~ डॉ. विकास मानव
अगर आप या हम “क्वाण्टम फ़िज़िक्स” (Quantum physics) को नहीं जानते हैं, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “क्वाण्टम फ़िज़िक्स” होता ही नहीं है, अथवा कोई भी “क्वाण्टम फ़िज़िक्स” को जानता ही नहीं है।
अगर आप या हम “भास्कराचार्य द्वारा दिए गए गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त” (law of gravity) को नहीं जानते हैं, जिसे भास्कराचार्य ने न्यूटन से सैकड़ों वर्ष पहले दे दिया था, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “भास्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त” दिया ही नहीं है, अथवा कोई भी इनके विषय में कुछ भी नहीं जानता है।
अगर आप या हम “भारद्वाजमुनि के प्राचीन भारतीय विमानशास्त्र” (science of Aerology) को नहीं जानते हैं, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “प्राचीन भारतीय विमानशास्त्र” होता ही नहीं था, अथवा कोई भी “भारद्वाजमुनि के विमानशास्त्र” को जानता ही नहीं है। अमेरिका में आज भी हमारे “भारद्वाजमुनि के विमानशास्त्र” पर शोध हो रहे हैं, और हम व आप यहीं पूछते रहते हैं कि ये है क्या?
अगर आप या हम “आर्यभटीय प्राचीन बीजगणित (Algebra) व अङ्कगणित (Arithmetic) विज्ञान” को नहीं जानते हैं, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “आर्यभटीय प्राचीन गणित विज्ञान” है ही नहीं अथवा होता ही नहीं है, अथवा कोई भी “आर्यभटीयम्” को जानता ही नहीं है।
अगर आप या हम “नागार्जुन के रसायनशास्त्रम्” (science of chemistry) को नहीं जानते हैं, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “नागार्जुन का रसायनशास्त्रम्” था ही नहीं है, अथवा कोई भी “प्राचीन भारतीय रसायनशास्त्रम्” को जानता ही नहीं है।
अगर आप या हम “सुश्रुत के शल्य चिकित्सा शास्त्र” (science of Surgery) , जिसने विश्व को पहली बार “प्लास्टिक सर्ज़री” (plastic surgery) सिखाया था, को नहीं जानते हैं, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “सुश्रुत का शल्य चिकित्सा शास्त्र” होता ही नहीं है, अथवा कोई भी “सुश्रुत के चिकित्सा शास्त्र” को जानता ही नहीं है। आस्ट्रेलिया के मेलबर्न के “दी रायल आस्ट्रेलिया कालेज आफ़ सर्ज़ियन्स” (The Royal Australia College of Surgeons (RACS) में आज महर्षि सुश्रुत के शल्य चिकित्सा शास्त्र पर निरन्तर शोध वो रहे हैं तथा वहाँ पर परिसर के बिल्कुल बीचो-बीच महर्षि सुश्रुत की बड़ी सी प्रतिमा उन्होंने स्थापित की है तथा उनको “शल्य चिकित्सा का पिता” (father of surgery) कहा है, लेकिन हममें से बहुतों को इसके बारे में पता तक नहीं होगा।
अगर आप या हम “वराहमिहिर के खगोलविज्ञानम्” (Science of calculation अथवा Astronomy) नहीं जानते हैं, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “वराहमिहिर का खगोलविज्ञानम्” होता ही नहीं है, अथवा कोई भी “वराहमिहिर के खगोलविज्ञानम्” को जानता ही नहीं है।
अगर आप या हम “कपिलऋषि के ब्रह्माण्ड-विज्ञानम्” (science of universe अथवा Cosmology) को नहीं जानते हैं, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “कपिलऋषि का ब्रह्माण्ड-विज्ञानम्” होता ही नहीं है, अथवा कोई भी “कपिलऋषि के ब्रह्माण्ड-विज्ञानम्” को जानता ही नहीं है।
