अग्नि आलोक

आर.एस.एस. की जन्मकुण्डली और एजेण्डा

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   प्रस्तुति : पुष्पा गुप्ता

   पिछले ग्यारह वर्षों के दौरान मोदी-शाह शासन के दौरान अनेक विचलित करने वाली घटनाओं ने हर इंसाफ़पसन्द इन्सान को परेशान किया है। समाज में साम्प्रदायिक नफ़रत और हिंसा इतनी व्यापक और इतने गहरे तक फैल गयी है कि पूरा सामाजिक ताना-बाना तार-तार हो गया है। ऐसे हमलों के ख़िलाफ़ बहुत से लोगों में आक्रोश भी है, लेकिन यह आक्रोश फ़ासीवाद के विरोध में असरदार और सुसंगत प्रतिरोध में तब्दील नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे एक वजह आम आबादी में आर.एस.एस.-भाजपा की पूरी राजनीति और फ़ासीवाद तथा उसकी कार्यप्रणाली की समझ का अभाव भी है।

*आर.एस.एस का संक्षिप्त इतिहास,:*

आर.एस.एस. की ताक़त पिछले चार दशकों के दौरान बहुत तेज़ी से बढ़ी और यह राजनीति व समाज के हाशियों से छलाँग लगाकर सत्ता के गलियारों तक पहुँच गया, लेकिन इसकी शुरुआत आज से सौ साल पहले ही हो गयी थी। भारत में फ़ासीवाद का इतिहास लगभग उतना ही पुराना है जितना कि इटली और जर्मनी में। इटली और जर्मनी में फ़ासीवादी पार्टियाँ 1910 के दशक के अन्त या 1920 के दशक की शुरुआत में बनीं जबकि भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में नागपुर में विजयदशमी के दिन हुई।

    पिछली सदी में यूरोप में जन्मे फ़ासीवाद का उभार अचानक बहुत तेज़ी के साथ हुआ और फिर उतनी ही तेज़ी के साथ उसका पतन भी हो गया। इसके विपरीत, भारत में फ़ासीवादी शक्तियों ने एक लम्बे अरसे के दौरान धीरे-धीरे अपनी ताक़त और असर का विस्तार किया है। इस दौरान इसने तरह-तरह के कामों और प्रचार के ज़रिए समाज में अपनी पैठ बढ़ायी। आर.एस.एस. ने समाज में अपना आधार बनाने के लिए एक दीर्घकालिक योजना के तहत तमाम तरह की सामाजिक, शैक्षिक, धार्मिक और सुधार संस्थाओं का एक नेटवर्क भी खड़ा किया।

      इसने राज्य-तंत्र के सभी अंगों में भी गहरी घुसपैठ की। सत्तारूढ़ पार्टियों ने भी महात्मा गाँधी की हत्या या इमरजेंसी जैसे कुछ मौक़ों पर थोड़े समय के लिए इस पर रोक लगाने के अलावा आर.एस.एस. को अपनी ज़हरीली योजना को आगे बढ़ाने में परोक्ष रूप से मदद ही पहुँचायी है। इसकी एक वजह यह भी है कि लगभग हर बुर्जुआ पार्टी में इसकी विचारधारा के समर्थक मौजूद रहे हैं।

     देश के बड़े पूँजीपतियों का बड़ा हिस्सा आज खुलकर आर.एस.एस.-भाजपा के पीछे खड़ा है, लेकिन आज़ादी के पहले से 1990 के दशक की शुरुआत तक उनकी पहली पसन्द की पार्टी कांग्रेस ही रही। फिर भी, उनका एक हिस्सा शुरू से ही पीछे से आर.एस.एस. की भी मदद करता रहा था। उन्हें पता था कि पूँजीवादी व्यवस्था का संकट गहराने पर किसी समय उन्हें आर.एस.एस. जैसे संगठन की ज़रूरत पड़ेगी। 

     ऐसा संगठन जो एक तरफ़ सारे नियम-क़ायदों को ताक पर रखकर पूँजीपतियों की सेवा करे, जनता को निचोड़ डाले और दूसरी तरफ़ धर्म के नाम पर नक़ली दुश्मन खड़ा करके और झूठे मुद्दे उभारकर जनता की एकता को तोड़ डाले ताकि इस अन्याय का कोई असरदार विरोध ही न हो पाये।

     जो व्यक्ति राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को फ़ासीवादी विचारों के क़रीब लाया उसका नाम था बी.एस. मुंजे। संघ के संस्थापकों में से एक, मुंजे ही 1931 में फ़ासिस्ट संगठन के तौर-तरीक़ों के बारे में जानने के लिए इटली गये थे और वहाँ मुसोलिनी सहित कई फ़ासिस्ट नेताओं से मुलाकात की थी। यह महज़ इत्तेफ़ाक़ नहीं है कि जिस वक़्त (23 मार्च 1931) भगतसिंह और उनके साथी हँसते-हँसते मौत को गले लगा रहे थे, ठीक उसी समय, 15-24 मार्च 1931 के बीच, बी.एस. मुंजे इटली की राजधानी रोम में मुसोलिनी और दूसरे फ़ासिस्ट नेताओं से मिलकर भारत में उग्र हिन्दू फ़ासिस्ट संगठन का ढाँचा खड़ा करने के गुर सीख रहे थे। 19 मार्च 1931 को मुंजे की मुसोलिनी से मुलाक़ात हुई थी।

     मुंजे ने हेडगेवार को मुसोलिनी द्वारा युवाओं के दिमाग़ों में ज़हर घोलकर उन्हें फ़ासीवादी संगठन में शामिल करने के तौर-तरीक़ों के बारे में बताया। हेडगेवार ने उनका इस्तेमाल फ़ौरन शुरू कर दिया और आर.एस.एस. आज भी लगभग उन्हीं तरीक़ों का इस्तेमाल करता है। 

