीकरण की राजनीति (पसमांदा, दलित, OBC तक पहुँच) आदि…

          मोहन भागवत द्वारा मस्जिदों का दौरा, मुस्लिम बुद्धिजीवियों से संवाद, “DNA एक है” जैसी भाषा, संघ की छवि-सुधार रणनीति का हिस्सा है — लेकिन क्या यह वास्तविक बदलाव है या रणनीतिक मुखौटा?

4. आरएसएस और संविधान :

पहले RSS संविधान को ‘पश्चिमी दस्तावेज’ कहकर खारिज करता था, अब उसके अनुयायी संविधान की प्रस्तावना बदलने की बात करते हैं। धर्मनिरपेक्षता’, ‘समाजवाद’, और आरक्षण जैसे संवैधानिक मूल्य संघ की दृष्टि से समस्याएँहैं

5. समाज में परिवर्तनकारी भूमिका या विभाजनकारी एजेंडा?

6. परिवर्तन का सार: रूप बदला है, मंशा नहीं

          RSS की रणनीति बदली है: अब वह खुद को समावेशी, उदार और संवादधर्मी दिखाता है। लेकिन उसका मूल एजेंडा – हिंदू राष्ट्र की स्थापना, एकरूपता की थोप, और ‘विविधता में एकता’ के स्थान पर ‘एकता में एकरूपता’ – अब भी जीवित है।

सारांश : भूमिका बदली, विचारधारा वही

हाँ, आरएसएस की भूमिका बदली है —

बदलती भूमिका या बदलता मुखौटा? :  वर्तमान राजनीति में आरएसएस की भूमिका का पुनर्पाठ” :  इसमें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वैचारिक तुलनाएँ, वर्तमान नीतिगत हस्तक्षेप और संविधान-विरोधी प्रवृत्तियों का विश्लेषण समाहित है। भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान दौर में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका केवल सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन की सीमाओं को लांघकर सत्ता और नीति निर्धारण के केन्द्र में आ गई है। जिस संगठन ने दशकों तक खुद को “गैर-राजनीतिक” बताकर प्रस्तुत किया, वही अब सत्ता-संचालन में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। यह बदलाव केवल संगठनात्मक नहीं, वैचारिक और रणनीतिक भी है। यह निबंध वर्तमान संदर्भों में आरएसएस की भूमिका के इस रूपांतरण का विश्लेषण डॉ. भीमराव अंबेडकर, सावरकर, गोलवलकर, मोहन भागवत और अन्य विचारकों के दृष्टिकोणों की तुलनात्मक विवेचना के माध्यम से करता है।

1. आरएसएस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: छाया में सत्ता : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गई थी। इसका घोषित उद्देश्य राष्ट्र निर्माण था, परन्तु स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका संदिग्ध और निष्क्रिय रही। आरएसएस के कार्यकर्ता न तो असहयोग आंदोलन में शामिल हुए, न भारत छोड़ो आंदोलन में। गोलवलकर ने स्पष्ट रूप से कहा: “हमारा उद्देश्य राजनीति नहीं, समाज का संगठन है।” लेकिन यह संगठन स्वतंत्रता सेनानियों के विरुद्ध अंग्रेजों की “कानूनी व्यवस्था” का सम्मान करने की बात करता रहा। डॉ. अंबेडकर ने भी लिखा: “संघ एक अनुशासित संगठन हो सकता है, लेकिन यह भारतीय लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध एक सवर्णवादी संगठन है।” (Annihilation of Caste)

2. वैचारिक नींव: सावरकर, गोलवलकर और हिंदू राष्ट्र’ : वी. डी. सावरकर: सावरकर ने 1923 में ‘हिंदुत्व’ को एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में प्रस्तुत किया। उनके अनुसार:  “हिंदू वह है जो भारत को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है।” इस परिभाषा में मुसलमान और ईसाई अपने आप बहिष्कृत हो जाते हैं। गोलवलकर की कुख्यात पुस्तक We or Our Nationhood Defined (1939) में लिखा है: “जर्मनी में जर्मनों ने यहूदियों से देश को शुद्ध किया — यही भारत को भी करना चाहिए।” यह फासीवादी विचारधारा भारत जैसे बहुलतावादी देश के लिए घातक थी। यही विचार आज आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठनों के माध्यम से दोहराए जा रहे हैं।

3. डॉ. अंबेडकर का चेतावनी स्वरूप विचार  : डॉ. अंबेडकर ने बार-बार चेताया कि “यदि हिंदू राष्ट्र बनता है तो यह इस देश के लिए सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा… यह एक ऐसा जातिवादी और अनुशासनहीन तानाशाही राज्य होगा जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की भावना के विरुद्ध होगा।” (Thoughts on Pakistan) वे संविधान को सामाजिक क्रांति का माध्यम मानते थे, जबकि आरएसएस संविधान को एक पश्चिमी ग्रंथ मानता रहा है।

4. वर्तमान में आरएसएस की भूमिका: सत्ता का अधिग्रहण:

(क) भाजपा और सरकार पर सीधा नियंत्रण:

