कभी वंदे मातरम देश के लिए मर मिटने, देश के लोगों के लिए मर मिटने, देश के प्रति प्रेम से भरा भाव था। इस भाव से इस नारे का उद्घोष करते हुए लाखों लोग लाठियां खाए, जेल गए, काले पानी की सजा झेली और फांसी चढ़े। उस नारे को संघियों-भाजपाइयों और उनके आनुषांगिक संगठनों ने नफरत के नारे, दंगे के नारे में बदल दिया है। इस नफरत की आड़ में अपना और अपने पूंजीपति-कार्पोरेट मित्रों का धंधा चमकाया जा रहा है और चंदा लिया जा रहा है।वंदे मातरम के नारे को दंगे का नारा बनाकर इन्होंने देश के लोगों को बांटा। उनके बीच नफरत भरा। इसका इस्तेमाल भारत की राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करने के लिए किया। इस सत्ता का इस्तेमाल और नफरत और दंगा फैलाने के लिए किया गया। इन सारे कामों के लिए बड़े पैमाने पर धन चाहिए था। फिर नारा दंगे के साथ धंधा चमकाने का माध्यम बना दिया गया। देश को नफरत और घृणा की आग में झोंक कर लोगों का ध्यान भटकाकर अडानी-अंबानी और अन्य धंधेबाज कारोबारियों को इस देश के सार्वजनिक धन (बैंक-एलआईसी, बजट आदि) को हड़पने की खुली छूट दे गई।
डॉ. सिद्धार्थ
मातृभूमि से प्रेम एक सहज-स्वाभाविक भाव है। दुनिया के प्राचीनतम इतिहास में मातृदेवी की मूर्तियां मिलती हैं। भारत की सबसे प्राचीनतम और महानतम सभ्यता सिंधु घाटी की सभ्यता में मातृदेवी का केंद्रीय स्थान है, जो उर्वरता और जीवन चक्र का प्रतीक हैं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हूदड़ों जैसी साइट्स से मिट्टी की नारी मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। इन मूर्तियों में नारी के सिर पर पंखे जैसे आभूषण, हार, चूड़ियाँ, कर्णफूल और मेखला आदि दिखाई देती हैं।
कुछ मूर्तियों पर दीपक जैसी आकृतियाँ भी बनी हुई हैं, जो संकेत देती हैं कि इन मूर्तियों का उपयोग दीपक के रूप में किया जाता था। इसके अलावा, मोहनजोदड़ो से एक देवी की मूर्ति मिली है, जिसे देवी के रूप में पहचाना जाता है। इस मूर्ति में देवी के सिर पर पंखे जैसे आभूषण हैं और वह करधनी, हार, चूड़ियाँ, कर्णफूल जैसी आभूषणों से सुसज्जित है।
दुनिया की अधिकांश प्राचीन सभ्यताएं मातृ प्रधान सभ्यताएं रही हैं, क्योंकि पेड़-पौधों, फूल-फलों और फसल के उत्पादक के रूप में धरती और बच्चों को पैदा करने वाले के रूप में दो ही उत्पादक के रूप में सामने आए। इन्हीं दो के उत्पादन से सृष्टि आगे बढ़ी। धरती मां और जैविक मां दोनों के प्रति प्रेम और आदर मनुष्य का आदिम सहज स्वाभाविक भाव था और है। आदिवासी और किसान आज भी धरती की पूजा करते हैं। यह प्राणी का मां के प्रति सहज-स्वाभाविक जैविक और सामाजिक लगाव और प्रेम होता है।
एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र के आधार देशों के बंटवारे के बाद देश-विशेष के लोग अपने देश को मातृभूमि या पितृभूमि के रूप में देखने और प्रेम करने लगे। जो देश औपनिवेशिक देशों-साम्राज्यवादी देशों यूरोप-अमेरिका के उपनिवेश बने उन देशों के लोगों ने उपनिवेशवादियों-साम्राज्यवादियों की गुलामी से मुक्ति के लिए अपनी मातृभूमि और पितृभूमि की आजादी का नारा दिया। भारत में मातृभूमि की आजादी का नारा सामने आया। यह वंदे मातरम के रूप में लोकप्रिय हुआ। क्या हिंदू, क्या मुसलमान, क्या ईसाई, क्या सिख सभी ने मातृभूमि की आजादी के लिए कुर्बानी दी। मातृभूमि की आजादी के संघर्ष में कूद पड़े। वंदे मातरम के नारे के साथ हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए।
आज वे संघी और उनके चेले भाजपाई वंदे मातरम और मातृभूमि पर दावा पेश कर रहे हैं, जिन्होंने मातृभूमि की अंग्रेजों से गुलामी की मुक्ति के संघर्ष में कभी हिस्सेदारी ही नहीं की। ले देकर एक व्यक्ति सावरकर ने हिस्सेदारी भी कि तो उन्होंने मातृभूमि के लिए अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करने को अपनी भूल मानकर माफी मांग ली और उनसे पेंशन ले लिया। उसके बाद वे भारतीय मातृभूमि की औलादों (हिंदू-मुसलमान) के बीच नफरत फैलाने के कारोबार की ब्रिटिश परियोजना का हिस्सा बन गए।