अगर आप या हम “कणादमुनि के आणविक-सिद्धान्त” (theory of Atoms) को नहीं जानते हैं, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “कणादमुनि का आणविक-सिद्धान्त” होता ही नहीं है, अथवा कोई भी “कणादमुनि के आणविक-सिद्धान्त” को जानता ही नहीं है।
अगर आप या हम “कणादमुनि के गति के सिद्धान्त” (law of motion) को नहीं जानते हैं, जिसको उन्होंने न्यूटन से सैकड़ों वर्ष पहले ही दे दिया था, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “कणादमुनि का गति का सिद्धान्त” होता ही नहीं है, अथवा कोई भी “कणादमुनि के गति के सिद्धान्त” को जानता ही नहीं है।
अगर आप या हम “अगस्त्य मुनि के बिजली अथवा विद्युत उत्पादन व बैट्री के विज्ञान” (science of electric and battery) को नहीं जानते हैं, जिसको उन्होंने बेंजामिन फ्रेंक्लिन से सैकड़ों वर्ष पहले ही दे दिया था, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “अगस्त्य मुनि को बिजली व बैट्री का ज्ञान” था ही नहीं है, अथवा कोई भी “अगस्त्य मुनि के बिजली व बैट्री के विज्ञान” को जानता ही नहीं है।
निश्चित ही वर्त्तमान में बिजली का आविष्कार बेंजामिन फ्रेंक्लिन ने किया लेकिन बेंजामिन फ्रेंक्लिन अपनी एक किताब में स्वयं लिखते हैं कि — “एक रात मैं संस्कृत का एक वाक्य पढ़ते-पढ़ते सो गया। उस रात मुझे स्वप्न में संस्कृत के उस वचन का अर्थ और रहस्य समझ में आया जिससे मुझे मदद मिली।”
महर्षि अगस्त्य एक वैदिक ऋषि थे। इनकी गणना सप्तर्षियों में की जाती है। ऋषि अगस्त्य ने ‘अगस्त्य संहिता’ नामक ग्रंथ की रचना की। आश्चर्यजनक रूप से इस ग्रंथ में विद्युत उत्पादन से संबंधित सूत्र मिलते हैं-
संस्थाप्य मृण्मये पात्रे, ताम्रपत्रं सुसंस्कृतम्।
छादयेच्छिखिग्रीवेन, चार्दाभि: काष्ठापांसुभि:॥
दस्तालोष्टो निधात्वय: पारदाच्छादितस्तत:।
संयोगाज्जायते तेजो मित्रावरुणसंज्ञितम्॥
(अगस्त्य संहिता)
अर्थात : एक मिट्टी का पात्र लें, उसमें ताम्र पट्टिका (Copper Sheet) डालें तथा शिखिग्रीवा (Copper sulphate) डालें, फिर बीच में गीली काष्ट पांसु (wet saw dust) लगाएं, ऊपर पारा (mercury) तथा दस्त लोष्ट (Zinc) डालें, फिर तारों को मिलाएंगे तो उससे मित्रावरुणशक्ति (Electricity) का उदय होगा।
अगस्त्य संहिता में विद्युत का उपयोग इलेक्ट्रोप्लेटिंग (Electroplating) के लिए करने का भी विवरण मिलता है। उन्होंने बैटरी द्वारा तांबे या सोने या चांदी पर पॉलिश चढ़ाने की विधि निकाली अत: अगस्त्य को कुंभोद्भव (Battery Bone) कहते हैं।
जैसे कि हम जानते है सन् 1800 ईस्वी में पहला बैट्री आविष्कार किये Alessandro Volta ने। पर क्या आप जानते है उससे भी पहले के लोग भी बैट्री के प्रयोग करते थे, सिर्फ भारत में हीं नहीं बल्कि अन्य देशों में भी? क्या आपने ‘पारसी बैट्री’ या ‘बागदादी बैट्री’ का नाम सुने है? जिनको पारसी यज़ीदी लोगो ने बनाया था। वे लोग अग्नि की उपासना करते थे और ऋषि अंगिरा(जिन्होंने वेद अनुसार अग्नि का आविष्कार किया) के वंशज थे।