     1930 के दशक के अन्त तक आर.एस.एस. के लोगों ने बम्बई में इटली के कॉन्सुलेट से भी राब्ता क़ायम कर लिया था और उसके ज़रिए इटली के फ़ासिस्टों का हिन्दू फ़ासीवादियों से लगातार सम्पर्क बना रहा।

      इसी समय के आसपास एक अन्य हिन्दू कट्टरपन्थी विनायक दामोदर सावरकर, जिनके बड़े भाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापकों में से एक थे, ने जर्मनी के नात्सियों से सम्पर्क स्थापित किया। सावरकर ने जर्मनी में हिटलर द्वारा यहूदियों के सफ़ाये को सही ठहराया और भारत में मुसलमानों की “समस्या” के समाधान का भी यही रास्ता सुझाया।

      जर्मनी में हिटलर ‘यहूदी प्रश्न’ के जिस तरह के “फ़ाइनल सॉल्यूशन” की बातें कर रहा था, सावरकर ने उसकी प्रशंसा की। सावरकर के लिए नात्सी राष्ट्रवादी थे जबकि यहूदी राष्ट्र-विरोधी और साम्प्रदायिक।

    आर.एस.एस. ने भी खुले तौर पर जर्मनी में नात्सियों द्वारा यहूदियों के क़त्लेआम का समर्थन किया। लम्बे समय तक संघ के कार्यालयों में हिटलर की प्रशंसा करने वाली किताबें बिकती रहती थीं। हेडगेवार ने मृत्यु से पहले एम.एस. गोलवलकर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया।

     गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफ़ाइण्ड’ और बाद में प्रकाशित हुई ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में जर्मनी में नात्सियों द्वारा उठाये गये क़दमों का समर्थन किया। आज इज़रायल के यहूदी शासकों और संघ के बीच जो भाईचारा दिखता है उसमें भी कुछ आश्चर्यजनक नहीं है। 

    दरअसल, ज़ायनवादियों की विचारधारा भी हिटलर की नस्ली श्रेष्ठता और सफ़ाये की विचारधारा से क़तई अलग नहीं है।

      गोलवलकर 1940 से लेकर 1973 तक आर.एस.एस. के सुप्रीमो रहे। गोलवलकर के नेतृत्व में ही आर.एस.एस. के वे सभी संगठन अस्तित्व में आये जिन्हें आज हम जानते हैं। आर.एस.एस. ने इसी दौरान अपने स्कूलों का नेटवर्क देशभर में फैलाया। संघ की शाखाएँ भी बड़े पैमाने पर इसी दौरान पूरे देश में फैलीं। विश्व हिन्दू परिषद जैसे आर.एस.एस. के आनुषंगिक संगठन इसी दौरान बने।

     गोलवलकर ने ही आर.एस.एस. की फ़ासीवादी विचारधारा को एक सुव्यवस्थित रूप दिया और उनके नेतृत्व में ही आर.एस.एस. की पहुँच महाराष्ट्र के ब्राह्मणों से बाहर फैली। आर.एस.एस. सही मायनों में एक अखिल भारतीय संगठन गोलवलकर के नेतृत्व में ही बना। आर.एस.एस. के इन परम आदरणीय “गुरुजी” के विचार कितने प्रतिक्रियावादी और ज़हरीले थे इसके बारे में हम आगे उदाहरणों के साथ चर्चा करेंगे।

*राष्ट्रीय आन्दोलन से ग़द्दारी :*

     आर.एस.एस. के लोग चाहे जितना झूठ बोलें, इतिहास को चाहे जितना तोड़े-मरोड़ें, वे इस सच को छिपा नहीं सकते कि संघ ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई में कभी हिस्सा नहीं लिया। संघ हमेशा ब्रिटिश हुक्मरान के साथ तालमेल करने के लिए तैयार रहा। उसके निशाने पर शुरू से ही मुसलमान, कम्युनिस्ट और ईसाई थे। ब्रिटिश शासक कभी उसके निशाने पर नहीं थे।

      ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान संघ देशव्यापी उथल-पुथल में शामिल नहीं हुआ था। उल्टे जगह-जगह उसने इस आन्दोलन का बहिष्कार किया और अंग्रेज़ों का साथ दिया था। श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा बंगाल में अंग्रेज़ों के पक्ष में खुलकर बोलना इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण था। ग़लती से अगर कोई संघ का व्यक्ति अंग्रेज़ों द्वारा पकड़ा गया तो उसने माफ़ीनामा लिखते हुए ब्रिटिश शासन के प्रति अपनी वफ़ादारी की क़समें खायीं और बाहर आ गया।

       जब देश की जनता अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ रही थी तब संघी अपनी शाखाओं में लाठियाँ भाँजना सिखा रहे थे – अंग्रेजों के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि अपने ही देशभाइयों के ख़िलाफ़। आर.एस.एस. के संस्थापक हेडगेवार, दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर और हिन्दुत्व के मुख्य विचारक सावरकर आज़ादी की लड़ाई से दूर ही रहे। जहाँ भगतसिंह और उनके साथियों ने अंग्रेज़ सरकार से माँग की उन्हें फाँसी न देकर गोली से उड़ा दिया जाये वहीं सावरकर अंग्रेज़ हुकूमत को माफ़ीनामे पर माफ़ीनामे लिखते रहे, जिसकी शुरुआत अण्डमान भेजे जाने के छह महीने के भीतर ही हो गयी थी। इतना ही नहीं, संघ के नेताओं ने इंक़लाबी शहीदों की क़ुरबानी के जज़्बे का मज़ाक भी उड़ाया।

   भगतसिंह, अशफ़ाक़, ‘बिस्मिल’ की जो शहादत आज भी देश के लिए मर-मिटने की एक मिसाल है, देखिए गोलवलकर उसके बारे में क्या कहते हैं :

