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*महिलाओं, बेरोज़गारों के श्रम की लूट का सरंजाम है ग्रामीण आजीविका मिशन*

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         ~ पुष्पा गुप्ता

     क़ृषिगत पूँजीवादी विकास के चलते एक बड़ी ग्रामीण आबादी खेती-बाड़ी से उजड़कर विशाल सर्वहारा वर्ग का हिस्सा बनती जा रही रही है। कृषि क्षेत्र में रोज़गार के अवसर लगातार कम होते जा रहे हैं। एक बड़ी आबादी जीविका की तलाश में औद्योगिक शहरों की तरफ पलायन कर रही है। इन शहरों में इतनी बड़ी आबादी को खपा पाने की क्षमता नहीं है और अनियंत्रित रूप से बढ़ता यह प्रवासन पूँजीवादी व्यवस्था में विस्फोटक स्थिति पैदा कर सकता है।

      इसलिए उस व्यवस्था के दूरदर्शी पहरेदार बीच-बीच में ऐसी योजनाएँ पेश करते हैं जो ऊपरी तौर पर तो जनपक्षधर लगती हैं लेकिन जिनका मकसद लूट पर टिकी इस मानवद्रोही व्यवस्था के जीवन को लम्बा बनाना है।

       इसी तरह की एक योजना ‘दीनदयाल अंत्योदय योजना राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ है। इस योजना के तहत ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने और स्थानीय स्तर पर रोज़गार का सपना बेचा जा रहा है।

*क्या है एनएलआरएम योजना?*

      1999 में भारत सरकार के ग्रामीण विकास मन्त्रालय द्वारा ‘स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोज़गार योजना’ लायी गयी। 2013 में इसका नाम ‘राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ कर दिया गया। जिसे मोदी सरकार ने 26 मार्च 2016 को ‘दीनदयाल अंत्योदय योजना राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ कर दिया।

      यह योजना देश के 30 राज्यों के 600 जिलों, 6769 ब्लॉक, 2.5 लाख ग्राम पंचायतों में संचालित हो रही है। इसमें 9 से 10 करोड़ ग़रीब महिलाओं के द्वारा परिवार को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ते हुए उन्हें पंचायत स्तर पर ग्राम संगठन एवं ब्लॉक स्तर पर संकुल स्तरीय संघ से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है।

     योजना के तहत 10 महिलाओं के समूह को केन्द्र सरकार ब्याज पर 1,10,000 की धनराशि स्वरोज़गार के लिए देती है। यानी प्रत्येक परिवार के हिस्से में स्वरोज़गार के हसीन सपनों के लिए ब्याज़ पर 11,000 रुपये आते हैं! कोई भी समझ सकता है कि महँगाई के दौर में 11,000 रुपये में चाय की दुकान भी नहीं खोली जा सकती।

       इस तरह सरकार की यह योजना मेहनतकश आबादी को स्वरोज़गार के माध्यम से अमीर बनाने के मीठे सपने दिखाकर मनरेगा की ही तरह ग्रामीण महिलाओं को भुखमरी की रेखा पर गाँवों की चौहद्दी में क़ैद करने की योजना है।

*मिशन द्वारा प्रदत्त रोज़गार की हक़ीक़त*

       सरकारों और उसके भोंपू मीडिया का दावा है कि इस योजना के जरिये महिला सशक्तिकरण हो रहा है और देश की महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। लेकिन हक़ीक़त यह है कि इस योजना के ज़रिये ग्रामीण महिलाओं का सर्वाधिक बर्बर शोषण किया जा रहा है।

       इसे कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है। इस योजना के तहत एक ग्राम पंचायत में एक बैंक करेसपोंडेंट (बी.सी.) सखी बनायी गयी है, जिसे प्रत्येक ग्राम पंचायत में बी.सी. केन्द्र खोलने के लिए ब्याज पर 75000 रुपये दिया जाता है। बी.सी. सखी का काम लोगों की बैंक सम्बन्धी परेशानियों का निस्तारण करना है।

     इस बी.सी. सखी को मात्र छह माह तक ही 4 हज़ार रुपये का मानदेय दिया जाता है और इसके बाद सरकार इन्हें आत्मनिर्भर मान लेती है। चूँकि इनके ऊपर 75000 का क़र्ज़ है इसलिए ये इस काम को छोड़ भी नहीं सकती हैं। उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या लगभग 40 हज़ार है।

