-सुसंस्कृति परिहार
पिछले दिनों एक अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अम्बेडकर भवन में संघ के शताब्दी समारोह का आयोजन केंद्र सरकार ने किया था।जिसके मुख्य अतिथि थे पीएम नरेंद्र मोदी। उन्होंने इस अवसर पर जी भर कर संघ की खूब प्रशंसा की।डाक टिकट और सोने का सौ रुपए का सिक्का जारी हुआ। भारत सरकार की बदौलत आज संघ और सरकार के रिश्ते की वास्तविक छवि को उजागर किया गया।जबकि इससे पहले सरकार के रिमोट कंट्रोल के रुप में संघ का नाम जब कोई लेता था तो मोदी जी उत्तेजित हो जाते थे।
उनके उद्बोधन में आज़ादी के आंदोलन से लेकर अब तक संघ की भूमिकाओं की जो बातें कहीं गई वे सरासर झूठ थीं। हेडगेवार वार जी ने आज़ादी के आंदोलन में तब भाग लिया था जब वे कांग्रेस के सदस्य थे और जेल गए थे। लेकिन संघ की स्थापना के बाद ये अंग्रेजो के बहकावे में आकर देश के ग़द्दार बन गए। तब से संघ हिंदू राष्ट्र के लिए प्रतिबद्ध हो गया तथा मुसलमानों का शत्रु।उधर मुस्लिम लीग को मुस्लिम राष्ट्र के लिए इसी तरह उकसाया गया।जिसका परिणाम था भारत पाक विभाजन।

इस हकीकत को आज तक कोई सरसंघचालक नहीं समझ सका और देश में हिंदू राष्ट्र निर्माण के लिए स्वयं सेवकों को तैयार करता रहा। आज़ादी के बाद महात्मा गांधी की हत्या के पीछे भी यही सोच थी।
आज़ाद भारत में पहली बार संघ के एक स्वयं सेवक अटल बिहारी बाजपेयी को प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला।उनके निर्माण में पंडित जवाहरलाल नेहरू का विशेष अवदान था। इसलिए उनकी छवि बिल्कुल अलग और सबको स्वीकार्य थी। लेकिन पिछले तकरीबन 12 वर्षों से संघनीत भाजपा ने मोदीजी को प्रधानमंत्री बनाया हुआ है उन्होंने हिंदुराष्ट्र निर्माण की बराबर कोशिश जारी रखी किंतु सन् 1924 के आमचुनाव पर राहुल गांधी की भारत यात्रा और नफ़रत के खिलाफ मोहब्बत का बुरा असर देखा गया।आज मोदी वोट चोर गद्दी छोड़ नारे के बीच संघ के कशीदे पढ़ रहे हैं वे बुरी तरह से कई मामलों में फंसे हुए हैं।संघ की पसंद अब वे नहीं है इसलिए वे संघ की ज़रुरत से ज़्यादा तारीफ़ कर बैठे पूरी तल्लीनता में डूबकर उन्होंने लंबा भाषण दिया। लालकिले के बाद ये उनका सरकार के तौर पर दूसरा संघ को खुश करने वाला भाषण था।इसने संघ की तो बल्ले-बल्ले कर दी किंतु मोदी की संघ ने पूरी अवहेलना कर दी है। उन्हें विजयादशमी के दिन नागपुर में आयोजित शताब्दी समारोह के बड़े आयोजन में आमंत्रित नहीं किया।
वहां मोहन भागवत ने मुख्य अतिथि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को बनाया। विशिष्ट अतिथि सीजेआई की माताश्री को बनाया था किंतु उन्होंने अपने आपको अंबेडकर वादी बताकर इस आमंत्रण को ठुकरा दिया।जो निश्चित संघ को चोटिल किया होगा। विदित हो संघ ने पिछले वर्ष में पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को मुख्य अतिथि बनाया था तब कहा जा रहा था कि बंगाल में संघ को इससे फायदा मिलेगा।पता नहीं इसका कुछ असर हुआ या नहीं।इस वर्ष कोविंदजी और डा कमला गवई के आमंत्रण में दलित कार्ड खेला गया था।
संघ ने 20अक्टूवर तक के लिए पांच कार्यक्रम तय किए हैं।संघ अधिकतर लोगों के घर पहुंचने की कोशिश करेगा। स्वयं सेवकों को यह दायित्व सौंपा गया है।इसका सीधा मतलब यह है कि भाजपा की बजाय अब संघ सीधा राजनीति में प्रवेश का इच्छुक है।उसे मोदी सरकार ने इतनी ऊंचाई ता कर दी है कि वह देश दुनिया में अपनी 37 शाखाओं में भी जाकर अपने कदम जमाने की कोशिश करेगा।तथा अन्तर्राष्ट्रीय जगत में घुसपैठ बढ़ाएगा।
संघ प्रमुख ने अमेरिकी टेरिफ के बावजूद संबंध मजबूत रखने की बात भी कही है । उन्होंने कहा कि दुनिया में अकेले नहीं रह सकते। आत्मनिर्भरता भी ज़रुरी है। लेकिन निर्भरता मजबूरी ना बने। पहलगाम हमले में धर्म पूछकर हमला करने पर उन्होंने कहा अब दोस्त दुश्मन की पहचान हो गई है।
कुल मिलाकर यह बात समझ में आई है कि नरेन्द्र मोदी के सत्ता का पूरा लाभ संघ ने उठाया है वह अब विदेशी राजनीति में भी हस्तक्षेप बढ़ाने आतुर है।भारत सरकार का ठप्पा लगने के बाद वह देश की हवा में आए बदलाव को जो राहुल गांधी लाने में लगे हैं उसके विरोध में स्वयं सेवकों का उपयोग कर सकते है। मोदी जब तक सत्ता में हैं संघ का दंश देशवासियों को झेलना पड़ेगा ही।
इस वक्त सरकार और संघ का समायोजन खतरे का संकेत है।काश! सरकार की दो वैशाखियां इस गणित को ,अपने निजी फायदे को भूलकर समझ पाती तो देश आज इस हालात में नहीं पहुंच पाता।ऐसे कठिन वक्त में आशा की किरण ऐसे दौर में सिर्फ प्रतिपक्ष नेता राहुल गांधी में दिखाई देती है जिन्हें अवाम ने जननायक बनाया हुआ है।