     “हमारी भारतीय संस्कृति को छोड़कर अन्य सब संस्कृतियों ने ऐसे बलिदान की उपासना की है तथा उसे आदर्श माना है और ऐसे सब बलिदानियों को राष्ट्रनायक के रूप में स्वीकार किया है। परन्तु हमने भारतीय परम्परा में इस प्रकार के बलिदान को सर्वोच्च आदर्श नहीं माना है।… हमने बलिदान को महानता का सर्वोच्च बिन्दु, जिसकी मनुष्य आकांक्षा करे, नहीं माना है। क्योंकि वे अन्ततः अपना उद्देश्य प्राप्त करने में असफल हुए और असफलता का अर्थ है कि उनमें कोई गम्भीर त्रुटि थी।” (गोलवलकर, ‘विचार नवनीत’, पृष्ठ- 280-281)

संघ समर्थक प्रकाशन से छपी हेडगेवार की जीवनी के अनुसार :

     “देशभक्ति का मतलब केवल जेल जाना नहीं है। इस तरह की दिखावटी देशभक्ति में बह जाना सही नहीं है।” (सी. पी. भिषकर, ‘संघ वृक्ष का बीज : डॉ. केशव राव हेडगेवार’, पृष्ठ-21, सुरुचि प्रकाशन, दिल्ली, 1994)

ये तो चन्द मिसालें भर हैं। ऐसे सारे वक्तव्य और घटनाएँ गिनाएँ तो पूरी किताब बन जायेगी।

     ऐसे संघियों की फ़ेहरिस्त काफी लम्बी है जो माफ़ीनामे लिख-लिखकर ब्रिटिश जेलों से बाहर आये और जिन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम सेनानियों के ख़िलाफ अंग्रेज़ों से मुख़बिरी करने तक का काम किया। ब्रिटिश हुकूमत ने भी इस वफ़ादारी का बदला चुकाया और हिन्दू साम्प्रदायिक फ़ासिस्टों के ख़िलाफ़ कभी कार्रवाई नहीं की।

     इतिहास को फिर से लिखने की संघ की कोशिशों का मुख्य कारण यही है। वे अपने ही इतिहास से डरते हैं। वे जानते हैं कि उनका इतिहास ग़द्दारियों और कायरताओं का काला इतिहास रहा है। वे कभी किसी जनान्दोलन में शामिल नहीं हुए और उनमें किसी दमन को झेलने की हिम्मत और क़ुव्वत नहीं है। इमरजेंसी में भी संघ के सरसंघचालक बालासाहब देवरस सहित आर.एस.एस. के तमाम नेता और कार्यकर्ता माफ़ीनामे लिखकर और इन्दिरा गाँधी व संजय गाँधी के 20-सूत्रीय कार्यक्रम को सफल बनाने की क़समें खाकर जेल से बाहर आ गये थे। यह अलग बात है कि अपने ख़ास पाखण्डी चरित्र के अनुरूप कई भाजपा-शासित राज्य सरकारों से वे इमरजेंसी के दौरान जेल जाने के लिए हज़ारों रुपये महीने की पेंशन भी बेशर्मी से उठा रहे हैं।

*समानता और लोकतंत्र- विरोधी ढांचा :*

       संघ के ढाँचे में शुरू से ही समानता और लोकतंत्र के लिए कोई जगह नहीं रही है। लम्बे समय तक तो यह सिर्फ़ पुरुषों के लिए ही खुला था। बहुत बाद में समाज का रुख भाँपकर संघ की महिला शाखा ‘राष्ट्र सेविका समिति’ बनायी गयी। हालाँकि इससे संघ के नेताओं द्वारा घनघोर स्त्री-विरोधी बयानों और संघ की घोर पितृसत्तात्मक विचारधारा व संस्कृति पर कोई असर नहीं पड़ा है। यही स्थिति दलितों की भी है। वैसे तो संघ ने ‘राष्ट्रीय मुस्लिम मंच’ भी बना रखा है लेकिन उसके बारे में कुछ कहना भी शब्दों की बरबादी है।

      संघ का पूरा आन्तरिक ढाँचा हिटलर और मुसोलिनी की पार्टियों से मेल खाता है। हर सदस्य शपथ लेता है कि वह सरसंघचालक के हर आदेश का बिना सवाल किये पालन करेगा। सरसंघचालक सबसे ऊपर होता है और उसके नीचे एक सरकार्यवाह होता है जिसे सरसंघचालक ही नियुक्त करता है। एक केन्द्रीय कार्यकारी मण्डल होता है जिसे स्वयं सरसंघचालक चुनता है। अपना उत्तराधिकारी भी सरसंघचालक चुनता है। यानी पूरी तरह एक ‘कमाण्ड स्ट्रक्चर’ जिसमें लोकतंत्र की कोई जगह नहीं है। नात्सी और फ़ासिस्ट पार्टी का पूरा ढाँचा ऐसा ही था। नात्सी पार्टी में ‘फ़्यूहरर’ के नाम पर शपथ ली जाती थी और फ़ासिस्ट पार्टी में ‘ड्यूस’ के नाम पर।

     जनतांत्रिक मूल्यों व तार्किकता में भरोसा करने वाला हर संगठन मतदान, बहस, तर्क आदि से अपना पक्ष तय करता है। पर संघ में ऐसे “फ़ालतू” मूल्यों के लिए कोई जगह नहीं है। संघ एक झण्डा, एक नेता, एक विचारधारा की बात करता है। मतभेद रखने वालों व तर्क करने की इच्छा पालने वालों को दूर होना पड़ता है।

      संघ समाज के एक छोटे से वर्ग के हितों का प्रतिनिधित्व करता है। चाहे वे बड़े पूँजीपति व व्यापारी हों या उच्च वर्णीय हिन्दू। इसीलिए व्यापक जनता का समर्थन हासिल करने के लिए उसे अपने असली उद्देश्यों को छुपाकर संघ के उद्देश्यों के बारे में एक झूठी और भ्रामक तस्वीर प्रचारित करनी पड़ती है। हमेशा झूठे मुद्दे खोजने और उछालने पड़ते हैं और लोगों में दबी हुई तुच्छ भावनाओं को उभारना पड़ता है।

