*सुसंस्कृति परिहार
किसान आंदोलन के सौ दिन पूरे हुए। उन्होंने एक लंबी अवधि पूर्ण कर ली है जो आज़ाद भारत में चलाए गए अब तक के आंदोलनों में सबसे अधिक है । आमतौर पर अब तक चले आंदोलनों की ख़ासियत ये रही है कि उनकी मांगों पर सरकार ने दो चार दिनों में विचार कर लिया और कुछ मांगे मान ली गई और कुछ छोड़ दी जाती थीं भविष्य में पूरी करने के आश्वासन के साथ। मज़दूरों के आंदलनों का इतिहास रहा है उन्होंने आंदोलनों के ज़रिए बहुत कुछ हासिल किया । शासकीय कर्मचारियों ने भी आंदोलनों से काफ़ी कुछ अर्जित किया है । इससे पहले बड़े किसान आंदोलन भी हुए हैं पर वे संतुष्ट होकर ही गए हैं लेकिन इस बार का आंदोलन जो मांग रहा है वह जन जन के हित के साथ देश में पनपती पूंजीवादी ताकतों के खिलाफ है जिसके सम्मोहन में भारत सरकार कैद है ।उसे जनहित से ज्यादा हमारे दो अडानी-अंबानी की चिंता है। किसान नेताओं ने देश की इस व्यथा को समझा है इसलिए वे प्राणप्रण से इस आंदोलन को जयी होने तक ले जाने प्रतिबद्ध हैं।इन देशप्रेमियों को अनगिनत सलाम ।
,ठंड,कोहरा,आंधी ,पानी,बर्फबारी
,बिजली की कड़क के बीच सड़क पर गुज़रे सौ दिन के बाद भीषण गर्मी और लू के थपेड़ो के बीच भी ये डटे रहेंगे कतिपय संवेदनशील लोग जब इनकी तकलीफ़ से सिहर कर सवाल करते हैं कि बहुत हो गया तो वे अंग्रेजी शासन काल के पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन जो सन् 1907में नौ माह से अधिक चला था ,की याद कर दूने उत्साह से भर जाते हैं कहते हैं ये हमारे पूर्वजों का इतिहास है अभी तो सिर्फ सौ दिन ही हुए हैं।वे बिल्कुल सही कह रहे हैं और इसीलिए 5 मार्च को कषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे किसानों ने पगड़ी संभाल जट्टा दिवस मनाया। रेवाड़ी बॉर्डर पर राजस्थान, हरियाणा, पंजाब व महाराष्ट्र के किसान अपने-अपने संगठन के रंग की पगड़ी पहनकर पहुंचे। इस पगड़ी संभाल लहर का जन्मदाता भी पंजाब है। 1907 में पंजाब में किसानों की एक रैली हुई थी। इसमें एक अखबार झांग स्याल के संपादक बांके दयाल ने एक गीत गाया था, जिसके बोल थे… पगड़ी संभाल जट्टा। इस गीत ने प्रदर्शनकारियों पर ऐसा असर डाला कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रदर्शन तेज हो गया था। जिस आंदोलन में यह गीत गाया गया था, वह शहीद ए आजम भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह ने छेड़ा था। अजीत सिंह 23 फरवरी 1881 को पंजाब के खटकड़ कलां गांव में पैदा हुए थे। उनके बड़े भाई किशन सिंह भगत सिंह के पिता थे। उनके छोटे भाई का नाम स्वर्ण सिंह था। उन्होंने भी स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लिया था। अजीत सिंह पंजाब के पहले आंदोलनकारियों में शामिल माने जाते हैं। पगड़ी संभाल जट्टा वस्तुत:पगड़ी के सम्मान से जुड़ा होता है ।पांच मार्च को तमाम उपस्थित किसानों ने ना सिर्फ पगड़ी बांधी बल्कि उसके सम्मान की खातिर प्रतिबद्ध हुए।आठ मार्च को कृषक महिलाओं ने महिला दिवस भी पहली बार सड़क पर मनाया ।आज से लगभग सवा सौ साल पहले हुए, पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन में भी महिलाओं की भागीदारी थी और इस आंदोलन ने अंग्रेजों के कानूनों से मुक्ति दिलाई थी ।तब और अब के आंदोलन में कोई खास परिवर्तन नहीं है ।बस इतना ही कि पहले वह आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ था आज वह देश की सरकार के विरुद्ध है।पहले उसमें सिर्फ पंजाब के किसान थे आज पूरे देश के किसान और बहुसंख्यक देशवासी उनके साथ है ।
इन दिनों जगह जगह हो रहीं हैं किसान महापंचायतें और उनमें जुट रही भीड़ इस बात को पुष्ट कर रही हैं कि देर सबेर सरकार को तीनों किसान बिल वापस लेने होंगे।यदि ऐसा नहीं होता है तो आंदोलन जारी रहेगा ही,तब जनमत भाजपा सरकार के खिलाफ हो जाए तो बड़ी बात नहीं।पांच राज्यों के चुनाव में ये असर दिखने लगा है।किसान भाजपा का बड़ा जनाधार था वह बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुआ है वो भविष्य में सरकार को ज़मी पर ला सकता है।आंदोलन के सौ दिन और पगड़ी संभाल जट्टा की पुनर्वापसी ने किसानों को और सक्षम तथा समर्थ बनाया है इस पर सरकार को पहलकदमी करनी चाहिए।

