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संथारा: जैन धर्म में सज-धजकर बैंड बाजे के साथ निकलती है अंतिम यात्रा

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जोधपुर

रंग-बिरंगी साड़ियां पहनी महिलाएं। उनके मेंहदी लगे हाथों में जैन धर्म की किताबें। गीत बज रहे। भजन-कीर्तन चल रहा। परिवार के लोग खुशी से झूम रहे। चारों तरफ उत्सव का माहौल है। दूर से देखने पर लगता है यहां किसी की शादी है, लेकिन करीब पहुंची तो पता चला यहां मौत का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है।

ये जैन धर्म के लोग हैं। जैन धर्म में स्वेच्छा से अन्न-जल छोड़कर देह त्याग करने की परंपरा को संथारा या सल्लेखना ​​​​​​ कहा जाता है। सल्लेखना ‘सत्’ और ‘लेखना’ शब्दों से मिलकर बना है। इसका मतलब ‘अच्छाई का लेखा-जोखा’ होता है।

हाथों में मेहंदी और रंग-बिरंगी साड़ियों में इन महिलाओं को देखकर लगता नहीं कि ये मौत का इंतजार कर रही हैं। आमतौर पर मौत के वक्त लोग उदास होते हैं।

83 साल की गुलाबी देवी अपनी पोतियों के साथ। इनकी मुस्कान और उत्साह देखकर आपको लगेगा ही नहीं ये अपनी मृत्यु का इंतजार कर रही हैं।

रात 8 बजे का वक्त। एक छोटे से कमरे में गुलाबी देवी लेटी हैं। उनके गोरे रंग पर सुर्ख लाल रंग की साड़ी खूब जंच रही है। माथे पर चमकती बिंदी, हाथों में मेंहदी और लाल चूडि़यां। पूरे घर में चहल-पहल है। लोग आ-जा रहे हैं। महिलाएं ढोल-झाल बजा रही हैं। गीत गा रही हैं।

गुलाबी देवी अपने बेटे से कहती हैं, ‘जोधपुर में आज एक आदमी ने संथारा लिया था। उसकी मौत तो कुछ घंटों बाद हो गई। मेरी कब होगी?’

बेटा कहता है जिस घड़ी आपकी मौत लिखी है, उसी घड़ी होगी। परेशान मत होइए।

गुलाबी देवी अपनी पड़पोती के बच्चों के साथ खेल रही हैं। उन्हें दुलार रही हैं।

गुलाबी देवी अपनी पड़पोती को बुलाती हैं। फिर उनके दो जुड़वां बच्चों के साथ खेलने लगती हैं। उनका उत्साह देखकर यकीन ही नहीं होता कि मृत्यु का इंतजार कर रहा कोई शख्स इतना खुश हो सकता है।

फिर वे दोनों बेटों को बुलाती हैं। अपने पास बैठाती हैं, उन्हें दुलारती हैं। कहती हैं, ‘मैंने पूरी जिंदगी इस घर में निकाल दी। मेरी बैकुंठी (अर्थी) घर के अंदर से ही निकालना। अपने बच्चों के हाथ से केसर का तिलक करवाना और बैकुंठी को भी हाथ लगवाना।’

बेटा कहता है, ‘हां पक्का। तुम मरने के बाद भी देखोगी कि वैसा ही मैंने किया है।’

गुलाबी देवी के बेटे कहते हैं, ‘हमारे यहां ब्याह-शादी में बैंड और डीजे नहीं आता है, लेकिन किसी ने संथारा ली है, तो उसकी मौत पर बैंड और डीजे बुलाया जाता है। सब लोग शादी की तरह तैयार होकर उसके जनाजे में शामिल होते हैं।’

गुलाबी देवी पिछले 24 दिनों से संथारा पर हैं। उन्होंने अपने पति पुखराज के साथ संथारा लिया था। जैन इतिहास में यह पहला मौका था जब पति-पत्नी ने एक साथ संथारा लिया। 17वें दिन पुखराज की मौत हो गई।

गुलाबी देवी ने अपने पति के साथ संथारा लिया था। उनके पति की मृत्यु 14 जनवरी को हो गई।

अभी कुछ दिन पहले झारखंड में सम्मेद शिखरजी को पर्यटन केंद्र घोषित करने के विरोध जैन मुनि समर्थ सागर और जैन मुनि सुज्ञेय सागर ने संथारा लिया था। दोनों देह त्याग चुके हैं।

जैन धर्म ग्रंथों के मुताबिक, जब किसी व्यक्ति या जैन मुनि को लगता है कि उनकी मृत्यु करीब है, तो वे अन्न-जल का त्याग कर देते हैं। एक कमरे में रहने लगते हैं।

जैन मुनि आचार्य समंतभद्र ने जैन ग्रंथ ‘रत्नकरंड श्रावकाचार’ में संथारा का जिक्र किया है। इसमें कहा गया है कि संथारा लेने से पहले गुरु की इजाजत लेनी पड़ती है। इसके लिए कोई उम्र तो तय नहीं है, लेकिन आमतौर पर मुश्किल हालातों में, बुढ़ापे में या लंबी बीमारी की स्थिति में संथारा ग्रहण करने की बात कही गई है।

संथारा लेने से पहले जैन मुनि जैन ग्रथों का मंत्रोच्चारण करवाते हैं। अपने हाथ से पानी पिलाते हैं और अन्न-जल का त्याग करवाते हैं। इसे संथारा पचकाना कहते हैं। इसके बाद जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों की स्तुति की जाती है।

गुलाबी देवी के घर की ये महिलाएं भजन-कीर्तन कर रही हैं। उनके परिवार-रिश्तेदार के करीब 150 लोग यहां आए हैं।

जैन मुनि संथारा ग्रहण करने जा रहे शख्स से कहते हैं- ‘जावजीव आपको सभी प्रकार के आहार का त्याग है।’ संथारा लेने वाला भी त्याग बोलता है और वहीं से शुरू हो जाता है संथारा। एक बार अन्न त्याग करने का मतलब है मौत होने तक उसे त्यागे रखना।

जैन साध्वी समणी मधुर प्रज्ञा बताती हैं, ‘दो तरह के जैन समुदाय हैं- श्वेतांबर और दिंगबर। संथारा प्रथा सभी में है। हमारे धर्म में जीवन से ज्यादा मृत्यु कैसी होनी चाहिए, इस बात पर जोर दिया जाता है, क्योंकि हम पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। हमारी मान्यता है कि मरते वक्त जो आदमी जैसा सोचता है, उसका अगला जन्म वैसा ही होता है। इसी लिए हम मृत्यु का उत्सव मनाते हैं।’

वे कहती हैं, ‘मृत्यु के वक्त समाधि मौत सबसे उत्तम मानी जाती है। जो संथारा के जरिए ली जाती है। इसमें किसी से मोह, लोभ, चिंता, प्रेम, नफरत, द्वेष खत्म करने की कोशिश की जाती है। यहां तक कि अपने शरीर से भी। इसलिए बिना खाए पिए सिर्फ साधना की जाती है।’

संथारा के वक्त आनंद का भाव नीचे नहीं आने चाहिए। इसी वजह से संथारा लेने वाले के शख्स के आसपास भक्ति का माहौल रखा जाता है। घर में आने वाला हर आदमी उसे गीत सुनाता है। उसका गुणगान करता है।

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