*दुनिया को तबाही/मौत में झोंकने वाले तानाशाहों का प्रशंसक :*

     आर.एस.एस. ने भारत में फ़ासीवाद का अपना संस्करण तैयार किया। इसकी हिटलर और मुसोलिनी के फ़ासीवाद से काफी समानताएँ थीं और उनसे इन्होंने काफी कुछ सीखा। इनके नेता मौत के इन सौदागरों की खुलकर तारीफ़ करते रहे हैं।

      कुछ लोगों को आश्चर्य होता है कि संघ के लोग एक साथ हिटलर और उसके शिकार बने यहूदियों के देश इज़रायल, दोनों के प्रशंसक कैसे हो सकते हैं! मगर इसमें हैरानी की क्याू बात है? ये तो हमेशा ही हर आततायी और अत्याआचारी के भक्त रहे हैं। जब हिटलर उभार पर था और उसके बाद भी कई सालों तक ये अपनी शाखाओं में उसका गुणगान किया करते थे और एक संघी लेखक की लिखी हिटलर की जीवनी कार्यकर्ताओं को पढ़वाया करते थे। जब पूरी दुनिया में फ़ासिस्टों की थू-थू हो गयी और इन्हेंं लगा कि अब उसके नाम पर यहाँ राजनीति नहीं चलेगी, तो इन कायर पाखण्डियों ने हिटलर की जीवनियाँ छिपा दीं। मगर इनके दिलों में हिटलर, मुसोलिनी, तोजो, फ्रांको सब अब भी राज करते हैं और बन्दह कमरों में ये उनकी प्रशस्तियाँ गाया करते हैं।

     आज ये इज़रायल द्वारा फ़िलिस्तीनी जनता के बर्बर जनसंहार पर ख़ुश हो रहे हैं तो इसमें कुछ भी हैरत की बात नहीं है। याद कीजिए, अपने देश और पूरी दुनिया में कहीं भी, कभी भी आपने जनता के किसी शोषित-दमित तबके के साथ, किसी उत्पीड़ित क़ौम के साथ इन गिद्धों को खड़े देखा है? अपनी जगह-ज़मीन से उजाड़े जा रहे आदिवासियों के ख़िलाफ़ ये आक्रान्ता कम्पनी के पक्ष में खड़े मिलेंगे, मज़दूरों का हक़ मारने और उनका दमन करवाने वाले मालिकों के साथ खड़े मिलेंगे। बलात्कार और बर्बर हिंसा की शिकार स्त्रियों, लिंचिंग में मारे गये मुसलमानों, बर्बर अपमान और हिंसा के शिकार बनाये गये दलितों और तमाम ग़रीबों-मज़लूमों पर होने वाले हर अत्याचार और उत्पीड़न में ये ख़ुद शामिल होंगे या फिर अपराधियों के पक्ष में घिनौने तर्कों और हरकतों के साथ खड़े दिखाई देंगे। कश्मीर की जनता पर ढाये जा रहे जु़ल्मों पर ये संघी वैसे ही मज़ा लेते हैं जैसे ज़ायनवादी इज़रायली गाज़ा पर बरसते बमों का नज़ारा देखते हुए जश्नम मनाते हैं।

     गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफ़ाइण्ड’ में लिखा है –

“आज दुनिया की नज़रों में सबसे ज़्यादा जो दूसरा राष्ट्र है, वह है जर्मनी। यह राष्ट्रवाद का बहुत ज्वलन्त उदाहरण है।… आज वह राष्ट्रीयता जाग उठी है तथा उसने नये सिरे से विश्वयुद्ध छेड़ने का जोखिम उठाते हुए अपने ”पुरखों के क्षेत्र” पर एकजुट, अतुलनीय, विवादहीन, जर्मन साम्राज्य की स्थापना करने की ठान ली है।…” (गोलवलकर, ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड, पृ. 34-35)

गोलवलकर ने इसी पुस्तक में यहूदियों के क़त्लेआम का भरपूर समर्थन किया और इसे भारत के लिए एक सबक बताते हुए लिखा –

“…अपनी जाति और संस्कृति की शुद्धता बनाये रखने के लिए जर्मनी ने देश से सामी जातियों – यहूदियों का सफ़ाया करके विश्व को चौंका दिया है। जाति पर गर्वबोध यहाँ अपने सर्वोच्च रूप में व्यक्त हुआ है। जर्मनी ने यह भी बता दिया है कि सारी सदिच्छाओं के बावजूद जिन जातियों और संस्कृतियों के बीच मूलगामी फर्क हों, उन्हें एक रूप में कभी नहीं मिलाया जा सकता। हिन्दुस्तान में हम लोगों के लाभ के लिए यह एक अच्छा सबक है।” (गोलवलकर, वही, पृ. 35)।

हिटलर की इसी सोच को गोलवलकर भारत पर लागू कैसे करते हैं, देखिए :

“…जाति और संस्कृति की प्रशंसा के अलावा मन में कोई और विचार न लाना होगा, अर्थात हिन्दू राष्ट्रीय बन जाना होगा और हिन्दू जाति में मिलकर अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को गँवा देना होगा, या इस देश में पूरी तरह हिन्दू राष्ट्र की ग़ुलामी करते हुए, बिना कोई माँग किये, बिना किसी प्रकार का विशेषाधिकार माँगे, विशेष व्यवहार की कामना करने की तो उम्मीद ही न करें; यहाँ तक कि बिना नागरिकता के अधिकार के रहना होगा। उनके लिए इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए। हम एक प्राचीन राष्ट्र हैं। हमें उन विदेशी जातियों से जो हमारे देश में रह रही हैं उसी प्रकार निपटना चाहिए जैसे कि प्राचीन राष्ट्र विदेशी नस्लों से निपटा करते हैं।” (गोलवलकर, वही, पृ. 47-48)

