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*मानव अधिकारों से वंचित देश के सफाई कर्मी*

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राज वाल्मीकि

हमारा देश लोकतांत्रिक है। लोकतंत्र में हर नागरिक को उस के हक-अधिकार जन्‍म से ही मिल जाते हैं। सरकार नागरिकों के हक और विकास के लिए कानून बनाती है। ये कानून गरीबों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अपसंख्‍यकों, हाशिए के लोगों के हित में होते हैं। देश के सभी नागरिक गरिमा के साथ अपना जीवन जिएं इसकी जिम्‍मेदारी सरकार की होती है। पर जनहित में कानून बनाना और सख्‍ती से उनका कार्यान्‍वयन होना दोनेां अलग बातें हैं।

हजारों वर्षों से हमारे देश में मानव मल ढोने की प्रथा जारी है। भारत सरकार वर्ष 1993 और वर्ष 2013 में मैला प्रथा उन्‍मूलन के लिए कानून बना चुकी है। सुप्रीम कोर्ट और अन्‍य हाई कोर्ट भी इस प्रथा के उन्‍मूलन के लिए आदेश जारी कर चुके हैं।

यह कानून और आदेश देश के नागरिकों की मुक्ति, सुरक्षा, स्वतंत्रता, गरिमा और न्याय का भरोसा दिलाते हैं।

इस सब के बावजूद दुख की बात है कि देश में आज भी मानव मल ढोने की प्रथा जारी है। सीवर और सेप्टिक टैंकों की मैनुअली सफाई जारी है। इसमें सफाई करने वाले सफाई कर्मचारी जहरीली गैसों से दम घुट कर मर रहे हैं।

सीवर-सेप्टिक टैंकों की सफाई के दौरान वर्ष 2023 में 102 वर्ष 2024 में 116 और वर्ष 2025 में 116 सफाई कर्मचारी मारे जा चुके हैं। इसे हर हाल में रोकना होगा। सरकार को कठोर कदम उठाने होंगें।

सीवरों में सफाई के दौरान मरने वालों के परिजनों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा 10 लाख से बढ़ाकर 30 लाख रुपये कर दिया है। तो क्या हम लोग मुआवजे के लिए अपने लोगों के सीवरों में सफाई करने के दौरान मरने देना चाहिए? उनके मरने का इंतजार करें? क्‍या प्रशासन, सिविल सोसाइटी के लोगों, जजों, कानून विदों, मानवाधिकार संरक्षकों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों को मैला प्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकने की प्रतिज्ञा नहीं करनी चाहिए?

हमारे देश का संविधान हमें बराबरी का हक देता है। सबको सम्‍मान के साथ जीने का हक देता है। संविधान का अनुच्‍छेद 21 हमें गरिमा के साथ का अधिकार देता है।

आज भी हजारों सालों से चली आ रही मानव मल ढोने की अमानवीय प्रथा क्‍या मानवाधिकारों का उल्‍लंघन नहीं है?

आज जब हम चांद पर पहुंच चुके हैं और मंगलयान छोड़ चुके हैं। हमारा देश इतना हाईटेक हो चुका है तो क्‍या सीवर-सेप्टिक टैंको की सफाई के लिए हमारे पास तकनीक क्‍यों नहीं है?

किसी अमानवीय प्रथा को किसी समुदाय विशेष पर थोपने की जड़ें जातिवाद और पितृसत्ता में निहित हैं। जातिवाद और वितृसत्ता दलितों और महिलाओं के साथ छुआछूत और भेदभाव करते हैं। गैर बराबरी करते हैं। एसे में संविधान को जानना और मानना बहुत जरूरी है। संविधान ने हमें मौलिक अधिकार दिए हैं। सम्‍मान के साथ जीने का हक दिया है। छुआछूत और जातिगत भेदभाव के खिलाफ कानून बनाए हैं।

संविधान के अनुच्‍छेद 14, 15, 17 और 21 हमें पूरी मानवीय गरिमा के साथ जीने का हक देते हैं।

इसलिए आज की जरूरत जातिवाद और पितृसत्‍ता को खत्‍म करने की है।

संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने जाति के विनाश की बात कही थी। क्‍योंकि जाति के आधार पर हम पर अमानवीय पेशे जन्‍म से थोप दिए जाते हैं।

सफाई कर्मचारी आंदोलन इस जाति और पेशे की लिंक को तोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है। देश से मैला प्रथा उन्‍मूलन के लिए संघर्षरत है।

दुखद है कि आज भी देश में हाथ से मल उठाने की प्रथा उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्‍य प्रदेश और जम्‍मू-कश्‍मीर के 46 जिलों में जारी है। यह सरासर मानव अधिकारों का उल्‍लंघन है।

दुख की बात है कि मानव अधिकारों के प्रति हमारी सरकार उदासीन है। यही कारण है कि सरकार मानव अधिकारों के प्रति जनजागरूकता नहीं फैलाती। जहां मानव अधिकारों का उल्‍लंघन होता है जो देश के नागरिकों को उनके मानव अधिकारों से वंचित करते हैं उनके खिलाफ सरकार सख्‍त कदम नहीं उठाती।

हालांकि कानूनों में ऐसे लोगों के खिलाफ प्रावधान हैं जो किसी भी नागरिक को मानव मल ढोने के लिए या सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के लिए बाघ्‍य करते हैं। उनके लिए कानूनों में जुर्माना और जेल होने का प्रावधान है। मानव मल ढुलवाना या सीवर सेप्टिक टैंको की मैनुअली सफाई करवाना कानूनन दण्‍डनीय अपराध है। बावजूद इसके यह सब जारी है। क्‍यों? इसे करवाने वाले व्‍यक्ति को सजा क्‍यों नहीं मिलती? उसके खिलाफ एफआईआर तक नहीं होती। क्‍यों?

आज इक्‍कीसवीं सदी के वर्ष 2025 में भी मानव मल ढोने की मानव मल साफ करने की अमानवीय प्रथा क्‍या हमारे लिए शर्मनाक नहीं होना चाहिए? क्‍या यह जघन्‍य प्रथा विकासशील भारत के माथे पर कलंक नहीं है? क्‍या देश में रामराज की खुशफहमी वालों को इस पर विचार नहीं करना चाहिए?

हमारे देश में ही नहीं पूरी दुनिया में 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। पर दुखद है कि लोग मानवाधिकारों से वंचित हैं।

जब देश में सबके साथ बराबरी का व्‍यवहार होगा, सबको समानता मिलेगी, सबको न्‍याय मिलेगा, सबका आपस में बंधुत्‍व होगा, सबको पूरी मानवीय गरिमा के साथ जीने की आजादी होगी। तभी देश के संविधान द्वारा प्रदत्त सभी मानवाधिकारों का देश के नागरिक आनंद ले पाएंगे। पर क्‍या इसके लिए मानवाधिकार आयोग, देश के सभ्‍य नागरिक, लोकतंत्र और संविधान में विश्‍वास रखने वाले लोग देश को बेहतर बनाने के लिए अपने कर्तव्‍यों और दायित्‍वों का पालन करेंगे? 

(लेखक स्‍वतंत्र पत्रकार हैं और सफाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं।

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