डॉ. विकास मानव
(लेख में पुरुष शब्द का अर्थ ‘नर-नारी’ दोनों, यानी मनुष्यमात्र है.)
ईश्वर-पथ के अंतर्गत दो मुख्य भूमियां हैं–सांख्य-भूमि और योग-भूमि। योग-शास्त्र के प्रणेताओं में महर्षि पतंजलि का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने भी सांख्य को पूर्णरूपेण स्वीकार किया है। दोनों की मान्यताओं में थोड़ा अन्तर होते हुए भी मुख्य विषय दोनों के एक जैसे हैं। लेकिन सांख्य को बिना हृदयंगम किये योग के रहस्य को समझ पाना कठिन है। इसलिए सांख्य के प्रवर्तक कपिल मुनि का स्थान ऊँचा है। योगियों में श्रेष्ठ माने गए है– –“सिद्धानाम् कपिलो मुनिः।”
सांख्य सर्वप्राचीन दर्शन शास्त्र है। मनोविज्ञान, परामनोविज्ञान का तो वह मूलस्रोत ही माना जाता है।
सांख्य शब्द 'सम' पूर्वक 'ख्यात्र' धातु से बना है। इसका अर्थ है--'सम्यक् ख्यानम्'। अर्थात्--सम्यक् विचार। इसी सम्यक् विचार का नाम 'विवेक' है, 'बुद्धि' है। सांख्य का लक्ष्य है--परमपद प्राप्त करना। लेकिन परम पद की प्राप्ति तब तक सम्भव नहीं, जब तक दुःखों की आत्यंतिक निवृत्ति नहीं हो जाती। आत्यंतिक दुःख की निवृत्ति के लिए आत्म-साक्षात्कार जरुरी है। आत्म- दर्शन आवश्यक है और यह तभी संभव है जब हमारी अविद्या का पूर्ण प्रणाश हो जाता है। अविद्या त्रिगुणात्मिका है।आत्मा त्रिगुणातीत है। जब तक त्रिगुणात्मिका अविद्या त्रिगुणातीत आत्मा से पृथक नहीं हो जाती, तब तक न आत्म-दर्शन सम्भव है और न तो आत्म-ज्ञान ही।
"नहि सांख्य समम् ज्ञानम्।"--सांख्य जैसा और कोई ज्ञान नहीं है। यथार्थ ज्ञान तो सांख्य में ही है। जिज्ञासु हो, साधक हो, विद्वान् हो--सबको दुःख से निवृत्ति चाहिए। इसलिए सभी को तत्व के ज्ञान की आवश्यकता है।
_बिना ज्ञान के सिद्धि भी नहीं मिलती--'ज्ञानं बिना न सिद्धि:।'
आत्मज्ञान से तत्काल अज्ञान (अविद्या) नष्ट हो जाता है। क्योंकि ज्ञानाग्नि से समस्त संस्कार और 'आणव मल' नष्ट हो जाता है, फिर साधक की संसार में पुनरावृत्ति नहीं होती।_
बिना ज्ञान के आत्मतत्व प्रत्यक्ष नहीं होता। इसीलिये सांख्य-शास्त्र का अध्ययन और अनुशीलन अनादि काल से होता आया है। कपिल मुनि को आदि विद्वान् कहा गया है।
_सांख्य-शास्त्र के समान कोई और शास्त्र व्यापक नहीं है। इसी व्यापकता के कारण सांख्य में तत्व-विवेचन में अनेक मत-मतान्तर हैं।_
उदाहरणस्वरुप--
कहीं मूल प्रकृति एक है तो कहीं पर भिन्न-भिन्न जीवात्मा के लिए भिन्न-भिन्न प्रकृति मानी गयी है। कहीं-कहीं महत् और बुद्धि में भेद स्वीकार किया गया है, पर कहीं-कहीं इन्हें पर्यायवाची बताया गया है। किसी के मत में प्रकृति स्वतंत्र है और पुरुष से भिन्न है। परंतु किसी के मत में प्रकृति ईश्वर् की ही शक्ति है।
महाभारत में कहीं 24, कहीं 25 तो कहीं 26 तत्वों का उल्लेख है। गीता में प्रकृति दो प्रकार की है–परा और अपरा। गीता में कहीं प्रकृति को ‘माया’ कहा गया है और कहीं उससे अलग आदि-आदि।