बात बिल्कुल साफ़ है। मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति संघ के विचार वही हैं जो यहूदियों के प्रति हिटलर के थे।

*आर.एस.एस. का राष्ट्र कौन है?*

      देश में रहने वाले सभी लोग नहीं। केवल हिन्दू, लेकिन सारे हिन्दू भी नहीं। उच्च जाति के पुरुष हिन्दू। स्त्रियों को हिटलर और मुसोलिनी के समान ही पुरुष का सेवक और स्वस्थ बच्चे पैदा करने के यन्त्र से अधिक और कुछ नहीं माना गया है। वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत भी फ़रमा चुके हैं कि औरत का काम घर सँभालना है और अगर वह अपना “कर्तव्य” पूरा न करे तो पुरुष को उसे छोड़ देने का अधिकार है।

      इसके अलावा वे हिन्दू आर.एस.एस. के राष्ट्र में सम्मानित हैं जिनके पास समाज के संसाधनों का मालिकाना है। मज़दूरों-मेहनतकशों का काम है कि महान प्राचीन हिन्दू राष्ट्र की उन्नति और प्रगति के लिए बिना सवाल उठाये बस खटते रहें। इस पर सवाल खड़े करना या हक़-अधिकारों की बात करना राष्ट्र-विरोधी माना जाएगा। हर कोई अपना ‘कर्म’ करे, सवाल नहीं! कर्म आपके जन्म से तय होता है। आप जहाँ जिस घर में, जिस परिवार में जन्मे आपको वैसा ही कर्म करना है। या फिर जैसा आपके राष्ट्र, धर्म और जाति का नेता आपसे कहे! प्रतिरोध, विरोध और प्रश्न राष्ट्रद्रोह है! श्रद्धा-भाव से कर्म कीजिये! याद कीजिए, नरेन्द्र मोदी ने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते समय मैला ढोने वाले कर्मचारियों के बारे में क्या कहा था – कि यह उनका दैवी कर्तव्य है!

      हिटलर और मुसोलिनी ने भी अपने-अपने देशों में मज़दूरों के प्रति यही रुख़ अपनाया था। इन देशों में फ़ासीवादी सत्ताएँ आने के साथ ही ट्रेड यूनियनों को प्रतिबन्धित कर दिया गया था। फ़ासीवादियों की गुण्डा फौजों ने ट्रेड यूनियन आन्दोलन पर हिंसक हमले इटली और जर्मनी में तब भी किये जब वे सत्ता में नहीं थे। मुम्बई में ट्रेड यूनियन नेताओं, मज़दूरों और उनकी हड़तालों पर ऐसे ही हमले शिव सेना (जिसका फ़ासीवादियों से पुराना नाता रहा है) ने भी किये थे। देशभर में जगह-जगह बजरंग दल और विहिप के गुण्डों ने समय-समय पर पूँजीपतियों के पक्ष से मज़दूरों, उनके नेताओं और हड़तालों को तोड़ने का काम किया है। वे दूसरे तरीक़ों से भी मेहनतकशों की एकता को तोड़ने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं। मिसाल के तौर पर, हनतकशों के बीच ये ऐसे संगठन बनाते हैं जो उनकी बदहाली के लिए पूँजीपति वर्ग को ज़िम्मेदार नहीं ठहराते।

      धार्मिक अवसरों पर मज़दूरों के बीच पूजा आदि करवाना, कीर्तन करवाना – ये ऐसे संगठनों का मुख्य काम होता है। साथ ही ग़रीबों-मज़दूरों के दिमाग़ में यह बात भरी जाती है कि उनके हालात के ज़िम्मेदार अल्पसंख्यक हैं जो उनके रोज़गार आदि के अवसर छीन रहे हैं। इन संगठनों के नेताओं के मुँह से अक्सर ऐसी बात सुनने को मिल जाती है – “18 करोड़ मुसलमान मतलब 18 करोड़ हिन्दू बेरोज़गार।” इसे सुनकर फ्रांस के फ़ासिस्ट नेता मेरी लॉ पेन के उस कथन की याद आती है जिसमें उसने कहा था – “दस लाख प्रवासी मतलब दस लाख फ़्रांसीसी बेरोज़गार।”

      आर.एस.एस. का राष्ट्रवाद दरअसल पूँजीपति वर्ग की सेवा करने के लिए जनता को मूर्ख बनाने का एक औज़ार भर है। राष्ट्र से उनका मतलब पूँजीपति वर्ग और उच्च मध्य म वर्ग हैं, बाकी वर्गों की स्थिति अधीनस्थ होती है और उन्हें उच्च राष्ट्र की सेवा करनी होती है; यही उनका कर्तव्य और दायित्व होता है। प्रतिरोध करने वालों को ‘दैहिक और दैविक ताप से पूर्ण मुक्ति’ दे दी जाती है।

       फ़ासिस्ट समाज में अपना दबदबा और डर क़ायम करने के लिए हमेशा ही सड़कों पर झुण्डों में की जाने वाली हिंसा का सहारा लेते हैं। जर्मनी और इटली में भी ऐसा ही हुआ था और भारत में आर.एस.एस. ने यही रणनीति अपनायी है। विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल अक्सर इस तरीक़े को अपनाते हैं। 2002 में गुजरात के जनसंहार से लेकर पिछले 10 सालों में हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं में की गयी बर्बरता इसीके उदाहरण हैं।