          मोदी सरकार में आरएसएस केवल मार्गदर्शक नहीं, बल्कि नीति निर्देशक बन चुका है। चाहे वह शिक्षा नीति हो, इतिहास लेखन, विश्वविद्यालयों की नियुक्तियाँ हों, या मीडिया प्रबंधन — हर जगह संघ की छाया है।

(ख) शिक्षा और विचारधार:

          नई शिक्षा नीति 2020 में भारतीय संस्कृति, संस्कृत, और वैदिक ज्ञान को केन्द्रीय स्थान दिया गया है। इतिहास की पुस्तकों से मुग़ल काल, अंबेडकर, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को कम किया जा रहा है।

(ग) अल्पसंख्यकों के खिलाफ कानूनों का निर्माण:  लव जिहाद, धर्मांतरण विरोधी कानून, CAA-NRC, गो-रक्षा कानून — ये सब आरएसएस की पुरानी माँगें थीं, जिन्हें अब सरकारी नीति का हिस्सा बनाया गया है।

5. रणनीति में बदलाव: मुखौटे के नीचे हिंदुत्व:

          संघ ने अब एक नया चेहरा अपनाया है: मोहन भागवत मुस्लिम बुद्धिजीवियों से संवाद करते हैं। “DNA सबका एक है” जैसे बयान दिए जाते हैं। पसमांदा मुसलमानों को साधने की कोशिश होती है। लेकिन इसके समानांतर: मस्जिदों, मदरसों को निशाना बनाया जाता है; एक धर्म, एक राष्ट्र की भाषा में उपदेश दिए जाते हैं और संविधान की प्रस्तावना से ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवाद’ हटाने की माँग उठती है।

6. न्यायपालिका और लोकतंत्र पर नियंत्रण :

7. तुलनात्मक विश्लेषण: अंबेडकर बनाम भागवत

          भारतीय लोकतंत्र और समाज की दिशा को प्रभावित करने वाले दो प्रभावशाली व्यक्तित्व — डॉ. भीमराव अंबेडकर और मोहन भागवत — अपने विचारों, दृष्टिकोणों और उद्देश्यों में एक-दूसरे के एकदम विरोध में खड़े हैं। एक ओर डॉ. अंबेडकर हैं, जिन्होंने भारतीय संविधान रचकर एक समतामूलक, धर्मनिरपेक्ष और न्यायसंगत राष्ट्र की नींव रखी; दूसरी ओर मोहन भागवत हैं, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के मुखिया के रूप में ‘हिंदू राष्ट्र’ की परिकल्पना को आगे बढ़ाते हैं। यह तुलनात्मक अध्ययन उनके विचारों, दृष्टिकोणों और भारत के भविष्य को लेकर उनके दृष्टिकोण में टकराव को उजागर करता है।

1. जाति व्यवस्था पर दृष्टिकोण :

अम्बेडकर जाति व्यवस्था को अमानवीय, असमान और मनुष्य की गरिमा के विरुद्ध मानते थे। उन्होंने ‘जाति का उन्मूलन’ (Annihilation of Caste) का आह्वान किया और इसे भारतीय समाज की सबसे बड़ी सामाजिक बुराई बताया। अंबेडकर ने कहा था, “Turn in any direction you like, caste is the monster that crosses your path.”

भागवत: भागवत और संघ जाति उन्मूलन की बात तो करते हैं, लेकिन ‘जातियों का समरसता में विलय’ और ‘हिंदू एकता’ के नाम पर जाति को बनाए रखने की वकालत करते हैं। उन्होंने कहा था, “हमारी कोशिश है कि हर जाति को साथ लेकर चलें, क्योंकि सब हिंदू हैं।”

विश्लेषण:  अम्बेडकर जाति को तोड़ने के पक्षधर थे, भागवत उसे बनाए रखते हुए समरसता की बात करते हैं — जो अंबेडकर के लिए छल है।

2. धर्म और राजनीति का संबंध:

अम्बेडकर नेधर्म को एक नैतिक संरचना माना, न कि पूजा-पद्धति। “Religion must be in accord with reason and morality.” ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म अपनाया। धर्म और राजनीति के घालमेल से हमेशा सावधान किया।

भागवत के नेतृत्व में RSS ‘हिंदुत्व’ को सांस्कृतिक नहीं, राजनीतिक परियोजना के रूप में स्थापित कर रहा है। धर्म और राष्ट्र की एकता की वकालत करते हैं। हिन्दू धर्म को भारत की आत्मा मानते हैं।

विश्लेषण: अंबेडकर धर्म को निजी और नैतिक क्षेत्र तक सीमित रखते हैं, जबकि भागवत उसे राजनीति का आधार बनाते हैं।

3. राष्ट्र की परिकल्पना :

अम्बेडकर धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, बहुजातीय, बहुधार्मिक राष्ट्र की कल्पना की। भारत को ‘राजनीतिक राष्ट्र’ के रूप में देखा, न कि किसी एक धर्म/संस्कृति से परिभाषित राष्ट्र के रूप में।