वास्तव में सांख्य ‘दर्शन’ तो है लेकिन मनोवैज्ञानिक दर्शन है। इसके तत्व स्थूल नहीं, बल्कि बौद्धिक जगत् के तत्व हैं। इस जगत् में जो तत्व हैं, सूक्ष्म ही हैं, उनसे सम्बंधित विचार भी सूक्ष्म हैं। इसका तात्पर्य यह है कि जिसमें जितनी बुद्धि होती है, वह उतना ही सूक्ष्म विचार कर् सकता है। इसीलिये सांख्य के तत्वों में विचार-भेद होना स्वाभाविक है। मूल विचार में कोई भेद नहीं है।
अन्य दर्शनों की तरह सांख्य-दर्शन भी स्वतंत्र है। वह अपने ढंग से विषयों का प्रतिपादन करता है। न्याय वैशेषिक मत में 9 नित्य द्रव्य हैं और आत्मा 'जड़' है। मोक्षावस्था में भी आत्मा और मन का सम्बन्ध बना रहता है। आत्मा 'स्वरूप योग्यता' मात्र है। अद्वैत का स्थान नहीं है यहाँ, लेकिन जिज्ञासुओं को इन सब बातों में संतोष नहीं मिलता।
_न्याय वैशेषिक द्वारा प्रतिपादित सभी 9 तत्व वास्तव में नित्य नहीं हैं। इनका सूक्ष्म रूप में विलयन सम्भव है।_
न्याय वैशेषिक का जहाँ अन्त होता है, वहीँ से सांख्य का विचार आरम्भ होता है। जो भौतिक परमाणु तथा मन, आकाश आदि न्याय में सूक्ष्मतम और रूपरहित होने के कारण दृष्टिगोचर नहीं हैं। वे ही सांख्य के स्थूलतम तत्व हैं। सांख्य-भूमि में सभी को उनका प्रत्यक्ष होता है। न्याय वैशेषिक की दृष्टि में जगत् स्थूल है, व्यावहारिक है, लेकिन सांख्य का जगत् सूक्ष्म है और बुद्धिगम्य है।
_मगर जिस प्रकार न्याय का क्षेत्र 'सत' है, उसी प्रकार सांख्य का क्षेत्र भी 'सत' है। एक की सत्ता बाह्य है, दूसरे की सत्ता आतंरिक है। यही मौलिक भेद है।_
सांख्य के सभी तत्व सूक्ष्म हैं। इसके स्थूलतम तत्व भी हमारी स्थूल दृष्टि से देखे नहीं जा सकते। सांख्य-दर्शन के तत्व सिद्धान्त का आश्रय लेकर भौतिक विज्ञान स्थूल से सूक्ष्म जगत् में प्रवेश करने जा रहा है। न्याय वैशेषिक के नित्य नौ द्रव्य निम्न लिखित है--पृथ्वी परमाणु, जलीय परमाणु, तैजस परमाणु, वायवीय परमाणु, आकाश, कालादिक, आत्मा तथा मनस् जिनमें पांच पंचभूत हैं--
पृथ्वी परमाणु——पृथ्वी द्रव्य—–गन्ध
जलीय परमाणु—-जलीय द्रव्य—-रस
तैजस परमाणु—–तैजस द्रिव्य—-रूप
वायवीय परमाणु–वायवीय द्रव्य–स्पर्श
आकाश परमाणु—-आकाश द्रव्य—शब्द
स्पष्ट है कि न्याय वैशेषिक के अनुसार परमाणु में द्रव्य और गुण दोनों मिश्रित हैं। नित्य विभु आकाश का विशेष् गुण "शब्द" है।
इसी प्रकार आत्मा भी नित्य विभु है। उसका विशेष् गुण “ज्ञान” है। लोगों ने इन बातों को ध्यान में रखकर सांख्य के तत्वों का विचार किया है। सांख्य में तीन तत्वों की प्रधानता है–“व्यक्त”, “अव्यक्त” और “ज्ञ” चेतन है।
अव्यक्त को मूल प्रकृति कहते हैं। व्यक्त के 23 भेद हैं और ये कार्य-कारण की परम्परा में मूल प्रकृति के परिणाम हैं। सांख्य के ये 25 तत्व हैं।
सांख्य का कहना है कि इन्हीं तत्वों के यथार्थ ज्ञान से दुःख की निवृत्ति होती है। यह बताया गया है कि “व्यक्त”, “अव्यक्त” और “ज्ञ” के विशेष् ज्ञान से ‘परमतत्व’ की प्राप्ति होती है। विवेक ज्ञान या विवेक ख्याति ही एकमात्र मोक्ष है।