*कार्यपद्धति और सत्ता तक पहुँचने का रास्ता :*

     जर्मनी और इटली की तरह यहाँ पर भी फ़ासिस्टों ने आगे बढ़ने के लिए जिन तौर-तरीक़ों का इस्तेमाल किया, वे थे सड़कों पर की जाने वाली भीड़ की हिंसा; पुलिस, नौकरशाही, सेना और मीडिया में घुसपैठ; कानून और संविधान का खुलेआम माख़ौल उड़ाते हुए अपनी आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देना और इस पर उदारवादी पूँजीवादी नेताओं की चुप्पी; शुरुआत में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना और फिर हर प्रकार के राजनीतिक विरोध को अपने हमले के दायरे में ले आना; शाखाओं, शिशु मन्दिरों, सांस्कृतिक केन्द्रों और धार्मिक त्योहारों का इस्तेमाल करते हुए मिथकों को समाज के कॉमनसेंस के तौर पर स्थापित कर देना।

      पिछले तीन-चार दशकों से लगातार जारी प्रचार का असर है कि आज उदारवादी हिन्दुओं में भी ऐसी बेबुनियाद धारणाएँ प्रचलित हैं कि मुसलमान कई-कई शादियाँ करते हैं, ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं, हिंसक होते हैं, हिन्दुओं को ख़त्म कर देना चाहते हैं, गन्दे रहते हैं, आदि-आदि। कहने की ज़रूरत नहीं कि इन बातों का सच्चाई से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। लेकिन शिक्षकों और जजों से लेकर लेखकों तक में आपको इस तरह की बातें करने वाले मिल जायेंगे।

       झूठा प्रचार तो दुनियाभर के फ़ासिस्टों की आम रणनीति रही है। अफ़वाहों का कुशलता से इस्तेमाल करना भी भारतीय फ़ासिस्टों की एक प्रमुख निशानी रही है। जर्मनी और इटली की तरह ही एक ही साथ कई तरह की बातें बोलना भी संघियों ने ख़ूब लागू किया है। उनका एक नर्म चेहरा होता है, एक उग्र चेहरा, एक मध्येवर्ती चेहरा और जब जिस चेहरे की ज़रूरत पड़ती है उसे आगे कर दिया जाता है। भारत में भी संघ का कोई एक स्थायी संविधान नहीं रहा। ये जब जैसी ज़रूरत वैसा चाल-चेहरा-चरित्र अपनाने के हामी होते हैं। सभी फ़ासिस्ट अवसरवादी होते हैं और अपने तात्कालिक राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं।

     इन तौर-तरीकों में से अधिकांश को संघियों ने अपने जर्मन और इतालवी पिताओं से ही सीखा है।

      कम्पनी राज के विरुद्ध 1857 के शानदार विद्रोह में हिन्दू-मुसलमानों ने मिलकर हिस्सा लिया था। उसके बाद से ही अंग्रेज़ दोनों के बीच फूट डालने में लगे हुए थे। 1890 के दशक और 1900 के दशक में हिन्दू और इस्लामी पुनरुत्थानवादियों के कारण हिन्दू-मुस्लिम तनाव पैदा हुए थे। लेकिन उस दौर में राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा किये गये प्रयासों के चलते ये तनाव जल्द सुलझा लिये गये। 1910 के दशक में भी ऐसे तनाव पैदा हुए थे लेकिन 1916 के लखनऊ समझौते और ख़िलाफ़त आन्दोलन और असहयोग आन्दोलन के मिलने से हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्द्र की स्थिति थी और वे अपने साझा दुश्मन के तौर पर ब्रिटिश हुकूमत को देखते थे।

       इस दौरान भी हिन्दू महासभा नामक हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन मौजूद था। लेकिन राष्ट्रवादी आन्दोलन द्वारा बनी हिन्दू-मुस्लिम एकता असहयोग आन्दोलन के पहले तक पूरी तरह टूट नहीं सकी, हालाँकि उसमें दरारें आनी शुरू हो गयी थीं। असहयोग आन्दोलन के अचानक वापस लिये जाने के साथ यह दरार बढ़ने लगी। यही समय था जब देश के तमाम हिस्सों में हिन्दू पुनरुत्थानवादियों का उभार हो रहा था। सावरकर बन्धुजओं का समय यही था। लगभग यही समय था जब बंकिम चन्द्र का उपन्यास ‘आनन्दमठ’ प्रकाशित हुआ और राष्ट्रवाद के स्वरूप को लेकर एक बहस देशभर में चल पड़ी।

     इसमें एक धारा कांग्रेस के राष्ट्रवाद की थी जो पूँजीपति वर्ग के हितों के नेतृत्व में आम जनता को साम्राज्यवाद के ख़िलाफ लेने की बात करता था। यह समझौतापरस्त था। यह सेक्युलर तो था मगर इसका सेक्युलरिज़्म स्वयं हिन्दू पुनरुत्थानवाद की ओर झुकाव रखता था। जो कांग्रेसी नेता पुनरुत्थानवादी रुझान नहीं रखते थे उनका सेक्युलरिज़्म भी सुधारवादी क़िस्म का था और साम्प्रदायिक कट्टरता के ख़िलाफ जुझारू ढंग से नहीं लड़ सकता था। दूसरी पोज़ीशन कम्युनिस्टों की थी। उन्होंने ईमानदारी से जनता को एकजुट करते हुए संघर्ष किया लेकिन अनेक मसलों पर दृष्टि साफ़ न हो पाने के कारण पूरे स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान उनसे कई ग़लतियाँ हुईं जिसके कारण वे कभी आन्दोलन के नेतृत्व को अपने हाथ में नहीं ले सके। और तीसरा पक्ष था हिन्दू साम्प्रदायिकतावादियों का जिन्होंने अपनी फ़ासीवादी विचारधारा को हिन्दू राष्ट्रवाद के चोगे में पेश किया। वे कितने राष्ट्रवादी थे यह तो हम देख ही चुके हैं। उनका असली प्रोजेक्ट फ़ासीवाद का था जिसे राष्ट्रवाद के चोगे में छिपाया गया था।