अगर आप या हम “दूरबीन (टेलिस्कोप) के वास्तविक आविष्कार व आविष्कारक” (Invention of telescope) के विषय में नहीं जानते हैं, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “हैंस लिपरशे (१६०८ ईस्वी) अथवा गैलिलियो” ने ही दूरबीन का सर्वप्रथम आविष्कार किया था। प्राचीन हिन्दू मन्दिरों (फिर चाहे वो भारत के हों या कम्बोडिया के), जो कि प्राचीन विज्ञान के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, उनमें आज से ९०० वर्ष पूर्व में हीं दूरबीन के साक्ष्य मिलते हैं, जबकि वर्त्तमान का इतिहास हमें पढ़ाता है कि दूरबीन का आविष्कार आज से केवल ४०० वर्ष पूर्व यूरोप वालों ने किया। आश्चर्य है कि किस तरह से हमारे ज्ञान, विज्ञान, आविष्कारों तथा इतिहास को झुठलाया एवं ठुकराया गया है।
अगर आप या हम “बोधायनाचार्य के बोधायनीय-गणित-सूत्र-सिद्धान्त (ज्यामितिशास्त्र)” जिसे वर्त्तमान में पाइथागोरस का सिद्धान्त (theory of Pithagorus) कहते हैं, को नहीं जानते हैं, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “बोधायनाचार्य का ज्यामीतीय-गणित-सूत्र-सिद्धान्त” होता ही नहीं है, अथवा कोई भी “बोधायनाचार्य के बोधायनीय-गणित-सूत्र-सिद्धान्त” को जानता ही नहीं है।
बौधायन के सूत्र वैदिक संस्कृत में हैं, जिनकी रचना सम्भवतः ८वीं — ७वीं शताब्दी ईसापूर्व हुई थी। बोधायनाचार्य के कुछ गणितीय सिद्धान्त —
(क) — बौधायन प्रमेय या पाइथागोरस प्रमेय —दीर्घचतुरश्रस्याक्ष्णया रज्जुः पार्श्वमानी तिर्यग्।
मानी च यत् पृथग् भूते कुरूतस्तदुभयं करोति॥
(आपस्तम्बसूत्र)
अर्थात्, विकर्ण पर कोई रस्सी तानी जाय तो उस पर बने वर्ग का क्षेत्रफल ऊर्ध्व भुजा पर बने वर्ग तथा क्षैतिज भुजा पर बने वर्ग के योग के बराबर होता है।
(ख) — २ का वर्गमूल निकालने की विधि —
समस्य द्विकर्णि प्रमाणं तृतीयेन वर्धयेत।
तच् चतुर्थेनात्मचतुस्त्रिंशोनेन सविशेषः।।
(आपस्तम्बसूत्र)
अर्थात् — किसी वर्ग का विकर्ण का मान प्राप्त करने के लिए भुजा में एक-तिहाई जोड़कर, फिर इसका एक-चौथाई जोड़कर, फिर इसका चौतीसवाँ भाग घटाकर जो मिलता है वही लगभग विकर्ण का मान है।
(ग) — वर्ग के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल के वृत्त का निर्माण —चतुरस्रं मण्डलं चिकीर्षन्न् अक्षयार्धं मध्यात्प्राचीमभ्यापातयेत्।
यदतिशिष्यते तस्य सह तृतीयेन मण्डलं परिलिखेत्।।
(आपस्तम्बसूत्र)
अर्थात्, यदि वर्ग की भुजा 2a हो तो वृत्त की त्रिज्या r = [a+1/3(√2a – a)] = [1+1/3(√2 – 1)] a
(घ) — वृत्त के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल के वर्ग का निर्माण —
मण्डलं चतुरस्रं चिकीर्षन्विष्कम्भमष्टौ भागान्कृत्वा भागमेकोनत्रिंशधाविभाज्याष्टाविंशतिभागानुद्धरेत् भागस्य च षष्ठमष्टमभागोनम् ॥
(आपस्तम्बसूत्र)
(ङ) — बोधायन के अन्य प्रमेय — बौधायन द्वारा प्रतिपादित कुछ प्रमुख प्रमेय ये हैं-
किसी आयत के विकर्ण एक दूसरे को समद्विभाजित करते हैं।
समचतुर्भुज (रोम्बस) के विकर्ण एक-दूसरे को समकोण पर समद्विभाजित करते हैं।
किसी वर्ग की भुजाओं के मध्य बिन्दुओं को मिलाने से बने वर्ग का क्षेत्रफल मूल वर्ग के क्षेत्रफल का आधा होता है।