      बैंक सखी – यह समूह की वो महिला है जिसे बैंक में बैठ कर कार्य करना है, इनका मानदेय भी 4 हज़ार रुपए रखा गया है। इन्हें चार हज़ार में ही बैंक कर्मचारियों के बराबर काम करना पड़ता है। उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या लगभग पाँच हज़ार है। इन बैंक सखियों को सरकारी कर्मचारियों की घृणा और हेय दृष्टि का शिकार भी होना पड़ता है।

    समूह सखी – यह समूहों को संचालित करने व लेखा-जोखा रखने हेतु प्रत्येक ग्राम में रखी जाती है, जिसे मानदेय के रूप में मात्र बारह सौ रुपये ही दिये जाते हैं। उत्तर प्रदेश में इनकी संख्या लगभग 58 हज़ार है। इनके अलावा सरकार ने समूहों को संचालित करने के लिए कई अन्य कैडर भी रखे हैं, जैसे, विद्युत सखी/ बिजली सखी, स्वास्थ्य सखी, ग्राम संगठन बुक-कीपर, समूह गठन के लिए आई.सी.आर.पी., आजीविका सखी, पशु सखी, मनरेगा-मेट सखी आदि और इन सभी सखियों की एक ही कहानी है।

      दरअसल यह मिशन महिला सशक्तिकरण के नाम पर महिलाओं के श्रम की खुली लूट है। दिहाड़ी मजदूरों से भी कम मज़दूरी पर इन महिलाओं को खटाया जा रहा है और सरकार फ़र्जी आँकड़ों की बाज़ीगरी कर इन्हें अपने सरकारी रजिस्टर में रोज़गारशुदा दिखाती है।

*मिशन के संविदाकर्मियों की स्थिति :*

     इस पूरी योजना की देखरेख और सुचारु ढंग से चलाने के लिए प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा संविदा नीति- 2013 (असल में ठेकाप्रथा) के तहत मल्टीलेयर संविदाकर्मियों की भर्ती की गयी है जिन्हें अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग नाम दिया गया है।

    उत्तर प्रदेश में इन्हें डाटा एंट्री ऑपरेटर, क्लस्टर को-ऑर्डिनेटर, यंग-प्रोफेशनल, ब्लॉक-मिशन मैनेजर, जिला मिशन मैनेजर एवं स्टेट मिशन मैनेजर का नाम दिया गया है। उत्तर प्रदेश में 10 हज़ार मिशनकर्मियों की मंजूरी है लेकिन उत्तर प्रदेश की योगी सरकार यह काम 4,000 मिशनकर्मियों से करवा रही है। ऊपर से इन मिशनकर्मियों से पोलियो पिलाने से लेकर चुनाव में ड्यूटी आदि काम भी लिए जाते हैं।

       चूँकि सरकार इन कर्मियों को ठेकाप्रथा के तहत मान्यता देती है इसलिए इन्हें किसी भी प्रकार की सरकारी राहत या योजना का लाभ नहीं दिया जाता। उत्तर प्रदेश में मिशनकार्मिकों को घर से 500-500 किमी की दूर काम पर रखा गया है और ठेका व्यवस्था का हवाला देते हुए 2021 से तबादला नीति को खत्म कर दिया है।

     मलतब इन कर्मियों को बेहद कम मानदेय पर घर से बाहर किराए पर रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इन कर्मियों को सुरक्षा बीमा के नाम पर कुछ भी हासिल नहीं है। काम के दौरान होने वाली किसी दुर्घटना और यहाँ तक की पिछले 5 वर्षों में काम के दौरान लगभग 25 मिशनकर्मियों की मौत हो चुकी है लेकिन किसी को कोई मुआवज़ा नहीं मिला है। महँगाई आसमान छू रही है लेकिन मिशनकर्मियों के वेतन में 2016 से कोई वृद्धि नहीं की गयी है।

उपरोक्त आँकड़ों से स्पष्ट है कि केन्द्र सरकार का यह मिशन ग्रामीण महिलाओं और आम बेरोज़गार नौजवानों के शोषण-उत्पीड़न का मिशन है। दरअसल मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था की आन्तरिक गति ही ऐसी है कि अपने उत्तरोत्तर विकास के साथ यह एक बड़ी आबादी को तबाही-बर्बादी की तरफ ढकेलती है।

      जिसकी वजह से जनाक्रोश फूटने का डर हमेशा बना रहता है। पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा सताये हुये आम लोगों के आक्रोश को ठंडा करने के लिए हुक्मरान बीच-बीच में ऐसी योजनाएँ पेश कर जनता की आँख में धूल झोकने का काम करते हैं।

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