भागवत ‘हिंदू राष्ट्र’ की परिकल्पना प्रस्तुत करते हैं, जिसमें भारत की अस्मिता को सनातन धर्म और आर्य संस्कृति से जोड़ा जाता है। “भारत का मूल स्वभाव हिंदू है।”

विश्लेषण: एक राष्ट्र में बहुलता और न्याय का आग्रह करता है, दूसरा राष्ट्र को एक धर्म में सीमित कर देना चाहता है।

4. महिलाओं और दलितों के अधिकारों पर दृष्टिकोण :

अम्बेडकर स्त्रियों को समान अधिकार दिलाने के पक्षधर रहे। हिंदू कोड बिल लाकर समान नागरिक कानून की नींव रखने की कोशिश की। दलितों को शिक्षा, नौकरी, और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से ऊपर उठाने का संघर्ष किया।

भागवत संघ की शाखाओं में महिलाओं की भूमिका सीमित है। महिला अधिकारों की चर्चा संघ के एजेंडे में गौण है। दलितों को हिंदू समाज में सम्मिलितकरने की बात तो करते हैं, पर उनकी जातीय अस्मिता को नकारते हैं।

विश्लेषण: अम्बेडकर का दृष्टिकोण समता और अधिकार आधारित है, भागवत का दृष्टिकोण एकीकृत लेकिन अधीनस्थ भूमिका वाला है।

5. संविधान के प्रति दृष्टिकोण

अम्बेडकर संविधान के निर्माता और संरक्षक। उन्होंने संविधान को ‘एक जीवित दस्तावेज़’ कहा जो समय के साथ बदल सकता है, परंतु मूल भावना – समानता, स्वतंत्रता, बंधुता – अटल होनी चाहिए।

भागवत बार-बार संविधान की समीक्षा और ‘भारतीयता के अनुरूप परिवर्तन’ की बात करते हैं। संघ लंबे समय से मनुस्मृति की प्रशंसा करता रहा है, जो अंबेडकर के अनुसार “सबसे अमानवीय ग्रंथ” है।

विश्लेषण: अम्बेडकर संविधान को समाजिक न्याय का औजार मानते हैं, भागवत उसे ‘हिंदू राष्ट्र’ के लक्ष्य के अनुसार बदलने योग्य साधन मानते हैं।

6. विचारधारात्मक स्रोत और प्रेरणा

डॉ. अंबेडकर :

प्रेरणा :         बौद्ध धर्म, जॉन स्टुअर्ट मिल, फुले, कबीर    

विचारधारा:  मानववाद, धर्मनिरपेक्षता, बहुजन हिताय

लक्ष्य:            जातिविहीन समाज

रणनीति :      संवैधानिक संघर्ष, वैचारिक क्रांति   

मोहन भागवत:

प्रेरणा :         सावरकर, गोलवलकर, उपनिषद

विचारधारा:  सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिंदू एकता

लक्ष्य :         हिंदू एकता के नाम पर जातियों का समावेश

रणनीति:     संगठन, सामाजिक कार्य, राजनीतिक समर्थन (भाजपा)

        डॉ. अंबेडकर और मोहन भागवत दो ऐसी वैचारिक दिशाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं जो भारत को दो अलग-अलग राहों पर ले जाती हैं। एक तरफ समता, बंधुता और न्याय आधारित लोकतांत्रिक राष्ट्र की कल्पना है — दूसरी ओर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और धार्मिक राष्ट्र की आकांक्षा। डॉ. अंबेडकर का भारत वह है जहाँ दलित, स्त्री, श्रमिक और वंचित वर्ग अपनी गरिमा के साथ जी सके तथा मोहन भागवत का भारत वह है जहाँ बहुलता के बावजूद एक धर्म, एक संस्कृति और एक परंपरा को प्रधानता दी जाए।

          यह टकराव केवल दो व्यक्तित्वों का नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं — संवैधानिक भारत बनाम सांस्कृतिक राष्ट्र — का संघर्ष है। अंततः यह भारत की आत्मा को तय करने वाला विमर्श है: “क्या भारत बुद्ध और अंबेडकर के रास्ते चलेगा, या सावरकर और भागवत के रास्ते?”

          यथोक्त की आलोक में आर एस एस की बदलती भूमिका में परिवर्तन को व्यापक रूप से महज एक या छलपूर्ण परिवर्तन कहा जा सकता है। आरएसएस की भूमिका में स्पष्ट रूप से बदलाव हुआ है, लेकिन यह बदलाव केवल रणनीतिक है, वैचारिक नहीं। संघ अब “सांस्कृतिक संगठन” की सीमा से बाहर आकर सत्ता का संचालनकर्ता बन चुका है। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं। “विचार बदलते हैं तो बदलाव आता है, पर जब केवल भाषा बदले और मंशा वही रहे तब वह परिवर्तन नहीं, छल होता है।” आज भारत के सामने यही संकट है — एक ऐसा संगठन, जो संविधान से ऊपर खुद को मानता है, अब संविधान को ही बदलने की स्थिति में है। इस संकट को समझना, उजागर करना, और उसका प्रतिकार करना — यही लोकतंत्र की रक्षा है।

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