सांख्य के तीन तत्व मुख्य हैं जिन पर संपूर्ण सांख्य निर्भर है। पहला तत्व है : “चेतन” जिसका दूसरा नाम “ज्ञ” या “पुरुष” है। शेष दो तत्व व्यक्त और अव्यक्त “जड़” हैं। पुरुष निष्क्रिय, निर्गुण और निर्लिप्त है। शेष दो तत्व अविवेकी और त्रिगुणात्मक हैं। सांख्य की दृष्टि में पुरुष और प्रकृति दोनों नित्य हैं और दोनों का संयोग अनादि काल से है।
पुरुष स्वभावतः निर्लिप्त और त्रिगुणातीत है। पुरुष का बिम्ब प्रकृति पर पड़ता है जिसके फलस्वरूप प्रकृति या बुद्धि चेतन के समान अपने को समझने लगती है।
बुद्धि के स्वरुप का आभास मनुष्य पर भी पड़ता है जिसके कारण निर्लिप्त त्रिगुणातीत पुरुष अपने को कर्ता भोक्ता मानने लगता है। प्रकृति-पुरुष के इसी आरोपित सम्बन्ध को ‘बन्धन’ कहते हैं। इसी बन्धन को दूर करना पुरुष का अपने आपको और अपने वास्तविक निर्लिप्त स्वरुप को त्रिगुणातीत स्वरुप समझना और पहचानना तथा दूसरी ओर प्रकृति को भी अपने स्वरुप का ज्ञान हो जाना ही विवेक, बुद्धि और मुक्ति है।
प्रकृति-पुरुष का सम्बन्ध स्वाभाविक है किन्तु अपने आपसे पुरुष से मुक्त करने के लिए प्रकृति सदैव प्रयत्नशील रहती है।
मुक्ति एक जन्म के प्रयत्न से नहीं मिलती। इसलिए अपने प्रभुत्व के बल से तथा अपने भावों की सहायता से वह शरीर को त्याग कर अन्य शरीर को धारण करती है। भिन्न भिन्न शरीर धारण करने के पीछे प्रकृति का एकमात्र लक्ष्य रहता है : मनुष्य को बन्धन से मुक्त करना। इसीलिये सांख्य ने एक शरीर छोड़कर अन्य शरीर में जाने के लिए स्थूल शरीर के भीतर एक सूक्ष्म शरीर की सत्ता स्वीकार की है।
*☄️सूक्ष्म~ शरीर :*
सूक्ष्म शरीर महत्, अहंकार, 11 इन्द्रियां, 5 तन्मात्राएँ--इन 18 तत्वों से बना हुआ रहता है।
ग्यारह इन्द्रियों में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ--आंख, कान, नाक, जीभ, और त्वचा।
पञ्च कर्मेन्द्रियाँ--हाथ, पैर, मुख, लिंग और गुदा।
उभय इन्द्रिय--मन।
पञ्च तन्मात्राएँ--शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध।
_मन ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय दोनों है। इन्हीं 18 तत्वों से सूक्ष्म शरीर निर्मित होता है। सांख्य के अनुसार सृष्टि के आदि में प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक सूक्ष्म शरीर उत्पन्न होता है। सूक्ष्म शरीर को धारण करते ही आत्मा में विकार उत्पन्न हो जाता है। अब वह 'विशुद्ध आत्मा' से 'जीवात्मा' बन जाता है।_
सूक्ष्म शरीर कभी किसी स्थूल शरीर में आसक्त नहीं होता। इसमें स्वतंत्र रूप से भोग भी नहीं होता। इसकी विलक्षण गति होती है। कोई उसे रोक नहीं सकता। वह स्थूल शरीर के बिना रह नहीं सकता। पुरुष के भोग के लिए सूक्ष्म शरीर नाना प्रकार के शरीर धारण करता है।
_(मनोचिकित्सक एवं ध्यानप्रशिक्षक लेखक चेतना विकास मिशन के निदेशक हैं.)