इन सावरकरवादियों-संघियों ने मातृभूमि की तो टुकड़े करने की सबसे पहले वकालत की। दो राष्ट्र का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसे बाद में मुस्लिम लीग और जिन्ना ने लपक लिया। भारत और पाकिस्तान नामक दो देश बनाने के लिए वंदे मातरम के नारे का इस्तेमाल किया। सच तो यह आजादी से पहले इन्होंने वंदे मातरम का इस्तेमाल देश बांटने के लिए किया।
ये पूरे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वंदे मातरम से मुंह छिपाए रखे या वंदे मातरम का इस्तेमाल देश के बंटवारे के लिए किया-दो राष्ट्र का थियरी देकर। आजादी के बाद भी देश निर्माण में इन्होंने कोई हिस्सेदारी नहीं की। आजादी के बाद ही भारतीय मुसलमानों-ईसाईयों के खिलाफ जहर उगलने में लगे रहे हैं, देश के लोगों को बांटने में ही लगे रहे। वंदे मातरम का जो नारा अपने देश के प्रति प्रेम, अपने देश के लोगों के प्रति प्रेम का नारा था।
संघियों-भाजपाइयों ने इसे मुसलमानों के खिलाफ हिंदुओं के दिलों में नफरत के नारे में तब्दील कर दिया। वंदे मातरम जैसे गहन देश प्रेम के नारे को नफरत के नारे में तब्दील कर दिया। इस नारे का इस्तेमाल इन्होंने देश में दंगे फैलाने, मुसलमानों की लिंचिग करने, यहां तक कि इस नारे को न लगाने वाले लोगों के मुंह में पेशाब करने तक विस्तारित कर दिया। इसे बजरंगी गुड़ों, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के उदंड-लफंगों नफरती-दंगाइयों का नारा बना दिया।
जो नारा कभी मातृभूमि और देश प्रेम के चलते सहज-स्वाभाविक तौर पर लोगों की जुबान पर आया था, उस नारे को जोर-जबर्दस्ती करने का नारा बना दिया। इस नारे को मुसलमानों के धार्मिक-आस्था विश्वास पर चोट करने और उन्हें अपमानित करने का नारा बना दिया।
वंदे मातरम के नारे को दंगे का नारा बनाकर इन्होंने देश के लोगों को बांटा। उनके बीच नफरत भरा। इसका इस्तेमाल भारत की राजनीतिक सत्ता पर कब्जा करने के लिए किया। इस सत्ता का इस्तेमाल और नफरत और दंगा फैलाने के लिए किया गया। इन सारे कामों के लिए बड़े पैमाने पर धन चाहिए था। फिर नारा दंगे के साथ धंधा चमकाने का माध्यम बना दिया गया। देश को नफरत और घृणा की आग में झोंक कर लोगों का ध्यान भटकाकर अडानी-अंबानी और अन्य धंधेबाज कारोबारियों को इस देश के सार्वजनिक धन (बैंक-एलआईसी, बजट आदि) को हड़पने की खुली छूट दे गई।
देश के प्राकृतिक संसाधनों को लूटने की खुली छूट दे गई। इस धंधे से न केवल कार्पोरेट-पूंजीपति और कारोबारी माला-माल हुआ, बल्कि वंदे मातरम पर आज दावा ठोकने वाले संघी और भाजपाई भी माला माल हुए। उन्हें इन लुटेरे पूंजीपतियों-कार्पोरेट घरानों और कारोबारियों ने लूट की खुली छूट के बदले में घोषित-अघोषित तौर पर इतना चंदा दिया कि वे वोटरों को खरीद सकें, चुनावी मशीनरी को खरीद सकें, विधायक-सासंद खरीद सकें, पूरी की पूरी सरकार खरीद सकें।
इतना ही नहीं, इन लुटेरे कारोबारियों के घोषित-अघोषित चंदे से संघ-भाजपा के भव्य और आलीशान पार्टी ऑफिस देश के कोने-कोने में बन गए। 11 साल के भीतर ही संघ-भाजपा और उनके आनुषांगिक संगठनों के पास इतना पैसा आ गया कि वे उसे चुनाव जीतने, सरकार बनाने और पार्टी-संगठन चलाने के लिए पानी की तरह बहा सकें।
कभी वंदे मातरम देश के लिए मर मिटने, देश के लोगों के लिए मर मिटने, देश के प्रति प्रेम से भरा भाव था। इस भाव से इस नारे का उद्घोष करते हुए लाखों लोग लाठियां खाए, जेल गए, काले पानी की सजा झेली और फांसी चढ़े। उस नारे को संघियों-भाजपाइयों और उनके आनुषांगिक संगठनों ने नफरत के नारे, दंगे के नारे में बदल दिया है। इस नफरत की आड़ में अपना और अपने पूंजीपति-कार्पोरेट मित्रों का धंधा चमकाया जा रहा है और चंदा लिया जा रहा है।
सच यह है कि संघियों-भाजापइयों के लिए कभी वंदे मातरम से कोई मतलब नहीं रहा हैं। जब यह नारा देश के लिए मर मिटने का नारा था, तब ये नमस्ते सदा वत्सले गाते रहे और अपने को छिपाए रखे। देश की आजादी के लिए होने वाले संघर्ष और कुर्बानी से बचाए रखे। आज इनके लिए वंदे मातरम का नारा दंगे, धंधे और चंदे का नारा बन गया है और दंगेबाज अपने धंधे और चंदे के लिए इस नारे को अपना नारा कहकर उछाल रहे हैं।