      1925 में आर.एस.एस. की स्थापना हुई। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने हिन्दू साम्प्रदायिकता और मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने और उन्हें आपस में लड़ाने का हर सम्भव प्रयास किया। कई इतिहासकार तो यहाँ तक मानते हैं कि भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता अंग्रेज़ों की ही पैदा की हुई चीज़ है। अंग्रेज़ों के आने से पहले किसी साम्प्रदायिक दंगे का कहीं कोई हवाला नहीं मिलता है। यह पुनरुत्थानवादी राष्ट्रवाद और अंग्रेज़ों की साज़िशों के संगम से पैदा हुई थी। बंगाल का विभाजन करने के पीछे अंग्रेज़ों का सबसे बड़ा मकसद यही था। कहीं वे हिन्दू फ़ासीवादियों का साथ देते तो कहीं इस्लामी कट्टरपन्थियों का। जनगणना का भी अंग्रेज़ों ने साम्प्रदायिकता बढ़ाने के लिए बख़ूबी इस्तेमाल किया। कम्युनिस्टों ने इन प्रयासों का प्रतिरोध किया लेकिन फ़ासीवाद से लड़ने की कोई सुसंगत रणनीति न होने के कारण यह प्रतिरोध सफल न हो पाया।

      1925 में संघ की स्थापना के 15 वर्ष बीतते-बीतते उसकी सदस्यता करीब एक लाख तक पहुँच चुकी थी। उस समय तक संघ एक हिन्दू पुनरुत्थानवादी और कट्टरपन्थी पोज़ीशन को अपनाता और उसका प्रचार करता था। उसके निशाने पर मुसलमान प्रमुख तौर पर थे। गोरों की ग़ुलामी का विरोध करना संघ ने कभी अपना कर्तव्य नहीं समझा और हमेशा अंग्रेज़ों का वफादार बना रहा। लेकिन हिन्दू राष्ट्रवाद की बात करना वह शुरू कर चुका था। उसके प्रचार में प्राचीन भारत के “हिन्दू” गौरव का गुणगान होता था। अभी फ़ासीवादी विचारधारा को लागू करने में संघ स्वयं प्रशिक्षित हो रहा था। 1930 के दशक के अन्त तक गोलवलकर के नेतृत्व में संघ आधुनिक फ़ासीवादी विचारधारा और कार्यप्रणाली को भारतीय सन्दर्भों में लागू करने की शुरुआत कर चुका था। शाखाओं का ताना-बाना देश के तमाम हिस्सों में फैलना शुरू हो चुका था। आज़ादी के आन्दोलन में अपनी शर्मनाक भूमिका को संघ ने आज़ादी के बाद अपने झूठे प्रचारों से ढँकना शुरू किया। यह काम संघ को आज तक करना पड़ता है क्योंकि संघ के नेताओं की ग़द्दारी के दस्तावेज़ी प्रमाण बड़े पैमाने पर मौजूद हैं, जैसे कि माफीनामे, मुखबिरी, वफ़ादारी के वायदे, आदि।

*1947 के बाद का फैलाव :*

     आज़ादी मिलने के बाद सत्ता कांग्रेस के हाथ में आयी और नेहरू प्रधानमन्त्री बने। गोलवलकर इस पर काफी हताश हुए और उन्होंने इसे मुसलमानों के हाथों मिली हार माना। इसके बाद संघ ने अपने तमाम संगठनों की स्थापना शुरू की जिनमें विश्व हिन्दू परिषद प्रमुख था। बाद में बजरंग दल, वनवासी कल्याण परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, दुर्गा वाहिनी, इत्यादि संगठनों की भी स्थापना की गयी। इन सभी संगठनों के ज़रिये संघ ने देश के कोने-कोने में और हर सामाजिक श्रेणी में अपने पाँव पसारने शुरू किये। संघ 1980 के आते-आते देश का सबसे बड़ा संगठन बन चुका था जिसके पास एक प्रशिक्षित कैडर फ़ोर्स थी।

      समाज में पैठ बनाने और राज्य में गहरी घुसपैठ की संघ की कोशिशें गाँधी की हत्या के बाद कुछ समय के लिए बाधित हुई, जिसने आर.एस.एस. को भारतीय राजनीति के हाशिए पर धकेल दिया। गृह मंत्री सरदार पटेल ने आर.एस.एस. पर प्रतिबन्ध लगाया लेकिन बाद में प्रतिबन्ध हटा लेने और आर.एस.एस. नेताओं की झूठी शपथों के आधार पर उसे मिली छूटों की बदौलत इसने फिर से अपना काम शुरू कर दिया। देश के विभाजन के बाद बने माहौल का भी इसने फ़ायदा उठाया और पाकिस्तान से आये शरणार्थियों के बीच भी इसका तेज़ी से आधार बना।

      बाद में राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी नेताओं की मदद से भी आर.एस.एस. राजनीति की मुख्य धारा में आने और यहाँ तक कि संघ के दल भारतीय जनसंघ के चुनावी प्रदर्शन में सुधार करने में भी कामयाब रहा। 1980 के दशक के उत्तरार्द्ध में पूँजीवादी संकट ने मध्यम वर्ग में असुरक्षा की भावना बढ़ा दी थी। महँगाई और बेरोज़गारी बढ़ रहे थे और कोई विकल्प नज़र नहीं आ रहा था। जनता पार्टी और वीपी सिंह के प्रयोग विफल हो चुके थे। इसी समय आर.एस.एस. ने राम मंदिर के मुद्दे पर लोगों को गोलबंद किया। कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकार की निष्क्रियता और मौन स्वीकृति ने इस प्रतिक्रियावादी सामाजिक आंदोलन को खड़ा करने में मदद की।

      निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों की शुरुआत हो रही थी और देशी पूँजीपतियों के साथ ही विदेशी पूँजीपति भी “स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट” की नीतियों को लागू कराने तथा कल्याणकारी राज्य के बचे-खुचे स्वरूप को भी ख़त्म करने के लिए दबाव डाल रहे थे। वे जानते थे कि इन नीतियों को लागू करने से व्यापक असन्तोष फैलेगा जिसे क़ाबू में करने और बिखराने के लिए फ़ासिस्टों की राजनीति ही सबसे कारगर साबित होगी। इसलिए आर.एस.एस. को देश के साथ ही बाहर से भी थैलीशाहों की मदद बड़े पैमाने पर मिलने लगी।

       बाबरी मस्जिद के विध्वंस के साथ यह आन्दोलन अपने चरम पर पहुँच गया। एक बड़ी उपलब्धि हासिल करने के बाद, हिन्दुत्ववादी ताकतों ने अपनी स्थिति को और भी मज़बूत करने पर ध्यान केन्द्रित किया और उन्होंने समाज में गहरी पैठ बनाने के अलावा सशस्त्र बलों, सिविल सेवाओं, न्यायपालिका और मीडिया में योजनाबद्ध ढंग से और गहरी पैठ बनाई।

      यह वह दौर था जब भाजपा ने पहली बार कुछ राज्यों में सरकारें बनायीं और फिर गठबन्धन सहयोगियों की मदद से पहली बार केन्द्र में भी सरकार बनायी। 2002 में, गुजरात जनसंहार के साथ, भारतीय फासीवाद के तेज़ उभार का दूसरा दौर आया, जिसके कारण समाज में साम्प्रदायिक विचारों का और अधिक प्रसार हुआ और मध्यम वर्ग के बड़े हिस्से में व्यापक साम्प्रदायिक सहमति बनी। इस दौर ने तथाकथित हिन्दू हृदय सम्राट नरेन्द्र मोदी के रूप में भारत में एक “फ़्यूहरर” पैदा कर दिया।

      हालाँकि व्यापक आर्थिक असन्तोष के कारण वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार 2004 के चुनावों में हार गयी। इसके बाद 2004 से 2014 के बीच एक दशक का अन्तराल रहा जिसमें दो यूपीए सरकारें सत्ता में रहीं लेकिन सत्ता से बाहर रहने के बावजूद संघ परिवार ने समाज में अपनी पकड़ बनाये रखी। बढ़ते आर्थिक संकट के माहौल में पूँजीपतियों का बड़ा हिस्सा फिर से फ़ासिस्टों को सत्ता में लाने के लिए उतावला हो रहा था। 2013 में ‘वाइब्रेंट गुजरात’ सम्मेलन के दौरान टाटा सहित देश के अनेक बड़े उद्योगपतियों ने नरेन्द्र मोदी को देश का अगला प्रधानमंत्री घोषित ही कर दिया। इसके बाद, आर.एस.एस. के पूरे समर्थन और मदद से हुए अन्ना आन्दोलन और बड़ी पूँजी की ताक़त से हुए अन्धाधुन्ध प्रचार की बदौलत कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की बढ़ती अलोकप्रियता का पूरा फ़ायदा मोदी और भाजपा को मिला।

      पिछले 10 सालों के दौरान भारतीय फ़ासीवाद ने अपने उभार का तीसरा दौर देखा, जिसमें कॉरपोरेट मीडिया की पूरी मिलीभगत से नरेंद्र मोदी के समर्थन में प्रतिक्रियावादी उन्माद पैदा किया गया। नतीजतन, 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया। तब से, भारत की जनता एक फ़ासिस्ट शासन के तहत एक दुःस्वप्न से गुज़र रही है, जिसने चुनावी प्रक्रिया, अन्य लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और संस्थानों, न्यायपालिका आदि को नष्ट करके बुर्जुआ लोकतांत्रिक जनतंत्र को अभूतपूर्व तरीके से नष्ट कर दिया है। संविधान काग़ज़ पर रह गया है, संवैधानिक संस्थाओं का बस ढाँचा रह गया है। जनतंत्र का केवल खोल बाक़ी रह गया है, अन्दर से यह एक फ़ासिस्ट शासन-तन्त्र बन चुका है जिसे हिन्दुत्ववाद की राजनीति अपने एजेण्डा को आगे बढ़ाने और अपने विरोधियों को कुचलने के लिए मनचाहे ढंग से इस्तेमाल करने में कामयाब है।

      पिछले लोकसभा चुनाव और उसके बाद के घटनाक्रम ने इस बात को और भी स्पष्ट कर दिया है कि हिन्दुत्ववादी प्रोजेक्ट को फ़ैसलाकुन शिकस्त देना महज़ चुनावी हार-जीत का सवाल नहीं है। सत्ता में बने रहने के लिए वे हर तरह की तिकड़में अपनायेंगे। नैतिक-अनैतिक, क़ानूनी-ग़ैरक़ानूनी का उनके लिए कोई मतलब नहीं है। अगर किसी तरह से वे कुछ चुनावों में हार भी गये तो समाज में और सत्ता के समूचे तंत्र में उनकी घुसपैठ बनी रहेगी और व्यवस्था के संकट तथा उदारवादी पार्टियों की कमज़ोरी का फ़ायदा उठाकर वे फिर से सत्ता में लौट आयेंगे। पहले से भी ज़्यादा ख़तरनाक होकर। व्यापक जनाधार वाला एक   सामाजिक-राजनीतिक-वैचारिक-सांस्कृतिक आन्दोलन खड़ा करके ही इनको पीछे धकेला जा सकता है। इसके लिए एक मज़बूत, ईमानदार और जनता से जुड़ी हुई काडर-आधारित सच्ची सेक्युलर पार्टी खड़ी करना भी उतना ही ज़रूरी है।

(स्रोत : ‘तज़किरा’ अंक-3, जून 25

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