–बाबूलाल दाहिया
हम लोकतंत्र में रह रहे है। राजतंत्र कितना भी अच्छा रहा हो पर वह जनतंत्र से अच्छा नही हो सकता। क्यो कि एक ही वंश में अलग – अलग तरह के राजा हो सकते है ।लेकिन जनतंत्र में जनता को ही अपने लिए उपयुक्त राजा चुनने का अधिकार प्राप्त है। पर इसके बाबजूद भी अशोक, अकबर और शिवा जी ऐसे शासक हैं जो जन आकांक्षाओं के अनुरूप माने जाते हैं।
शिवा जी राजा तो बने पर उन्हें राज्य गद्दी विरासत में नही मिली थी। उन्होंने उसे अपने बाहुबल से अर्जित किया था। उनके पिता एवं दादा जागीरदार अवश्य थे पर ऐसे स्थान पर जहां दो राज्यों की सीमा थी। अस्तु उनके किसानों की जमीन जायदाद और फसल दो राजाओ के द्वंद में लुटती रहती थी। इसलिए उन्हे किसानों की दुर्दशा एवं लूट खसोट का व्यापक अनुभव था।
यही कारण था कि पहले राजा और फिर क्षत्रपति ” महाराज” की उपाधि धारण करने पर उनने सर्व प्रथम किसानों का दिल जीता और मुखिया पटेल जैसी वसूली की प्रथा को समाप्त कर राजा एवं किसान के बीच सीधा रिश्ता बनाया। किसानों को भूमि सुधार हेतु सामान्य किस्तों पर ऋण दिए एवं अकाल के समय लागान की पूरी माफी भी की।
पहले राजाओं की सेना निकलती तो वह जानबूझ कर किसानों की फसल रौदती जाती थी। पर उन्होंने अपनी सेना के लिए मेड से निकलने हेतु नियम बनाए। पहले शिवाजी की छवि मेरे दिलोदिमाग में भी एक हिन्दू शासक की ही थी जो ,अफजल खां और उनके बीच के कूट रचित युद्ध की सुनाई जाती थी । पर जब हमारा 11 सदस्यीय साहित्यकारों का दल दक्षिण भारत यात्रा में गया और ठीक आज के तारीख में ही हम लोग कोल्हापुर विश्वविद्यालय में रुक कर वहां का. गोविंद पानसरे की पुस्तक पढा तब उनकी सही तश्वीर उभर कर आई।
तात्कालीन व्यवस्था में शिवा जी एक शूद्र राजा थे जिनका पुरोहित ने पैर के अंगूठे से राज तिलक किया था अस्तु कोई कुलीन लोग तो उनके साथ होने को रहे ? यही कारण था कि उनकी सेना में प्रमुख रूप से कृषक मराठे और मुस्लिम ही थे। नौसेना का सेना पति मुस्लिम, उनके फौज का सेना पति मदारी मेहतर मुस्लिम और अनेक महकमो के प्रमुख मुस्लिम ही थे।
जिस अफज़ल खान के साथ उनका युद्ध सर्व विदित है वह अफजल खान कोई शासक नही बल्कि बीजापुर के सुल्तान का सेनापति था। दोनों तरफ से युद्ध की तैयारी थी तभी उसने प्रस्ताव रखा कि ” शिवाजी हम से सन्धि करले तो खून खराबा न हो?” और शिवाजी भेट के लिए राजी हो गए।
पर जब वे उससे भेट करने जाने लगे तो उनके मुस्लिम अंग रक्षक ने कहा कि ” महाराज अफज़ल खान 6 फुटा अफगानी पठान है। वह भेट करते समय आप को बाह में दबा कर मार सकता है। ऐसी स्थिति में आप के पास बचाव के क्या साधन हैं ? क्योकि अंग रक्षक होने के नाते सुरक्षा का दायित्व तो मेरे ऊपर ही है?”
जब शिवाजी ने उसे अपना बघनखा दिखाया तब वह सन्तुष्ट हुआ। पर शिवा जी से भेट करने अफजल खा आया तो उसका अंगरक्षक भी कोई मुस्लिम नही बल्कि हिन्दू ‘ (कुलकर्णी ) था और शिवाजी का वही मुस्लिम जाबाज मदारी मेहतर जो दोनों मंच के नीचे खड़े थे।
जैसे ही भेट करते समय अफज़ल खान अपनी कटार भोंकना चाहा उसके पहले ही शिवाजी के बघनखा ने उसका काम तमाम कर दिया। अफज़ल खान को लड़खड़ाता देख कुलकर्णी शिवाजी के ऊपर तलवार लेकर दौड़ा पर शिवाजी के सतर्क अंग रक्षक की तलवार वह न झेल सका ।
शिवाजी धार्मिक थे पर धर्मान्ध नही। उनने अपने एवं अपनी प्रजा के पूजा दर्शन केलिए अगर जगदीश मन्दिर बनवाया तो मुस्लिमो के लिए मस्जिद भी। किन्तु इन दिनों जिस प्रकार उनकी एक हिन्दू सांप्रदायिक राजा की छवि पेश की जारही है वह ठीक नही।