किसी आयत की भुजाओं के मध्य बिन्दुओं को मिलाने से समचतुर्भुज बनता है जिसका क्षेत्रफल मूल आयत के क्षेत्रफल का आधा होता है।
अगर आप या हम “ब्राह्मी लिपि” (𑀩𑁆𑀭𑀸𑀳𑁆𑀫𑀻 𑀮𑀺𑀧𑀺) को नहीं जानते हैं, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता कि, “ब्राह्मी लिपि” होता ही नहीं है, अथवा कोई भी “ब्राह्मी लिपि” को जानता ही नहीं है।
इसी प्रकार यदि आप या हम संस्कृत भाषा को नहीं बोल पाते हैं (यद्यपि मैं संस्कृत भाषा बोलता हूँ) अथवा यदि आपके या हमारे ज्ञान में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं आ पाता है जो “संस्कृत भाषा” बोलता है तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं होता है कि कोई भी “संस्कृत” नहीं बोलता है।
भारत में लगभग १६०० भाषाएँ बोली जाती हैं, जिनमें कुछ हैं, जैसे अबुझमारिया, गारो, औरिया, तथा त्संगला आदि भाषाएँ हैं जो मेघालय, त्रिपुरा, पश्चिमी असम, नागालैंड आदि के पहाड़ी क्षेत्रों में बोली जाती हैं। यद्यपि इन भाषाओं को बोलने वालों की सङ्ख्या अत्यधिक न्यून है, तथापि ये भारतीय भाषाएँ है, तथा अपने क्षेत्र विशेष में स्वच्छन्द रूप से प्राचीन समय से ही बोली जाती आ रही हैं। आप और हममें से बहुत लोगों ने सम्भवतः इन भाषाओं का नाम भी नहीं सुना होगा, लेकिन वहाँ के लोग इन भारतीय भाषाओं को बोलते हैं।
यदि आप या हम इन भारतीय भाषाओं को नहीं जानते है अथवा नहीं बोलते हैं तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि कोई भी इन भाषाओं को नहीं जानता अथवा नहीं बोलता है।
वैसे आपके ज्ञान के लिए मैं बता दूँ कि, २०११ की जनगणना में लगभग पच्चीस हज़ार लोगों ने संस्कृत भाषा को अपनी प्रथम भाषा अर्थात् मातृभाषा बताया था, तथा लगभग पचास लाख लोगों ने संस्कृत भाषा को अपनी द्वितीय तथा तृतीय भाषा बताया था। अब २०२१ में अगली जनगणना होने वाली है, जिसमें हम यह देखेंगे कि यह सङ्ख्या कितनी बढ़ती या घटती है?
[भारत की जनगणना २०११ – विकिपीडिया]
आपकी जानकारी के लिए मैं यह भी बताना चाहूँगा कि, भारत में ऐसे कई गाँव हैं, जो “संस्कृतग्राम” के नाम से प्रसिद्ध हैं तथा जहाँ के सारे लोग संस्कृत ही बोलते हैं, फिर चाहे वे सार्वकारिक पद पर बैठे लोग हों, अपना स्वयं का व्यवसाय करने वाले लोग हों, सफ़ाई करने वाले, आटो-रिक्सा चलाने वाले, स्त्री-पुरुष, बच्चे-वृद्ध सब संस्कृत भाषा में हीं सम्भाषण करते हैं, जिनमें से कुछ गाँव इस प्रकार से हैं —
१. मुत्तुर, कर्नाटक
२. होसहल्ली, कर्नाटक
३. झिरि, मध्यप्रदेश
४. बघुवर, मध्यप्रदेश
५. मोहद, मध्यप्रदेश
६. ससना, ओडिशा
७. गनोद, राजस्थान
निष्कर्षत: हमारा यह कहना कि, संस्कृत एक जीवित भाषा है, जिसे भ्रान्तिवश कुछ लोग मृत् भाषा समझ बैठते हैं। यदि किसी व्यक्ति विशेष को लगता है कि, कोई संस्कृत भाषा में बात नहीं करता है, यह पूर्णतः उस व्यक्ति विशेष के सीमित ज्ञान का दोष होगा, ना कि संस्कृत भाषा का अथवा किसी अन्य व्यक्ति का।
यहाँ पर लोग तो क्या पूरा का पूरा गाँव ही संस्कृत में बोलता है, पर दुःखद यह है कि इसे हम नहीं जानते हैं और अपनी सीमित जानकारी अथवा ज्ञान को ही शाश्वत व पूर्ण मान भ्रमित होते रहते हैं।

