अग्नि आलोक

रूस-यूक्रेन युद्ध बनाम परमाणु युद्ध बनाम महाविनाश:दो शब्द

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निर्मल कुमार शर्मा,

प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्धों में इस दुनिया के करोड़ों लोगों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा था,क्योंकि तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य वादियों और उनके पिछलग्गू देशों के कुछ समूहों ने जर्मनी की जबर्दस्त व्यापारिक नाकेबंदी कर दी थी ! आज ठीक 108वर्षों बाद अमेरिकी साम्राज्यवादियों और उनके पिछलग्गू देशों ने अपने नापाक सैन्य संगठन नाटो के माध्यम से रूस की बेइंतहां सैन्य नाकेबंदी कर दी है ! जाहिर है इसका दुष्परिणाम रूस -यूक्रेन युद्ध की चिनगारी के रूप में भड़क उठा है ! यह चिनगारी बड़ी तेजी से तृतीय विश्वयुद्ध के दावानल की तरफ बढ़ रही है,क्योंकि अमेरिकी साम्राज्यवादियों और उनके पिछलग्गू देश इस युद्ध में चोरी-छिपे यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति करके इस युद्ध को और लम्बा खींच ने का कुकृत्य कर रहे हैं,दूसरे शब्दों में इस युद्ध को और तीव्र भड़काने के लिए हथियार रूपी आहुति डाली रहे हैं,जो आग में घी डालने जैसा कुकृत्य ही है ! अमेरिका और यूरोपियन देशों द्वारा जानबूझकर किए जाने वाले इस कुकृत्यों से रूस की धैर्य की सीमा अब टूटती जा रही है !
प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्धों की शुरुआत भी छोटे-छोटे कारणों से ही हुई थी ! रूस-यूक्रेन युद्ध भी अमेरिकियों के रूस की पश्चिमी सीमा से सटे देशों को स्वयं नीत नापाक सैन्य संगठन नाटो में सम्मिलित करने का उतावलापन और यूक्रेन को की जानेवाली हथियारों की मदद कहीं इस युद्ध को भी तृतीय विश्व युद्ध में न बदल दे ! अमेरिकी संसद की एक समिति आफिस आफ टेक्नालॉजी एसेसमेंट ने वर्ष 1979 में एक रिपोर्ट तैयार किया था,उसके अनुसार अगर अमेरिका और रूस में दुर्भाग्यवश परमाण्विक युद्ध होता है,तो अमेरिका के 77प्रतिशत और रूस के 40 प्रतिशत तक लोगों की मौत हो सकती है !
अल्बर्ट आइंस्टीन से किसी पत्रकार ने पूछा था कि ‘संभावित तृतीय विश्व युद्ध में इस दुनिया की कितनी क्षति होगी ? ‘ इसके प्रत्युत्तर में उस महान स्वप्नदृष्टा अल्बर्ट आइंस्टीन ने उस पत्रकार से पलटकर कहा था कि ‘मुझसे तृतीय नहीं चौथे विश्वयुद्ध की बात करो,जो कभी होगा ही नहीं ! ‘ उस महान स्वप्नदृष्टा और भौतिकी के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक ने प्रतीकों में इस दुनिया के राजनीति के मूर्ख कर्णधारों को यह समझाने की कोशिश किया था,कि अगर तृतीय विश्व युद्ध हुआ तो इस पूरे ब्रह्माण्ड में सांसों के स्पंदन से युक्त इस धरती,इसके समस्त जैवमण्डल,इसके पर्यावरण आदि की इतनी अकथनीय क्षति होगी,जिसकी भरपाई शायद लाखों वर्षों तक भी नहीं हो पाएगी ! जिससे कि चौथे विश्व युद्ध की नौबत कभी आएगी ही नहीं !
वर्ष 1983 में एक अन्य महान स्वप्नदृष्टा, खगोलविद,भौतिकी और रसायन शास्त्र के महामनीषी कार्ल सागन के साथ रिचर्ड पी टर्को,थामस पी एकरमैन,जेम्स बी पोलाक आदि महान वैज्ञानिकों ने परमाणु युद्ध होने के बाद के दुष्प्रभावों का एक विशद अध्ययन किया था,इस अध्ययन के अनुसार परमाणु युद्ध से पैदा हुए 150मिलियन टन धुंआ इस धरती के ओजोन परत से भी ऊपर स्थित सबसे ऊपरी समताप मंडल में इकट्ठा होकर छा जाएगा,जिससे इस धरती के कम से कम 10 प्रतिशत भाग पर सूरज महीनों तक नहीं दिखेगा,यूरोप,रूस,अमेरिका और चीन के अधिकांश हिस्सों में तापमान शून्य से 12 से लेकर 20 डिग्री सेल्सियस तक और रूस के कुछ भागों में तो तापमान शून्य से 35 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाएगा और इस धरती का औसत तापमान अचानक शून्य से 7डिग्री सेल्सियस तक गिर जाएगा ! ज्ञातव्य है महाहिमयुग या Ice Age में इस धरती का तापमान केवल शून्य से 5डिग्री सेल्सियस ही गिरा था ! उस दु:स्थिति में दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में अकाल पड़ सकता है,जिससे इस दुनिया के करीब 2अरब लोग तत्काल भूखमरी के शिकार होकर और ठंड से ठिठुरकर तड़प-तड़पकर मर जाएंगे।
वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की एक टीम द्वारा बनाई गई स्विट्जरलैंड की एक संस्था नाभिकीय निरस्तीकरण हेतु अंतर्राष्ट्रीय अभियान या International Compaign to Abolish Weapons के अनुसार अगर अमेरिका,रूस या यूक्रेन कहीं भी 10 से 100 तक परमाणु बमों को गिरा दिया जाय तो तुरंत करोड़ों लोगों की मौत के साथ-साथ इस धरती का समस्त पर्यावरण ही असंतुलित होकर रह जाएगा ! वास्तविकता यह है कि केवल एक परमाणु बम एक बड़े से बड़े शहर को मिनटों में नेस्तनाबूद और आग के गोले में बदल देने के लिए काफी होता है ! दुनिया के टोकियो, मैक्सिको सिटी और मुंबई जैसे घने बसे शहरों में, जहां प्रतिवर्ग किलोमीटर में ही लाखों लोगों से भी ज्यादे लोग रहते हैं, वहां परमाणु बमों से सबसे ज्यादा जान-माल की तबाही होगी, वहां तुरंत 10लाख लोग मौत के मुंह में चले जाएंगे ! इस दुनिया में कुल रखे 13410 परमाणु बमों के मात्र 1 प्रतिशत बमों का भी युद्ध में दुरूपयोग हो जाय तो उनके पर्यावरणीय दुष्प्रभावों से इस दुनिया के 2 करोड़ लोग तुरंत भूखमरी से कुछ ही दिनों में मर जाएंगे !
अमेरिकी नरपिशाच राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बमों के गिराने के पागलपन की हद तक मानवता विरोधी फैसले के बाद वहां गिराए गए लिटिल ब्वाय व फैटमैन नामक परमाणु बमों से वहां की धरती की सतह का तापमान कुछ सेकेंडों में ही 4000 डिग्री सेल्सियस तक के उच्च तापमान पर पहुंच गया था !जबकि लोहा मात्र 1538 डिग्री सेल्सियस पर ही तरल बनकर पानी की तरह बहने लगता है ! परमाणु बमों के विस्फोट स्थलों पर स्थित मनुष्यों को सैकड़ों सालों बाद तक भी ल्यूकोरिया,कैंसर,विकलांगता,फेफड़ों की बीमारियों के अलावा अन्य तमाम तरह की बीमारियां होतीं ही रहतीं हैं !
इसलिए हर हाल में परमाणु युद्ध से बचा जाना चाहिए,अमेरिकी कर्णधारों को समझाया जाना चाहिए कि नाटो सैन्य संगठन के बगैर भी दुनिया सुखी रह सकती है ! इस दुनिया,इस पर रहनेवाले मनुष्यों सहित सभी जीव-जंतु, यहां की करोड़ों की संख्या में फल-फूल,अन्न आदि लाखों किस्म के पेड़-पौधे,इंद्रधनुष,बादल,वर्षा आदि इस धरती के अमूल्य निधि हैं,जो अब तक ज्ञात ब्रह्माण्ड में कहीं नहीं हैं,इसलिए अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए परमाणु युद्ध लड़ने की परिस्थितियों को पैदा करना एक महापागलपन के सिवा कुछ नहीं है ! उक्त वर्णित सभी अमूल्य धरोहरें इस धरती के प्रकृति ने करोड़ों-अरबों सालों के अथक परिश्रम से निर्मित किया है,जिसे परमाण्विक युद्ध में मिनटों में नष्ट कर देना कतई बुद्धिमानी नहीं है ! याद रखिए आज आप परमाणु बमों से इस धरती के समस्त जैवमण्डल को मिनटों में नष्ट तो कर सकते हैं, लेकिन सृजन के नाम पर एक छोटा पतंगा भी नहीं बना सकते ! इसलिए हे इस धरती के कथित सबसे बुद्धिमान मानवों ! इस धरती को सदा-सदा के लिए वीरान बनाने का ‘पागलपन ‘मत करो !

        -निर्मल कुमार शर्मा, 'गौरैया एवम् पर्यावरण संरक्षण तथा देश-विदेश के समाचार पत्र-पत्रिकाओं में पाखंड, अंधविश्वास,राजनैतिक, सामाजिक,आर्थिक,वैज्ञानिक, पर्यावरण आदि सभी विषयों पर बेखौफ,निष्पृह और स्वतंत्र रूप से लेखन ', गाजियाबाद, उप्र,
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